लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका पर विचार करते समय हमें यह स्वीकार करना होगा कि मीडिया केवल सूचना का साधन नहीं बल्कि समाज के विचारों को दिशा देने वाली शक्ति है, यह वह दर्पण है जो नागरिकों और शासकों दोनों के लिए सत्य का चेहरा उजागर करता है और यह वह मंच भी है जिस पर लोकतंत्र की असली नाटकशाला खेली जाती है, जहां जनता, सरकार, राजनीतिक दल और सामाजिक समूह सभी अपनी-अपनी भूमिका निभाते हैं, किंतु जैसे-जैसे समय बदलता है वैसे-वैसे इस भूमिका की जटिलता और चुनौती भी बढ़ती जाती है, आज का मीडिया केवल समाचार पत्र और रेडियो-टीवी तक सीमित नहीं बल्कि डिजिटल प्लेटफॉर्म, सोशल मीडिया नेटवर्क, यूट्यूब चैनल, व्हाट्सऐप ग्रुप और यहां तक कि इन्फ्लुएंसरों के व्यक्तिगत पन्नों तक फैल चुका है, जिससे एक ओर तो सूचना का लोकतंत्रीकरण हुआ है, लेकिन दूसरी ओर यह भ्रम, दुष्प्रचार और ध्रुवीकरण का हथियार भी बन गया है और यही स्थिति मीडिया को लोकतंत्र के लिए वरदान और अभिशाप दोनों बनाती है। लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका समझने के लिए हमें सबसे पहले यह जानना होगा कि मीडिया केवल खबरें सुनाने का काम नहीं करता, बल्कि यह नागरिकों को शिक्षित करता है, उन्हें लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जोड़ता है, सरकार को जवाबदेह ठहराता है और जनमत निर्माण का कार्य करता है, मीडिया के बिना लोकतंत्र अधूरा है क्योंकि अगर जनता तक सूचना नहीं पहुंचेगी तो वे सही निर्णय नहीं ले पाएंगे और यदि सत्ता की गतिविधियों पर निगरानी नहीं होगी तो जवाबदेही खत्म हो जाएगी, इसीलिए इसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा गया है, लेकिन आज का परिदृश्य बदल चुका है, पहले की अपेक्षा अब मीडिया की स्वतंत्रता पर कई तरह के खतरे मंडरा रहे हैं, कहीं कॉर्पोरेट दबाव है, कहीं राजनीतिक हस्तक्षेप है, कहीं विज्ञापन के माध्यम से नियंत्रण है और कहीं डिजिटल प्लेटफॉर्म के एल्गोरिद्म सूचना के प्रवाह को प्रभावित कर रहे हैं।
हाल के वर्षों में देखा गया कि मीडिया का एक बड़ा वर्ग निष्पक्षता से भटक कर पक्षपातपूर्ण रुख अपनाता जा रहा है, विशेषकर भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में जहां मीडिया की जिम्मेदारी और भी अधिक है क्योंकि यहां की सामाजिक संरचना बहुलतावादी है और यहां असमानता, जातीयता, धर्म और भाषा की विविधता के बीच निष्पक्ष सूचना ही लोकतंत्र को मजबूती दे सकती है, किंतु जब मीडिया सत्ता के साथ खड़ा होता है या विपक्ष को ही खलनायक की तरह प्रस्तुत करता है तब लोकतंत्र कमजोर होता है। हाल की घटनाओं पर नज़र डालें तो पता चलता है कि किस प्रकार भारत में मीडिया के बड़े चैनल सरकार की आलोचना करने से बचते हैं और विपक्षी दलों की रैलियों या आंदोलनों को सीमित कवरेज देते हैं, उदाहरण के लिए हाल ही में लद्दाख में सोनम वांगचुक का जलवायु अनशन राष्ट्रीय मीडिया में उचित स्थान नहीं पा सका जबकि वह भारत की पारिस्थितिकी और संस्कृति की रक्षा का बड़ा प्रतीक था, इसके विपरीत बॉलीवुड की हल्की-फुल्की गॉसिप या अपराध से जुड़ी सनसनीखेज खबरों को घंटों लाइव चलाया गया, यही असंतुलन दर्शाता है कि मीडिया का एजेंडा किस प्रकार बदल चुका है और किस प्रकार जनता के वास्तविक मुद्दे हाशिए पर धकेल दिए जाते हैं।
