महाराष्ट्र में आरक्षण की पृष्ठभूमि पूरे भारत के समान है, जो ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों को शिक्षा और नौकरियों में प्रतिनिधित्व प्रदान करने के लिए एक सकारात्मक प्रावधान है। राज्य में अनुसूचित जातियों (एससी), अनुसूचित जनजातियों (एसटी), अन्य पिछड़ा वर्गों (ओबीसी) और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (ईडब्ल्यूएस) के लिए आरक्षण है। हाल ही में, मराठा समुदाय को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (एसईबीसी) के तहत 10% आरक्षण देने के लिए मराठा आरक्षण विधेयक 2024 पारित किया गया था। इस विधेयक में 10 साल बाद आरक्षण की समीक्षा का भी प्रस्ताव है, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि यह समुदाय की आबादी के अनुपात में हो। भारत में आरक्षण एक सकारात्मक कदम की नीति है, जो सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े समुदायों को शिक्षा, रोजगार और राजनीति में समान अवसर प्रदान करती है। यह नीति संविधान के अनुच्छेद 15(4) और 16(4) के तहत प्रदान की गई है, जो राज्यों को पिछड़े वर्गों के उत्थान के लिए विशेष प्रावधान करने की अनुमति देते हैं। आरक्षण का मुख्य उद्देश्य सामाजिक न्याय सुनिश्चित करना और ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों को समाज की मुख्यधारा में शामिल करना है।
महाराष्ट्र में शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्गों के लिए कुल 52% आरक्षण दिया गया है, जिसमें ओबीसी 19%, डीटी/वीजे(ए) 3% एनटी(बी) 2.5%, एनटी(2) 3.5%, एनटी(3) 2% और एसबीसी 2% शामिल है। इन सभी को मिलाकर 32 प्रतिशत आरक्षण दिया गया है। जबकि अनुसूचित जातियों को 13 प्रतिशत और अनुसूचित जनजातियों को 7 प्रतिशत आरक्षण दिया गया है। मराठा समुदाय को 10 प्रतिशत है। आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग (ईडब्ल्यूएस) को आरक्षण प्राप्त है। वहीं महाराष्ट्र सरकार ने राज्य में सरकारी नौकरियों में अनाथों के लिए भी समानांतर 1% आरक्षण लागू किया है और मुसलमानों में 37 जातियां ओबीसी में शामिल हैं। महाराष्ट्र में ओबीसी समुदाय में 346 से ज़्यादा जातियों को आरक्षण मिला हुआ है। महाराष्ट्र में पिछड़ी जातियों में अनुसूचित जातियां, अनुसूचित जनजातियां, अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), विशेष पिछड़ा वर्ग, निर्वासित जातियां और खानाबदोश जनजातियां (बी, सी, डी) शामिल हैं। महाराष्ट्र में 59 अनुसूचित जातियां हैं, जिनमें मुख्य हैं महार, मांग, चम्भार। महाराष्ट्र में 77 अनुसूचित जनजातियां हैं। महाराष्ट्र में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) समुदाय के अंतर्गत 346 से ज़्यादा जातियां पंजीकृत हैं। बेराद, भामटा, कैकाडी कुछ विमुक्त जातियां और खानाबदोश जनजातियां हैं।
भारत में मराठा समुदाय के बारे में प्रमुख तथ्य
योद्धाओं और शासकों की विरासत : मराठा भारत में एक प्रमुख समुदाय है, जो मुख्य रूप से महाराष्ट्र राज्य में पाया जाता है। ऐतिहासिक रूप से वे इस क्षेत्र के योद्धा और शासक रहे थे, जो 17वीं शताब्दी में शिवाजी द्वारा स्थापित मराठा साम्राज्य के तहत अपने सैन्य कौशल एवं नेतृत्व के लिये जाने जाते थे। सामाजिक संरचना: समय के साथ मराठे कृषि, व्यापार एवं राजनीति सहित विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय हुए। जबकि मराठों के ऊपरी वर्ग (देशमुख, भोंसले, मोरे, शिर्के, जाधव आदि) क्षत्रिय हैं, शेष अन्य मुख्य रूप से कुणबी नामक कृषक उपजाति से संबंधित हैं। महाराष्ट्र से बाहर प्रभाव: गायकवाड़ (बड़ौदा, गुजरात), सिंधिया (ग्वालियर, मध्य प्रदेश) और भोंसले (तंजावुर, तमिलनाडु) महाराष्ट्र के बाहर बस गए शक्तिशाली मराठा राजवंशों के कुछ उदाहरण हैं।
