गुद्दलपेंडी: शक्ति के साथ सद्भाव का संदेश
शताब्दी पुरानी विरासत का भव्य उत्सव
महाराष्ट्र के यवतमाळ जनपद के वाणी नगर में धुलंडी के अवसर पर पारंपरिक ‘गुद्दलपेंडी’ खेल का भव्य आयोजन किया गया। हजारों दर्शकों की उपस्थिति में यह अनोखी परंपरा पूरे उत्साह और उल्लास के साथ संपन्न हुई। ढोल-नगाड़ों की गूंज और जनसमूह के जयघोष से पूरा वातावरण उत्सवमय हो उठा।
नगर के दक्षिणी भाग में स्थित प्राचीन रंगनाथ स्वामी मंदिर के समक्ष मैदान में विशेष व्यवस्था की गई थी। लगभग तीस से चालीस फुट की दूरी पर दो मजबूत खंभे स्थापित कर उनके बीच एक मोटी रस्सी बांधी गई। सांध्यकाल में अंधकार फैलते ही प्रतियोगिताएं आरंभ हुईं। खेल की पद्धति अत्यंत विशिष्ट है। दो प्रतिभागी आमने-सामने खड़े होकर एक हाथ से रस्सी पकड़ते हैं और दूसरे हाथ से प्रतिद्वंद्वी पर प्रहार करते हैं। यदि किसी का हाथ छूट जाता है या संतुलन बिगड़ता है तो उसे पराजित घोषित किया जाता है। प्रत्येक मुकाबला दो से पांच मिनट तक चलता है और अंत में दोनों प्रतिभागी गले मिलकर प्रतिस्पर्धा समाप्त करते हैं।
इस आयोजन में बालकों से लेकर वरिष्ठ नागरिकों तक सभी आयु वर्ग के लोग भाग लेते हैं। कुछ ही घंटों में सैकड़ों मुकाबले संपन्न होते हैं। स्थानीय मान्यता है कि यह केवल शक्ति प्रदर्शन नहीं, बल्कि आपसी वैमनस्य समाप्त करने का माध्यम भी है। धुलंडी की प्रातः रस्सी की पूजा और शोभायात्रा के साथ यह परंपरा प्रारंभ होती है। एक शताब्दी से अधिक पुरानी यह सांस्कृतिक विरासत आज भी नगर की पहचान बनी हुई है।









