पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है और यह संज्ञा अपने आप में ही उसकी गंभीरता और महत्व को व्यक्त करती है। प्राचीन काल से ही समाज में संवाद और सूचना का आदान-प्रदान विभिन्न माध्यमों से होता रहा है। कभी यह काम मौखिक कथाओं, लोकगीतों और भाटों-चारणों के माध्यम से होता था, तो आधुनिक युग में छापाखाने और प्रिंट मीडिया ने इसे व्यवस्थित और संस्थागत रूप दिया। बीसवीं सदी में रेडियो और टेलीविज़न ने पत्रकारिता की दिशा ही बदल दी। परंतु इक्कीसवीं सदी के शुरुआती वर्षों में जब इंटरनेट और स्मार्टफोन का प्रसार हुआ तो पत्रकारिता की पूरी संरचना हिल गई। सोशल मीडिया ने पत्रकारिता के स्वरूप और सरोकार दोनों को गहराई से प्रभावित किया। इसने जहाँ पत्रकारिता को लोकतांत्रिक और त्वरित बनाया, वहीं अनेक जटिल चुनौतियाँ भी सामने रख दीं। इसीलिए कहा जाता है कि सोशल मीडिया पत्रकारिता के लिए दोधारी तलवार है।
सोशल मीडिया दरअसल डिजिटल युग का वह मंच है जहाँ हर व्यक्ति केवल सूचना का उपभोक्ता नहीं बल्कि उत्पादक भी बन गया है। फेसबुक, ट्विटर (अब एक्स), यूट्यूब, इंस्टाग्राम, व्हाट्सऐप और टेलीग्राम जैसे प्लेटफॉर्म ने सूचना प्रसार की गति को इतना तेज़ कर दिया है कि कुछ ही सेकंड में कोई भी संदेश लाखों लोगों तक पहुँच सकता है। पहले पत्रकार और संपादक ही तय करते थे कि कौन सी खबर जनता तक जाएगी, लेकिन अब हर नागरिक अपने मोबाइल फोन से फोटो और वीडियो लेकर दुनिया तक पहुँचा सकता है। इस लोकतंत्रीकरण ने पत्रकारिता की परिभाषा ही बदल दी।
पत्रकारिता में सोशल मीडिया का सबसे बड़ा योगदान सूचना की गति और पहुँच में वृद्धि है। उदाहरण के लिए जापान में जब 2011 का विनाशकारी भूकंप आया, तो सबसे पहले वहाँ के नागरिकों ने ट्विटर और फेसबुक पर तस्वीरें और वीडियो साझा किए। इसी तरह भारत में 2014 में जब जम्मू-कश्मीर में भीषण बाढ़ आई, तो व्हाट्सऐप पर साझा किए गए वीडियो और ट्वीट्स ने राष्ट्रीय मीडिया को घटनास्थल की वास्तविक स्थिति से अवगत कराया। कोविड-19 महामारी के दौरान भी ट्विटर और फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म सबसे बड़े सूचना केंद्र बने। अस्पतालों में बेड की कमी, ऑक्सीजन की तलाश, दवाइयों की जानकारी ये सब सबसे पहले सोशल मीडिया पर ही साझा होते रहे।
सोशल मीडिया ने नागरिक पत्रकारिता को जन्म दिया। अब कोई भी नागरिक पत्रकार की तरह सूचना साझा कर सकता है। दिल्ली दंगों से लेकर किसान आंदोलन तक, कई घटनाओं के पहले प्रमाण सोशल मीडिया पर ही सामने आए। इससे पारंपरिक मीडिया को नई दिशा मिली और कई बार उनकी लापरवाही या चूक को उजागर किया गया। यही नहीं, सोशल मीडिया ने उन आवाज़ों को भी मंच दिया जिन्हें मुख्यधारा का मीडिया अक्सर नज़रअंदाज़ कर देता था। दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं से जुड़ी समस्याएँ अब सीधे वैश्विक विमर्श का हिस्सा बनने लगी हैं। #MeToo आंदोलन इसका बड़ा उदाहरण है, जिसने न केवल पश्चिमी देशों बल्कि भारत में भी महिलाओं को हिंसा के खिलाफ अपनी कहानियाँ साझा करने का साहस दिया।