मराठा आंदोलन और सरकार
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस एक बार फिर विपक्ष पर भारी पड़े। दो सितंबर की शाम तक मनोज जरांगे पाटिल का मराठा आंदोलन सरकार के लिए बड़ा सिरदर्द बनता दिख रहा था। इसकी बड़ी मुंबई में मराठाओं की उपस्थिति से बिगड़ी स्थिति और विपक्ष का जरांगे को बढ़ता समर्थन था। राजनीतिक दल भी मान रहे थे कि फडणवीस कैसे इस चुनौती का सामना करेंगे, लेकिन मंगलवार को बॉम्बे हाईकोर्ट में सुनवाई से पहले ही मुख्यमंत्री फडणवीस ने पूरी बाजी को पलट दिया। यह सही है कि सरकार ने मनोज जरांगे की आठ में से करीब 6 मांगें मानी। जरांगे ने जीआर मिलने के बाद अनशन खत्म करने का ऐलान भी कर दिया। मराठा आरक्षण आंदोलन के लिए मंगलवार (3 सितंबर)का दिन मंगल साबित हुआ। देर रात तक मुंबई का आजाद मैदान और आसपास के इलाके खाली हो गये। महाराष्ट्र के कोने-कोने से आए मराठा विजय जश्न मनाते हुए लौट गये। इससे पहले फडणवीस ने जो निर्णय लिया उसने विपक्ष को पूरी तरह से चकित कर दिया। एक तरफ मराठा आंदोलन खत्म करवाया वहीं दूसरी ओर ओबीसी समुदाय को मनाने के लिए समिति का गठन किया। खास बात तो यह की नाराज चल रहे छगन भुजबल को भी समिति में शामिल किया। सीएम फडणवीस ने मनोज जरांगे पाटिल की मांगों और उनके सीधे प्रहार वाले बयानों पर संयम बनाए रखा। वहीं मराठा आंदोलन को समाप्त करने के लिए मराठा नेताओं को सामने किया। मराठा कार्यकर्ता जरांगे ने फडणवीस की तुलना गिरगिट से की लेकिन मुख्यमंत्री ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। मुंबई में जिस तरह के हालात थे। उसके बाद फडणवीस ने बड़ी ही समझदारी से काम लिया। उन्होंने सिर्फ यही कहा कि वे मराठा विरोधी नहीं है और कानून के हिसाब से मराठा आरक्षण पर निर्णय लिया जाएगा। हम संवैधानिक रास्ता तलाश कर रहे है। जरांगे के आंदोलन के बाद बनी स्थिति के आकलन के बाद फडणवीस एक्टिव थे। उन्होंने राधाकृष्ण विखे पाटिल (भाजपा) की अगुवाई में माणिक राव कोकाटे (अजित पवार), शिवेंद्र राजे भोसले (भाजपा), उदय सामंत (एकनाथ शिंदे) और जय कुमार गोरे (भाजपा) का प्रतिनिधिमंडल बनाया। इसके बाद इस आंदोलन खत्म कराने की जिम्मेदारी सौंपी। सीएम ने ही उन्हें मनोज जरांगे के पास भेजा। सभी मराठा नेताओं को भेजने दांव सही रहा। इसमें राधाकृष्ण विखे पाटिल काफी वरिष्ठ नेता है। फडणवीस ने इन नेताओं के साथ पहली मीटिंग ली थी। मराठा आंदोलन में मनोज जरांगे पाटिल की मांगों को मान करके फडणवीस ने उस विरोध को धवस्त कर दिया, जिसमें यह कहने की कोशिश हो रही थी कि मुख्यमंत्री मराठा विरोधी हैं। दूसरी ओर मराठा आरक्षण आंदोलन के बीच, महाराष्ट्र सरकार ने अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) समुदाय से जुड़े मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए एक कैबिनेट उपसमिति का गठन किया । यह उपसमिति ओबीसी आबादी के सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक विकास से संबंधित कार्यक्रमों और योजनाओं पर काम करेगी। वरिष्ठ भाजपा नेता चंद्रशेखर बावनकुले को उपसमिति का अध्यक्ष नियुक्त किया। समिति में निम्नलिखित सदस्य में छगन भुजबल,गणेश नाइक, गुलाबराव पाटिल, संजय राठौड़, पंकजा मुंडे, अतुल सावे और दत्तात्रय भारणे का नाम शामिल है। वहीं उपसमिति की राजनीतिक संरचना में भाजपा के 4 सदस्य, शिवसेना के 2 सदस्य और राकांपा के 2 सदस्य शामिल किया गया।
