नई दिल्ली। विपक्ष ने मंगलवार को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस पेश कर दिया। इस पर 118 सांसदों के हस्ताक्षर हैं। जानकारी के मुताबिक विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव पर सदन में 9 मार्च को चर्चा हो सकती है। 13 फरवरी को बजट सत्र के वर्तमान सेशन का आखिरी दिन है, जिसके बाद 8 मार्च से सदन की कार्यवाही फिर से शुरू होगी।
वहीं विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव के बाद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने बड़ा फैसला लिया है। उन्होंने निर्णय लिया है कि जब तक सदन में अविश्वास प्रस्ताव पर फैसला नहीं हो जाता, वे स्पीकर की कुर्सी पर नहीं बैठेंगे। हालांकि नियमों के अनुसार ऐसी कोई बाध्यता नहीं है, फिर भी उन्होंने सदन में न जाने का फैसला किया। चाहे सरकार या विपक्ष की ओर से मनाने का प्रयास हो, लेकिन वे नहीं जाएंगे। संभावना है कि बजट सत्र के दूसरे हिस्से के पहले दिन यानी 9 मार्च को स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर चर्चा हो सकती है। इसके लिए पचास सांसदों से हाथ खड़े कराए जाएंगे, जिसके बाद चेयर इस प्रस्ताव पर चर्चा करा सकती है।
सूत्रों के मुताबिक, लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने मंगलवार को हाउस सेक्रेटरी जनरल को उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव नोटिस की जांच करने और सही एक्शन लेने का निर्देश दिया। लोकसभा सचिवालय के सूत्रों ने विपक्ष का नोटिस मिलने की बात स्वीकार करते हुए कहा कि इस पर विचार किया जाएगा और नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
निचले सदन में कांग्रेस के उपनेता गौरव गोगोई, कांग्रेस के मुख्य सचेतक कोडीकुनिल सुरेश और सचेतक मोहम्मद जावेद ने लोकसभा महासचिव उत्पल कुमार सिंह को यह नोटिस सौंपा। नोटिस पर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, डीएमके और कई अन्य विपक्षी दलों के 100 से अधिक सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। तृणमूल कांग्रेस के सांसदों ने इस नोटिस पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं।
गोगोई ने कहा कि लोकसभा महासचिव को संविधान के अनुच्छेद 94 (सी) के तहत यह प्रस्ताव संबंधी नोटिस सौंपा गया है। नोटिस में कहा गया है, “हम भारत के संविधान के अनुच्छेद 94 (सी) के प्रावधानों के अंतर्गत लोकसभा अध्यक्ष को पद से हटाने के लिए एक प्रस्ताव लाने का नोटिस देते हैं, क्योंकि जिस तरह से वह लोकसभा की कार्यवाही का संचालन कर रहे हैं, वह खुले तौर पर पक्षपातपूर्ण है। कई अवसरों पर विपक्षी दलों के नेताओं को बोलने ही नहीं दिया गया, जबकि यह संसद में उनका मूल लोकतांत्रिक अधिकार है।”
विपक्ष ने नोटिस में कहा कि बीते 2 फरवरी को लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर बोलते समय अपना भाषण पूरा नहीं करने दिया गया। यह कोई अकेली घटना नहीं है, करीब-करीब हमेशा ही ऐसा होता है कि लोकसभा में विपक्ष के नेता को बोलने नहीं दिया जाता। उन्होंने दावा किया कि गत 3 फरवरी को विपक्ष के आठ सांसदों को पूरे बजट सत्र के लिए मनमाने ढंग से निलंबित कर दिया गया और उन्हें केवल अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का इस्तेमाल करने के लिए दंडित किया जा रहा है।
नोटिस में भाजपा सांसद निशिकांत दुबे का नाम लिए बगैर कहा गया है कि बीते 4 फरवरी 2025 को भारतीय जनता पार्टी के एक सांसद को दो पूर्व प्रधानमंत्रियों पर पूरी तरह आपत्तिजनक और व्यक्तिगत हमले करने की अनुमति दी गई और स्थापित परंपराओं व मर्यादा के मानदंडों की अवहेलना करने के बावजूद उन्हें एक बार भी नहीं टोका गया। हमारे अनुरोध के बावजूद इस सांसद के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई, जबकि वह आदतन ऐसी गतिविधियां करते हैं।
विपक्ष ने ओम बिरला द्वारा सदन में 5 फरवरी को दिए गए उस वक्तव्य का भी हवाला दिया जिसमें उन्होंने कहा था कि 4 फरवरी को कांग्रेस के कई सदस्य सदन के नेता (प्रधानमंत्री) की सीट के पास पहुंचकर किसी अप्रत्याशित घटना को अंजाम देना चाहते थे, इसलिए उनके अनुरोध पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सदन में नहीं आए। नोटिस में आरोप लगाया गया है कि ये टिप्पणियां कांग्रेस के सदस्यों के खिलाफ खुले तौर पर झूठे आरोप लगाने वाली और अपमानजनक प्रकृति की हैं। अध्यक्ष, जिन्हें कार्य-संचालन नियमों और संसदीय मर्यादा के मानकों का संरक्षक होना चाहिए, उन्होंने सदन के पटल से ऐसे बयान दिए जो इस संवैधानिक पद के दुरुपयोग को दर्शाते हैं। विपक्ष ने कहा, “हम लोकसभा अध्यक्ष को व्यक्तिगत रूप से सम्मान देते हैं, लेकिन जिस प्रकार से उन्होंने लगातार विपक्ष की आवाज को दबाने का प्रयास किया है, उससे हम अत्यंत आहत और व्यथित हैं।”









