नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने देशभर में विभिन्न अदालतों में लंबित 8,82,578 निष्पादन याचिकाओं (Execution Petitions) की संख्या को बेहद चिंताजनक और निराशाजनक करार दिया है। ये याचिकाएं उन सिविल विवादों में दायर की जाती हैं, जिनमें डिक्री धारक न्यायालय के आदेशों को लागू करने की मांग करता है।
न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति पंकज मिथल की पीठ ने छह मार्च के आदेश के अनुपालन की समीक्षा करते हुए यह टिप्पणी की। उच्चतम न्यायालय ने छह मार्च के अपने आदेश में सभी उच्च न्यायालयों को निर्देश दिया था कि वे अपने अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले सिविल न्यायालयों को निर्देश दें कि वे छह महीने के भीतर निष्पादन याचिकाओं का निपटान करें। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया था कि पीठासीन अधिकारी निष्पादन कार्य में किसी भी प्रकार की देरी के लिए जिम्मेदार होंगे।
पीठ ने अपने 16 अक्टूबर के आदेश में कहा, “हमें जो आंकड़े मिले हैं, वे बेहद निराशाजनक हैं। छह मार्च से पिछले छह महीनों में केवल 3,38,685 निष्पादन याचिकाओं का निपटारा किया गया। यदि डिक्री पारित होने के बाद निष्पादन में वर्षों लगेंगे, तो यह न्याय का उपहास होगा।”
उच्चतम न्यायालय ने सभी उच्च न्यायालयों से अनुरोध किया है कि वे ऐसी प्रक्रिया विकसित करें जिससे जिला न्यायालयों में लंबित निष्पादन याचिकाओं का शीघ्र और प्रभावी निपटान हो सके। हालांकि, न्यायालय ने कर्नाटक उच्च न्यायालय पर भी टिप्पणी की कि इस संबंध में आवश्यक आंकड़े उपलब्ध कराने में वह विफल रहा है।
इस आदेश के बाद अब अदालतों में निष्पादन याचिकाओं के लंबित मामलों के शीघ्र निपटान पर विशेष निगरानी बढ़ने की संभावना है, ताकि सिविल न्याय प्रक्रिया में देरी का प्रभाव समाप्त किया जा सके और जनता के विश्वास में वृद्धि हो।











