मासूम सा बचपन, सुहानी सी यादें
रोज लड़ते, रोज झगड़ते, बिना बात के मुंहफुलाते।
एक दिन ना मिले तो जोर-जोर से आवाज लगाते।
एक जगह पर बैठकर घंटों बतियाते।
कुछ न करने के बाद भी एक-दूसरे पर आरोप लगाते।
ये तेरा , ये मेरा हर रोज का विवाद था।
बिना बात के लड़ने में भी प्यार था।
ना जात-पात का लेना देना था।
ना रंग-रूप का भेद था।
ना सुबह की खबर थी।
ना शाम का ठिकाना था।
स्कूल से लौटते ही खेलने जाना था।
वो पढ़ाई के नाम पर पेट दर्द का बहाना था।
एक ही खिलौने से सभी खेलते थे।
वो बात-बात पर एक दूसरे को चिढ़ाते थे।
वो छोटी से बात पर हल्ला मचाना।
वो गिरते पड़ते साइिकल चलाना।
घर में कुछ खास बना तो दोस्तों के लिए चुराना।
वो घर में पता चलाने पर पापा के डर मां के आचन में छिप जाना।
वो दूध ना पीने के नाम पर कई बहाने बनाना।
वो मां की डाट खाके रोते-रोते सो जाना।
हर दिन नया सा होता था।
हर रोज नई कहानी थी।
किसी चीज की फिक्र नहीं थी।
हर बात पर मनमानी थी।
वो भाई-बहन से राेज लड़ना।
वो छोटी-छोटी बातों पर अड़ना।
वो एक चॉकलेट के लिए रोना-धोना।
वो मौका मिलते ही छिना झपटी करना।
ना जिम्मेदारियों का बोझ था।
ना किसी बात की चिंता थी।
ना पैरों में चप्पल का होश था।
ना गर्मी में धूप की चिंता थी।
वो पढ़ाई के नाम रोना आता था।
वो नतीजों के समय सहम जाते थे।
वो दिनभर खेलने पर भी थकान कहां थी।
चेहरे पर मस्ती हर पल झलकती थी।
वो पलक झपकते ही नींद आ जाती थी।
मां जब प्यार से बालों को सहलाती थी।
बड़े से बड़ा जख्म भी ठीक हो जाता था।
मां जब प्यार से गले लगाती थी।
न जाने कब हम बड़े हो गये।
जिम्मेदािरयों को उठाने पैरों पर खड़े हो गये।
बहुत याद आता है वो बचपन।
वो बारिश का मौसम, वो कागज की कश्ती
और
वो यारोें के साथ बिताये हुए पल।
-रविकांत तिवारी
नागपुर
9049871966