लोकतंत्र में मीडिया का महत्व इस बात से समझा जा सकता है कि जब भी किसी देश में अधिनायकवादी प्रवृत्तियाँ पनपती हैं तो सबसे पहले निशाना मीडिया पर ही साधा जाता है, पत्रकारों पर हमले होते हैं, उन पर मुकदमे दर्ज किए जाते हैं, विज्ञापन रोके जाते हैं और स्वतंत्र आवाजों को चुप कराने का प्रयास होता है, भारत में भी हाल के वर्षों में कई पत्रकारों को उनकी रिपोर्टिंग के कारण गिरफ्तार किया गया या उनके खिलाफ देशद्रोह जैसे गंभीर आरोप लगाए गए, जबकि पत्रकार का काम केवल सवाल पूछना होता है, मगर जब मीडिया भय के माहौल में काम करता है तो उसकी स्वतंत्रता स्वतः प्रभावित होती है। इसी तरह फर्जी खबरें और दुष्प्रचार भी लोकतंत्र को नुकसान पहुंचाते हैं, कोविड-19 महामारी के दौरान गलत सूचनाओं ने जनता को गुमराह किया, ऑक्सीजन की कमी जैसी वास्तविक समस्याओं को छिपाने की कोशिश हुई और सोशल मीडिया पर अफवाहों ने भय और अविश्वास का वातावरण पैदा किया, यही कारण है कि आज मीडिया साक्षरता को उतना ही जरूरी माना जाने लगा है जितना किसी नागरिक के लिए शिक्षा।
यदि हम वैश्विक संदर्भ में देखें तो ब्रिटेन, अमेरिका और यूरोप के कई हिस्सों में भी मीडिया की स्वतंत्रता पर सवाल उठते रहे हैं, ब्रिटेन में बीबीसी जैसी सार्वजनिक सेवा प्रसारण संस्था पर भी पक्षपात के आरोप लगे और ऑफकॉम जैसी संस्थाओं की भूमिका पर सवाल उठे, वहीं अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के शासनकाल में मीडिया और सत्ता का टकराव बार-बार सामने आया, वहां फेक न्यूज और सोशल मीडिया के माध्यम से ध्रुवीकरण इतना बढ़ गया कि कैपिटल हिल पर हिंसा जैसी घटनाएं घट गईं, यही स्थिति यह साबित करती है कि मीडिया केवल राष्ट्रीय नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय लोकतांत्रिक व्यवस्था का भी महत्वपूर्ण आधार है और जब यह कमजोर होता है तो लोकतंत्र भी संकट में पड़ता है।
भारत में मीडिया की चुनौतियाँ और भी गहरी हैं क्योंकि यहां मीडिया स्वामित्व का बड़ा हिस्सा कुछ कॉर्पोरेट घरानों के हाथ में है, जिनके अपने व्यावसायिक और राजनीतिक हित हैं, उदाहरण के लिए रिलायंस समूह का मीडिया पर व्यापक नियंत्रण संपादकीय स्वतंत्रता पर सवाल उठाता है, इसी तरह चुनावों के दौरान पेड न्यूज का चलन यह दिखाता है कि पत्रकारिता किस हद तक बिकाऊ हो सकती है, 2014 और उसके बाद के चुनावों में यह साफ दिखाई दिया कि किस प्रकार कुछ अखबारों और चैनलों ने विशेष राजनीतिक दलों को बढ़ावा दिया और विपक्ष की खबरों को दबा दिया, यही कारण है कि जनता का विश्वास मीडिया पर से लगातार घट रहा है और वे सोशल मीडिया के अनौपचारिक स्रोतों पर भरोसा करने लगे हैं, लेकिन सोशल मीडिया भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं क्योंकि वहां फर्जी खबरों और प्रोपेगेंडा का बोलबाला है, हाल ही में हरियाणा और उत्तर प्रदेश में गौ-रक्षा के नाम पर हुई मॉब लिंचिंग की खबरें सोशल मीडिया पर अलग-अलग रूपों में फैलाई गईं, कहीं पीड़ितों को अपराधी बताया गया तो कहीं अपराधियों को नायक, यह दर्शाता है कि मीडिया की जिम्मेदारी केवल सूचना देने तक सीमित नहीं बल्कि उसे सही और संतुलित तरीके से प्रस्तुत करना भी जरूरी है।
