नयी दिल्ली। छत्तीसगढ़ के घने जंगलों और खनिज संपदा से समृद्ध हसदेव अरण्य क्षेत्र एक बार फिर राजनीतिक और पर्यावरणीय बहस के केंद्र में आ गया है। कांग्रेस ने शनिवार को राज्य उच्च न्यायालय के हालिया फैसले को “खतरनाक” और “वन अधिकार अधिनियम की आत्मा पर हमला” बताया है।
दरअसल, छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की एकल न्यायाधीश पीठ ने हसदेव अरण्य के एक गांव के सामुदायिक वन अधिकार (CFR) को रद्द करने को चुनौती देने वाली याचिका को पिछले सप्ताह खारिज कर दिया था। इस फैसले ने पर्यावरणविदों और आदिवासी समुदायों के बीच चिंता बढ़ा दी है।
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने शनिवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पूर्व ट्विटर) पर तीखा हमला बोलते हुए कहा—
“राज्य में मोदानी सरकार (मोदी + अडानी का व्यंग्य) के आने के बाद से हसदेव अरण्य में जो कुछ हुआ है, वह अस्वीकार्य और अभूतपूर्व है। अब अदालत ने वन अधिकार अधिनियम, 2006 (FRA) के तहत ग्राम समुदाय को दिए गए अधिकारों को ही रद्द कर दिया है। यह फैसला न केवल अन्यायपूर्ण है बल्कि कानून की मूल भावना के भी खिलाफ है।”
रमेश ने आरोप लगाया कि फैसले के पीछे का तर्क बेहद चौंकाने वाला है—
“कोर्ट ने कहा कि चूंकि भूमि पहले ही खनन के लिए दी जा चुकी थी और उस पर कोई आपत्ति नहीं आई, इसलिए अब वन अधिकारों का कोई दावा नहीं बनता। लेकिन सवाल यह है कि यह फैसला आखिर किसके हित में है? जवाब स्पष्ट है—मोदानी है तो मुमकिन है।”
कांग्रेस नेता ने आगे कहा कि अदालत ने अपने फैसले में यह भी उल्लेख किया है कि FRA वन भूमि के नीचे मौजूद खनिज संसाधनों पर राज्य के अधिकारों में हस्तक्षेप नहीं करता, जिसे उन्होंने “न्याय और तर्क की विकृति” बताया।
रमेश के मुताबिक,
“यह तर्क कि FRA सिर्फ वन उपज तक पहुंच की गारंटी देता है लेकिन भूमि पर अधिकार नहीं देता, पूरी तरह से अनुचित है। अब अदालत ने इन अधिकारों को सरकारी नीति पर निर्भर बना दिया है, जो आदिवासी समुदायों के लिए बेहद खतरनाक संकेत है।”
कांग्रेस का कहना है कि यह फैसला न केवल हसदेव अरण्य बल्कि पूरे देश में वन अधिकार अधिनियम की नींव को कमजोर कर सकता है।
पार्टी ने मांग की है कि राज्य सरकार और केंद्र इस फैसले की समीक्षा करें और आदिवासियों के सामुदायिक अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करें।
हसदेव अरण्य का यह मामला अब सिर्फ एक कानूनी मुद्दा नहीं रह गया, बल्कि खनन, पर्यावरण और आदिवासी अधिकारों के टकराव का प्रतीक बन गया है। अदालत के इस फैसले से जहां उद्योग जगत को राहत मिली है, वहीं सामाजिक संगठनों और विपक्षी दलों के बीच नई राजनीतिक हलचल शुरू हो गई है।