जनसहभागिता के लिहाज़ से भी सोशल मीडिया ने पत्रकारिता को नया आयाम दिया। पहले पत्रकार और जनता के बीच एकतरफ़ा संवाद होता था। लेकिन अब पाठक और दर्शक तुरंत अपनी प्रतिक्रिया दे सकते हैं, सवाल पूछ सकते हैं और तथ्य चुनौती दे सकते हैं। इससे पत्रकारिता की पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ी है। हैशटैग और ट्रेंड्स ने यह स्पष्ट कर दिया कि जनता किन मुद्दों को लेकर सजग है। कई बार पारंपरिक मीडिया ने जिन मुद्दों को नज़रअंदाज़ किया, सोशल मीडिया ने उन्हें मजबूती से उठाया और मुख्यधारा में शामिल करने पर मजबूर कर दिया।
वैश्विक स्तर पर भी सोशल मीडिया ने पत्रकारिता और आंदोलनों को नया बल दिया है। अरब स्प्रिंग इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जब मिस्र, ट्यूनिशिया, लीबिया और सीरिया जैसे देशों में तानाशाही विरोधी आंदोलन सोशल मीडिया की वजह से ही व्यापक हुए। मिस्र के तहरीर स्क्वेयर का आंदोलन फेसबुक और ट्विटर के ज़रिए संगठित हुआ और पूरी दुनिया ने उसे लाइव देखा। यूक्रेन के यूरोमैदान आंदोलन ने ट्विटर पर हैशटैग की ताकत दिखाई। सूडान में सरकार विरोधी प्रदर्शनों को फेसबुक और ट्विटर ने वैश्विक पहचान दी। अमेरिका में नस्लीय भेदभाव के खिलाफ़ #BlackLivesMatter आंदोलन ने दिखाया कि एक हैशटैग पूरी दुनिया की सोच को प्रभावित कर सकता है।
भारत में भी सोशल मीडिया का प्रभाव गहरा है। 2014 से लेकर 2024 तक हर चुनाव में सोशल मीडिया प्रचार का केंद्रीय माध्यम बना। राजनीतिक दल अब करोड़ों रुपये फेसबुक विज्ञापनों, यूट्यूब कैंपेन और ट्विटर ट्रेंड्स पर खर्च करते हैं। 2019 के आम चुनावों को तो सोशल मीडिया इलेक्शन कहा गया। किसान आंदोलन में ट्विटर पर #FarmersProtest ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा पैदा की। सीएए और एनआरसी विरोधी आंदोलन में शाहीन बाग की लाइव स्ट्रीमिंग और हैशटैग्स ने आंदोलन को मजबूती दी। कई बार विदेशी नेताओं और सेलिब्रिटीज़ ने भी इन आंदोलनों का समर्थन सोशल मीडिया पर किया।
लेकिन इस चमकदार तस्वीर के पीछे कई स्याह पहलू भी हैं। सबसे बड़ी समस्या है फेक न्यूज़। अफवाहें और गलत सूचनाएँ अब पहले से कहीं तेज़ी से फैलती हैं। भारत में इसे ही व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी कहा जाने लगा। कई बार अफवाहों ने सीधे हिंसा और जानलेवा घटनाओं को जन्म दिया। बच्चों के अपहरण की अफवाहें हों या मांस से जुड़े झूठे वीडियो, कई जगह निर्दोष लोग भीड़ की हिंसा का शिकार बने।
