नई दिल्ली। पीएम मोदी ने दिल्ली में ‘सेवा तीर्थ’ और कर्तव्य भवन 1 और 2 का उद्घाटन किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा, “आज हम सभी एक नए इतिहास को जन्म देते देख रहे हैं। आज विक्रम संवत 2082, फाल्गुन कृष्ण पक्ष, विजया एकादशी का महत्वपूर्ण पावन दिन है। 13 फरवरी का यह दिन भारत की विकास यात्रा में एक नए आरंभ का साक्षी बन रहा है।”
पुरानी इमारतें गुलामी की प्रतीक थीं। आज भारत की नई यात्रा शुरू हुई है। सेवा तीर्थ का दफ्तर जमीन से जुड़ा है। नई तकनीक पुरानी इमारतों में फिट नहीं थी। नई इमारतों से सरकार का खर्च कम होगा। हमने गुलामी की मानसिकता को बदलने का अभियान शुरू किया है। हमने वीरों के नाम पर नेशनल वॉर मेमोरियल बनाया। हमने पुलिस स्मारक बनाया। रेसकोर्स रोड का नाम बदलकर लोक कल्याण मार्ग रखा गया। यह केवल नाम बदलने का फैसला नहीं था, यह सत्ता के मिजाज को सेवा की भावना में बदलने का पवित्र प्रयास था।
प्रधानमंत्री ने कहा, 13 फरवरी का यह दिन देश की विकास यात्रा में एक नए आरंभ का साक्षी बन रहा है। शास्त्रों में विजया एकादशी का बहुत महत्व रहा है। इस दिन जिस संकल्प के साथ आगे बढ़ते हैं, उसमें विजय जरूर मिलती है। आज हम सभी विकसित भारत का संकल्प लेकर सेवा तीर्थ में, कर्तव्य भवन में प्रवेश कर रहे हैं। प्रधानमंत्री ने कहा, अपने लक्ष्य में विजयी होने का दैवीय आशीर्वाद हमारे साथ है।
आजादी के बाद देश के भविष्य को बनाने वाले कई जरूरी फैसले लिए गए। साउथ ब्लॉक और नॉर्थ ब्लॉक जैसी इमारतों में बड़े फैसले लिए गए, लेकिन यह याद रखना होगा कि ये इमारतें ब्रिटिश साम्राज्य की निशानी के तौर पर बनाई गई थीं। इन्हें बनाने का मकसद ब्रिटिश राज को मजबूत करना और देश को पीढ़ियों तक गुलाम बनाए रखना था।
पीएम मोदी ने कहा, साउथ ब्लॉक और नॉर्थ ब्लॉक जैसी इमारतें ब्रिटिश सोच की हुकूमत को लागू करने के लिए बनी थीं। आज सेवा तीर्थ और कर्तव्य भवन जैसी इमारतें देश की जनता की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए बनी हैं। यहाँ से होने वाले फैसले किसी महाराजा की सोच को नहीं, बल्कि 140 करोड़ देशवासियों की अपेक्षाओं को आगे बढ़ाने का आधार बनेंगे। इसी अमृत भावना के साथ मैं यह सेवा तीर्थ और कर्तव्य भवन भारत की जनता को समर्पित कर रहा हूँ।
प्रधानमंत्री ने कहा, जहाँ से देश चलता है वह जगह प्रभावी होनी चाहिए और प्रेरणादायी भी। इस समय 21वीं सदी का पहला क्वार्टर (तिमाही) पूरा हो चुका है। यह जरूरी है कि विकसित भारत की कल्पना केवल नीतियों और योजनाओं में ही नहीं, बल्कि हमारे कार्यस्थलों और इमारतों में भी दिखाई दे। साउथ और नॉर्थ ब्लॉक जैसी पुरानी इमारतों में जगह की कमी थी। सुविधाओं की अपनी सीमाएं थीं। करीब 100 साल पुरानी ये इमारतें भीतर से जर्जर होती जा रही थीं और भी कई चुनौतियां थीं, इन चुनौतियों के बारे में बताया जाना जरूरी है।










