नई दिल्ली | भारत में कोयले के आयात को घटाने और घरेलू उत्पादन बढ़ाने की सरकारी कोशिशों को झटका लगा है। कोल इंडिया लिमिटेड (CIL) की सहायक कंपनी साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (SECL) की 12 प्रमुख खनन परियोजनाएं समय सीमा से पीछे चल रही हैं।
देरी की मुख्य वजहों में पर्यावरण मंजूरी, भूमि अधिग्रहण और स्थानीय स्वीकृति में अड़चनें बताई जा रही हैं।
सरकार की ‘आत्मनिर्भर कोयला’ रणनीति को झटका
भारत सरकार ने कोयला आयात घटाकर आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लक्ष्य के तहत कोल इंडिया की उत्पादन क्षमता में भारी निवेश किया है।
लेकिन एसईसीएल की परियोजनाओं में देरी से उत्पादन लक्ष्य पर असर पड़ सकता है। कंपनी के मुताबिक, 12 परियोजनाएं तय समय सीमा से पीछे हैं, जबकि 18 परियोजनाएं योजना के अनुसार प्रगति पर हैं।
किन परियोजनाओं पर सबसे अधिक असर
रिपोर्ट के अनुसार, देरी का सामना कर रही प्रमुख परियोजनाओं में
अमादंड खुली खदान, आमगांव ओपन-कास्ट प्रोजेक्ट, और विजय पश्चिम भूमिगत खदान शामिल हैं।
इन परियोजनाओं की लागत श्रेणियाँ इस प्रकार हैं:
- 3 परियोजनाएं: 500 करोड़ रुपये से अधिक लागत वाली,
- 5 परियोजनाएं: 150–500 करोड़ रुपये के बीच,
- 2 परियोजनाएं: 100–150 करोड़ रुपये के बीच,
- 1 परियोजना: 50–100 करोड़ रुपये,
- 1 परियोजना: 20–50 करोड़ रुपये के बीच।
कुल 30 परियोजनाओं में 12 विलंबित
एसईसीएल के पास वर्तमान में कुल 30 सक्रिय खनन परियोजनाएं हैं। इनमें से 18 समय पर चल रही हैं और 12 विभिन्न प्रशासनिक तथा तकनीकी कारणों से पीछे हैं।
कंपनी का कहना है कि प्रभावित परियोजनाओं को पुनः ट्रैक पर लाने के लिए भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया को तेज करने और पर्यावरण मंजूरी के लिए मंत्रालयों से समन्वय बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।
16.74 करोड़ टन उत्पादन और आने वाला लक्ष्य
वित्त वर्ष 2024-25 में एसईसीएल ने 16.74 करोड़ टन कोयले का उत्पादन किया था। कंपनी की खदानें मुख्य रूप से छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के कोल बेल्ट में फैली हुई हैं।
कोल इंडिया ने चालू वित्त वर्ष में कुल 850 मिलियन टन से अधिक उत्पादन का लक्ष्य रखा है, जिसमें एसईसीएल का योगदान अहम माना जा रहा है।
एसईसीएल की परियोजनाओं में देरी केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि देश की ऊर्जा आत्मनिर्भरता के लक्ष्य के लिए एक बड़ी चुनौती है।
यदि भूमि अधिग्रहण और पर्यावरणीय मंजूरियों की प्रक्रिया में तेजी नहीं आई, तो भारत को निकट भविष्य में कोयले के आयात पर दोबारा निर्भर होना पड़ सकता है।






