येवला शहर और तालुका में दिखी पारंपरिक हुनर की चमक
मकर संक्रांति के पर्व को लेकर येवला शहर और तालुका में खासा उत्साह और हलचल देखने को मिल रही है। जैसे ही मकर संक्रांति का नाम लिया जाता है, पतंग, तिलगुल और आपसी खुशियों का संगम लोगों के मन में ताज़ा हो जाता है। इसी उत्सव की तैयारियों में जुटे येवला के पारंपरिक पतंग की डोर बनाने वाले कारीगर इन दिनों दिन-रात मेहनत कर रहे हैं।
संक्रांति से पहले पतंग उड़ाने का शौक रखने वालों की संख्या बढ़ जाती है, जिसके चलते पतंग और डोर की मांग भी तेजी से बढ़ती है। इसी मांग को पूरा करने के लिए कारीगर बांस की सहायता से मजबूत और टिकाऊ पतंग की डोर तैयार कर रहे हैं। यह डोर न केवल पतंग उड़ाने में सहायक होती है, बल्कि वर्षों पुरानी कारीगरी और अनुभव का प्रतीक भी मानी जाती है।
कारीगर अलग-अलग मोटाई, लंबाई और गुणवत्ता की डोर बना रहे हैं, ताकि हर उम्र और हर वर्ग के पतंग प्रेमियों को उनकी पसंद के अनुसार सामग्री मिल सके। इन डोरों को तैयार करने में काफी मेहनत और समय लगता है, लेकिन कारीगरों के चेहरे पर संतोष और उत्साह साफ दिखाई देता है।
मकर संक्रांति का यह पर्व इन कारीगरों के लिए सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि रोज़गार का महत्वपूर्ण जरिया भी है। पारंपरिक हुनर को संजोए रखते हुए ये कारीगर संक्रांति के बाजार को रंग-बिरंगा और जीवंत बना रहे हैं। इनके हाथों से बनी पतंग की डोर न सिर्फ आसमान में उड़ती पतंगों को सहारा देती है, बल्कि संस्कृति और परंपरा को भी नई ऊंचाइयों तक पहुंचाती है।