मीडिया ट्रायल भी भारत में लोकतंत्र के लिए एक चुनौती बन गया है, सुशांत सिंह राजपूत की मौत का मामला इसका उदाहरण है जिसमें असली जांच से पहले ही मीडिया ने एक अभिनेत्री को खलनायक घोषित कर दिया, उसके निजी जीवन की हर बात को सार्वजनिक किया और अदालत की निष्पक्ष जांच को प्रभावित किया, बॉम्बे हाईकोर्ट ने इसे स्वीकार किया कि मीडिया ने इस मामले को जिस तरह से प्रस्तुत किया वह न्यायिक प्रक्रिया में बाधा थी, यह केवल एक उदाहरण है लेकिन ऐसे अनगिनत मामले हैं जहां मीडिया ने अपनी सीमाएं लांघ दीं और पत्रकारिता को मनोरंजन का साधन बना दिया।
आज की घटनाओं को देखें तो मीडिया की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है, जलवायु परिवर्तन, बेरोजगारी, महंगाई, किसानों-मजदूरों के आंदोलन, महिला सुरक्षा, अल्पसंख्यकों के अधिकार, जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर के संकट, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया की स्थिति – इन सभी पर जनता को सही जानकारी देना और सत्ता को सवालों के घेरे में लाना मीडिया का कर्तव्य है, लेकिन जब यह जिम्मेदारी से बचकर केवल टीआरपी की दौड़ में लग जाता है तब लोकतंत्र कमजोर हो जाता है। हाल ही में संसद में पारित हुए विभिन्न विधेयकों पर मीडिया की भूमिका भी संदेहास्पद रही, कई चैनलों ने उन्हें बिना आलोचना के समर्थन दिया जबकि विपक्ष की चिंताओं को अनदेखा किया, यही पक्षपात जनता के लिए खतरनाक है क्योंकि वे अधूरी या गलत जानकारी पर आधारित निर्णय लेते हैं।
इस परिप्रेक्ष्य में मीडिया की जिम्मेदारी है कि वह अपनी आचार संहिता और नैतिकता को पुनः स्थापित करे, तथ्य-जांच को प्राथमिकता दे, फर्जी खबरों के खिलाफ अभियान चलाए, अल्पसंख्यकों और कमजोर वर्गों की आवाज को मंच प्रदान करे और सत्ता से कठिन सवाल पूछने का साहस दिखाए, साथ ही जनता की भी जिम्मेदारी है कि वे आलोचनात्मक सोच विकसित करें, हर खबर को बिना जांचे न मानें, विश्वसनीय स्रोतों पर भरोसा करें और मीडिया से पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग करें। सरकार की जिम्मेदारी भी कम नहीं है, उसे मीडिया की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करना चाहिए, पत्रकारों की सुरक्षा करनी चाहिए और नियामक संस्थाओं को निष्पक्ष रखना चाहिए, तभी लोकतंत्र मजबूत होगा।
अंततः लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका केवल सूचना देने या मनोरंजन करने तक सीमित नहीं है बल्कि यह लोकतंत्र की आत्मा है, यह वह शक्ति है जो जनता और सत्ता के बीच सेतु का काम करती है, यह वह प्रहरी है जो अन्याय और भ्रष्टाचार को उजागर करता है और यह वह शिक्षक है जो जनता को लोकतंत्र के महत्व को समझाता है, लेकिन यदि यह स्वयं भ्रष्ट, पक्षपाती और बिका हुआ हो जाए तो लोकतंत्र का पतन निश्चित है, इसलिए समय की मांग है कि मीडिया अपनी जिम्मेदारी को समझे, सत्ता उसे दबाने का प्रयास न करे और जनता उसे मजबूर करे कि वह सच्चाई और निष्पक्षता की राह पर चले, यही लोकतंत्र की रक्षा का सबसे बड़ा उपाय है और यही आज के भारत की सबसे बड़ी आवश्यकता भी।
–प्रणय गडपायले
परास्नातक, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा (महाराष्ट्र)








