नयी दिल्ली। उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश और राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नालसा) के कार्यकारी अध्यक्ष न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि न्यायपालिका को डिजिटल बहिष्कार, विस्थापन, जलवायु संवेदनशीलता और अंतरराष्ट्रीय प्रवास जैसी नई चुनौतियों से निपटने के लिए विकसित होने और नवाचार करने की आवश्यकता है। उन्होंने चेताया कि अन्यथा न्याय प्रणाली अपनी ही छाया में दब सकती है।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत यह बात कोलंबो में आयोजित बीएएसएल मानवाधिकार व्याख्यान के उद्घाटन सत्र में कह रहे थे, जिसका विषय था “हाशिये पर पड़े लोगों और अल्पसंख्यकों के मानवाधिकारों की प्राप्ति के लिए विधिक सहायता प्रणाली को मजबूत बनाना: भारतीय केस स्टडी”।
उन्होंने कहा कि भारत के कानूनी सहायता आंदोलन की कहानी लोकतंत्र की अंतरात्मा की कहानी है। यह दिखाती है कि एक जटिल समाज में भी दूरदर्शिता और संस्थागत इच्छाशक्ति के मेल से न्याय को वास्तविक बनाया जा सकता है।
सूर्यकांत ने आगे कहा कि जैसे-जैसे डिजिटल बहिष्कार, विस्थापन, जलवायु परिवर्तन और अंतरराष्ट्रीय प्रवास जैसी नई चुनौतियां सामने आ रही हैं, न्यायपालिका को अधिक नवाचार करना, पहुंच को आधुनिक बनाना और समावेशन को गहरा करना होगा। “न्याय को समाज के साथ विकसित होना होगा, अन्यथा उसे अपनी ही छाया में दब जाने का खतरा होगा।”
न्यायमूर्ति ने कहा कि धर्म के प्राचीन सिद्धांतों से लेकर नालसा की आधुनिक संरचना तक, भारत की यात्रा मानव गरिमा और न्याय की अंतिम व्यक्ति तक पहुंच सुनिश्चित करने की प्रतिबद्धता का प्रमाण है।
उन्होंने श्रीलंका और राष्ट्रमंडल के लिए भारत के अनुभव को प्रेरणादायी बताया और कहा, “जब न्याय सचमुच सुलभ होगा और हर नागरिक कानून के समक्ष मजबूती से खड़ा हो सकेगा, तभी स्वतंत्रता का वास्तविक उद्देश्य पूरा होगा।”
सूर्यकांत ने नालसा की भूमिका पर भी प्रकाश डाला, जो विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के तहत स्थापित होकर समाज के हाशिए पर रहने वाले लोगों तक कानूनी सहायता पहुँचाने का कार्य कर रही है।
न्यायपालिका को समय की आवश्यकताओं के अनुरूप बदलना होगा और नवीन तकनीक एवं रणनीतियों का उपयोग कर न्याय सुनिश्चित करना होगा।