पत्रकारिता में भी सटीकता से अधिक गति को महत्व देने की प्रवृत्ति बढ़ी है। सबसे पहले खबर देने की होड़ में कई बार पत्रकार बिना सत्यापन के सूचनाएँ साझा कर देते हैं, जिससे उनकी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लग जाता है। एल्गोरिद्म आधारित प्लेटफॉर्म समाज को वैचारिक रूप से बाँटने का काम कर रहे हैं। लोग केवल वही सामग्री देखते हैं जो उनकी सोच से मेल खाती है। इस प्रक्रिया को इको चेंबर या फ़िल्टर बबल कहा जाता है, जिससे समाज में ध्रुवीकरण गहराता है।
सोशल मीडिया का एक और नकारात्मक पहलू है ऑनलाइन ट्रोलिंग और उत्पीड़न। पत्रकार, खासकर महिला पत्रकार, लगातार धमकियों और अभद्र टिप्पणियों का सामना करती हैं। इससे उनके मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है और कई बार आत्म-सेंसरशिप की प्रवृत्ति भी जन्म लेती है।
इन चुनौतियों के बीच पत्रकारिता की शिक्षा और प्रशिक्षण में भी बदलाव आवश्यक हो गया है। अब पारंपरिक रिपोर्टिंग कौशल के साथ-साथ डिजिटल साक्षरता, डेटा पत्रकारिता, मोबाइल जर्नलिज़्म और फैक्ट-चेकिंग जैसे कौशल अनिवार्य हो गए हैं। भारत में आईआईएमसी, जामिया मिल्लिया इस्लामिया और माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों ने डिजिटल पत्रकारिता के विशेष कोर्स शुरू किए हैं। लेकिन केवल पत्रकारों की शिक्षा पर्याप्त नहीं है। आम जनता को भी मीडिया साक्षरता सिखाना ज़रूरी है ताकि वे फेक न्यूज़ और तथ्यात्मक खबरों में अंतर कर सकें।
कुछ सकारात्मक पहल भी सामने आई हैं। ऑल्ट न्यूज़, बूम लाइव, फैक्ट्री जैसे फैक्ट-चेकिंग संस्थान गलत सूचनाओं की पहचान कर रहे हैं। एक्स (ट्विटर) और फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म ने भी कई बार फर्जी अकाउंट और झूठे पोस्ट हटाने की पहल की है। भारत सरकार ने भी आईटी नियमों के तहत डिजिटल प्लेटफॉर्म को जवाबदेह बनाने की कोशिश की है, हालाँकि इस बात का ध्यान रखना आवश्यक है कि यह सेंसरशिप का रूप न ले। पत्रकारिता की स्वतंत्रता और जनता के अभिव्यक्ति के अधिकार पर कोई अंकुश न लगे, इसके लिए संतुलन बनाना होगा।
समग्र रूप से देखा जाए तो सोशल मीडिया ने पत्रकारिता को अधिक लोकतांत्रिक, त्वरित और सहभागी बनाया है। इसने उन आवाज़ों को मंच दिया जिन्हें कभी मुख्यधारा के मीडिया ने नहीं सुना। वैश्विक आंदोलनों को सोशल मीडिया ने ही शक्ति दी है। लेकिन साथ ही इसने फेक न्यूज़, ध्रुवीकरण और पत्रकारों पर मानसिक दबाव जैसी गंभीर चुनौतियाँ भी खड़ी की हैं। यही कारण है कि सोशल मीडिया को पत्रकारिता की दोधारी तलवार कहा जाता है।
भविष्य की पत्रकारिता उसी की होगी जो इस दोधारी तलवार का संतुलित प्रयोग कर सकेगा। वह पत्रकार सफल होगा जो डिजिटल टूल्स और सोशल मीडिया की शक्ति का उपयोग करते हुए भी सत्य, निष्पक्षता और जनता के प्रति जवाबदेही को सर्वोपरि रखेगा। सोशल मीडिया के इस युग में पत्रकारिता का असली कार्य वही रहेगा जो शुरुआत से रहा है सत्य का अन्वेषण और जनता की आवाज़ को बुलंद करना।
लेख – राजेश सारथी (पत्रकार व शोधार्थी)









