शक्कर के पारंपरिक हार-कंगनों की बिक्री धीमी
केमिकल रंगों से ज्यादा प्राकृतिक रंगों की मांग
नागपुर:नागपुर में इस वर्ष होली के अवसर पर बाजारों की रौनक कुछ फीकी नजर आ रही है। खासतौर पर पारंपरिक रूप से बिकने वाले शक्कर से बने हार और कंगनों की बिक्री बेहद धीमी बताई जा रही है। जहां पहले होली से आठ-दस दिन पूर्व ही बाजारों में इन पारंपरिक वस्तुओं की दुकानें सज जाती थीं और ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों से लोग उत्साहपूर्वक खरीदारी करने पहुंचते थे, वहीं इस बार त्योहार से ठीक एक दिन पहले दुकानें लगाई गईं और विक्रेता ग्राहकों का इंतजार करते दिखाई दिए।
व्यापारियों का कहना है कि बढ़ती महंगाई और बदलती जीवनशैली ने पारंपरिक वस्तुओं की मांग को प्रभावित किया है। बच्चों और युवाओं में अब शक्कर के हार-कंगनों को लेकर पहले जैसा आकर्षण नहीं रहा। परिणामस्वरूप इनकी बिक्री में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है।
वहीं दूसरी ओर होली और धुलीवंदन को देखते हुए बाजारों में रंग, पिचकारी, मुखौटे और ढोल की दुकानों पर चहल-पहल देखी जा रही है। खास बात यह है कि इस बार केमिकल युक्त रंगों के बजाय प्राकृतिक रंगों की मांग में वृद्धि हुई है। कई दुकानों पर ग्राहकों की भीड़ नजर आई, जबकि कुछ दुकानदार अब भी ग्राहकों के इंतजार में बैठे दिखाई दिए।
विक्रेताओं के अनुसार, प्राकृतिक रंगों के दाम पिछले वर्ष की तुलना में बढ़े हैं, इसके बावजूद लोग स्वास्थ्य को प्राथमिकता देते हुए इन्हें खरीद रहे हैं। हालांकि कुल मिलाकर बाजार में ग्राहकों की संख्या उम्मीद से कम ही बताई जा रही है।
त्योहार के ठीक पहले सजे रंग-बिरंगे बाजारों के बीच पारंपरिक मिठास की कमी साफ महसूस की जा रही है। अब देखना होगा कि होली के दिन बाजारों में रौनक लौटती है या नहीं।











