नागपुर। जल संसाधन विभाग के अपर मुख्य सचिव दीपक कपूर ने जानबूझकर नागपुर में 2024 के आम चुनाव के मतदान के दौरान एक बैठक आयोजित की, जिसके परिणामस्वरूप बैठक में उपस्थित अधिकारियों और कर्मचारियों को अपने संवैधानिक मतदान अधिकार का त्याग करना पड़ा। एक तरह से, महाराष्ट्र सरकार के आईएएस अधिकारी दीपक कपूर ने जल संसाधन अधिकारियों और कर्मचारियों के अधिकारों का उल्लंघन करके घोर पाप किया है। विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, दीपक कपूर बैठक के अवसर पर अपनी लाडली से मिलने नागपुर आए थे। दीपक कपूर की पुरानी तरकीब यह है कि वे बार-बार सरकार को यह विश्वास दिलाते हैं कि मैं छुट्टियों में भी काम करता हूँ और मेरे जैसा कर्तव्यनिष्ठ और बुद्धिमान अधिकारी कोई और नहीं है। उनके बारे में यह बात सही न होने पर भी एक बार मान लेंगे, लेकिन बैठक के अवसर पर उन्होंने एक बहुत गंभीर अपराध किया है।
उन्होंने पश्चिमी विदर्भ में मतदान के दिन सुबह नागपुर स्थित विदर्भ सिंचाई विकास निगम में यवतमाल, अमरावती, अकोला, वाशिम और बुलढाणा जिलों के जल संसाधन विभाग के अधिकारियों की बैठक बुलाई। महाराष्ट्र सरकार द्वारा मतदान के दिन छुट्टी घोषित किए जाने के बावजूद, उन्होंने जानबूझकर अधिकारियों को बैठक के लिए नागपुर बुलाया। कर्मचारी भी अधिकारियों के साथ आए। लोकतंत्र के सबसे बड़े पर्व के अवसर पर मतदान न कर पाने के अफसोस के बावजूद, कर्मचारी और अधिकारी यम से भी अधिक भय के कारण बैठक के लिए नागपुर में ही डेरा डाले रहे। अधिकारी सुबह 5:30 बजे नागपुर के लिए रवाना हो गए थे, इसलिए वे वोट नहीं डाल सके।
घटना की सूचना मिलते ही हंगामा शुरू हो गया। दीपक कपूर ने दबाव बनाकर कुछ अधिकारियों से ‘मैंने वोट दिया’ लिखवाया। उन्होंने अपनी रक्षा के लिए धमकी भरे शब्दों का भी इस्तेमाल किया। उन्हें यह भी चेतावनी दी गई कि अगर वे वोट नहीं डालेंगे तो उनकी पदोन्नति (Promotion) रोक दी जाएगी और कुछ मामलों में कार्रवाई भी की जा सकती है। नाम न छापने की शर्त पर कुछ अधिकारियों ने हमें बताया कि उनसे जबरदस्ती अपने मतदान के अधिकार का प्रयोग करने का मसौदा लिखवाया गया था। आने वाले दिनों में उन्हें ऊपर के पदों पर पदोन्नत किया जाएगा; इसमें कार्यकारी निदेशक पद तक पदोन्नति हो सकती है। पता चला है कि उनमें से कई ने अपनी पदोन्नति को महत्वपूर्ण मानते हुए मुँह पर उंगलियाँ रखकर कागज पर वही लिख दिया जो कपूर साहब ने बोला।
दीपक कपूर ने चाहे जो भी लिखवा लिया हो, छुट्टी के दिन, जब लोकतंत्र का त्योहार चल रहा हो, किसी के मताधिकार को इस तरह छीनना वाकई सोचने पर मजबूर करता है। इतना गंभीर अपराध होने के बावजूद सरकार और प्रशासन इस पर आँख मूँद कर चुप बैठे हैं। अपराध होने के बाद उनके खिलाफ निलंबन की कार्रवाई क्यों नहीं की गई? ऐसे कई उदाहरण दिए जा सकते हैं जहाँ चुनाव आचार संहिता में छोटी सी भी गलती या चुनाव के दौरान लापरवाही बरतने पर अधिकारियों को निलंबित कर दिया जाता है। जब चुनाव संबंधी कार्यों में कोई अधिकारी गलती करता है, तो प्रशासन उसे नहीं बख्शता; तो फिर दीपक कपूर के साथ इतनी नरमी क्यों बरती जा रही है?
यह सवाल उठना लाजमी है कि मुख्य सचिव पद की दौड़ में शामिल इस भाप्रसे (IAS) अधिकारी को इतनी सरल समझ भी नहीं है कि मतदान के दिन सरकारी बैठक बुलाकर संबंधित अधिकारियों को मतदान से वंचित नहीं करना चाहिए? उन्होंने यह सोचकर यह कृत्य किया कि कोई उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता, जो निश्चित रूप से गंभीर है और संविधान का अपमान है। क्या उनके खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जाएगी? उन्होंने अब तक मुख्यमंत्री कार्यालय के नाम का दुरुपयोग किया है और निविदा (Tender) समितियों को दरकिनार कर काम किया है। फिलहाल जनता में यह फुसफुसाहट चल रही है कि क्या इस अधिकारी को इनाम के तौर पर छोड़ दिया जाएगा?
क्या बाबा साहेब का संविधान, जो 140 करोड़ भारतीयों पर लागू होता है, दीपक कपूर पर लागू नहीं होता? यह सब बातें प्रगतिशील महाराष्ट्र के लिए शर्मनाक साबित हो रही हैं। अगर दीपक कपूर की हरकतों से राज्य की छवि धूमिल हो रही है, तो क्या हम इसे बर्दाश्त करेंगे? जनता के मन में यह सवाल उठ रहा है कि क्या उनके खिलाफ सख्त और त्वरित कार्रवाई की जाएगी।