मुख्यमंत्री के इस फैसले का विपक्ष भी उनका मुरीद हो गया। फडणवीस के कट्टर आलोचक शिवसेना (यूबीटी) नेता संजय राउत ने मराठा आरक्षण आंदोलन के समाधान का श्रेय मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को दिया। उन्होंने कहा कि सीएम फडणवीस ने पर्दे के पीछे से काम किया। वह मराठा आरक्षण पर कैबिनेट की उप-समिति के साथ विचार-विमर्श में शामिल थे। साथ ही मराठा आरक्षण आंदोलन के समाधान और कार्यकर्ता मनोज जरांगे की भूख हड़ताल समाप्त कराने का श्रेय दिया। राउत का यह बयान भाजपा नेता की दुर्लभ सराहना मानी गई, क्योंकि राउत भाजपा और सीएम फडणवीस के कट्टर आलोचक रहे हैं। राउत ने कहा कि अगर सरकार ने इस मुद्दे को सुलझाया है और जरांगे की जान बचाई है, तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए। राउत ने कहा, देवेंद्र फडणवीस इस मुद्दे के समाधान के लिए विचार-विमर्श में शामिल थे। वह पृष्ठभूमि में काम कर रहे थे। सारा श्रेय फडणवीस को जाना चाहिए। राउत ने जरांगे और मराठा प्रदर्शनकारियों द्वारा मुख्यमंत्री की कड़ी आलोचना का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा, मैं फडणवीस के धैर्य की भी सराहना करूंगा। उन्होंने ने कहा कि जब जरांगे अपना अनशन शुरू करने मुंबई आए, तो भाजपा नेताओं ने अलग भाषा बोली। सीएम फडणवीस को छोड़कर भाजपा नेताओं ने अत्यधिक नफरत फैलाने की कोशिश की। आरक्षण नीति भारत में एक सबल एवं समावेशी समाज को बढ़ावा देने के लिये एक महत्त्वपूर्ण साधन के रूप में कार्य करती है, लेकिन इसकी प्रभावशीलता समाज के सबसे हाशिये पर स्थित वर्गों के उत्थान की क्षमता पर निर्भर करती है। हालांकि, जब व्यक्तिगत लाभ के लिये आरक्षण लाभों का दुरुपयोग या हेरफेर किया जाता है तो यह नीति की अखंडता को कमज़ोर कर सकता है और असमानताओं को बनाये रख सकता है। भारत में वंचितों के वास्तविक कल्याण पर ध्यान केंद्रित कर और सामाजिक-आर्थिक सशक्तीकरण के लिये पूरक उपायों को लागू कर ऐसे भविष्य की ओर आगे बढ़ सकता है जहां सभी के लिये समानता, अवसर और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त हो।
मरठाओं को ओबीसी में शामिल करने के विरोध में मंत्री
इसी बीच महाराष्ट्र के कैबिनेट मंत्री छगन भुजबल ने कहा है कि ओबीसी कोटे में किसी भी जाति को गैरकानूनी तरीके से शामिल नहीं किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के कई फैसले इस मामले में बिल्कुल स्पष्ट हैं। मराठा और कुणबी जातियां अलग-अलग हैं। मराठा-कुणबी एक हैं कहना सामाजिक रूप से गलत है और कोर्ट के आदेशों के खिलाफ भी। छगन भुजबल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट और पिछड़ा वर्ग आयोग पहले ही यह साफ कर चुके हैं कि मराठा समुदाय को ओबीसी वर्ग में नहीं जोड़ा जा सकता। भुजबल ने चेतावनी दी कि अगर ओबीसी के हक के साथ खिलवाड़ हुआ, तो वे भी आंदोलन और विरोध प्रदर्शन करने को मजबूर होंगे।
कैबिनेट मंत्री ने कहा कि ओबीसी के लिए निर्धारित 27 प्रतिशत आरक्षण में से छह प्रतिशत खानाबदोश जनजातियों के लिए, दो प्रतिशत गोवारी समुदाय के लिए और अन्य छोटे हिस्से विभिन्न समूहों के लिए निर्धारित हैं। केवल 17 प्रतिशत आरक्षण है और यह भी 374 समुदायों के बीच साझा किया जाता है। ऐसे में अगर और जातियों को इसमें जोड़ा गया, तो यह सरासर अन्याय होगा। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर कल कोई कहे कि मुझे दलितों में शामिल करो, तो क्या हम मान लेंगे? देश में कानून और संविधान है, फैसले उन्हीं के आधार पर होंगे। छगन ने कहा कि मैं हाथ जोड़कर अनुरोध करता हूं कि मराठाओं को ओबीसी में शामिल नहीं किया जाना चाहिए।
–रविकांत तिवारी, नागपुर (महाराष्ट्र)






