(रविकान्त तिवारी)राज्यसभा चुनवा के नतीजों ने एक बार फिर विपक्ष पर भाजपा और एनडीए गठबंधन भारी पड़ गया। राज्यसभा में खाली हुई 37 सीटों में से 26 के नतीजे पहले ही निर्विरोध तय हो चुके थे। वहीं बिहार, ओडिशा, और हरियाणा में 11 सीटों के लिए हुए चुनाव में भाजपा और उसके नेतृत्व वाली एनडीए ने बड़ी जीत दर्ज की। इन नतीजों ने विपक्षी कांग्रेस, आरजेडी और बीजेडी को बड़ी टेंशन में डाल दिया है। इस दौरान कई जगहों पर क्रॉस वोटिंग, विधायकों की गैरहाजिरी और वोट की गोपनीयता को लेकर विवाद सामने आए। वहीं ओडिशा में तो कांग्रेस ने क्रॉस वोटिंग के कारण निलंबित कर दिया। नतीजों के बाद यह चर्चा तेज हो गई कि कई राज्यों में विपक्ष अपनी रणनीति संभाल नहीं पाया और सत्ता पक्ष को फायदा मिल गया।
इन चुनावों के नतीजों ने साफ कर दिया कि कई राज्यों में विपक्ष अपने विधायकों को एकजुट रखने में सफल नहीं रहा। कहीं क्रॉस वोटिंग हुई तो कहीं विधायक वोटिंग से ही गायब हो गये। इसका फायदा सत्ता पक्ष को मिला। तीनों राज्यों में हुए चुनावों को विपक्षी विधायकों के लिए वफादारी की परीक्षा के रूप में देखा गया। पार्टी नेताओं ने दलबदल और क्रॉस-वोटिंग को रोकने के लिए प्रयास किए। कुछ मामलों में विपक्षी विधायकों को चुनाव से पहले सुरक्षित स्थानों पर भेज दिया गया था। उदाहरण के लिए, कर्नाटक के मामले में, उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार को ओडिशा के विधायकों पर कड़ी नजर रखने का काम सौंपा गया था ताकि क्रॉस-वोटिंग को रोका जा सके।
हालांकि, विपक्षी दल अपेक्षित एकजुटता हासिल करने में सक्षम नहीं रहे। जिन राज्यों में विपक्ष की स्थिति मजबूत लग रही थी, वहां भी छोटी-छोटी चूक से परिणाम बदल गये। कुल मिलाकर राज्यसभा चुनाव के इन नतीजों ने यह संकेत दे दिया है कि आने वाले समय में विपक्ष को अपनी रणनीति और संगठन दोनों को और मजबूत करना होगा, वरना ऐसे चुनावों में सत्ता पक्ष को बढ़त मिलती रहेगी। वहीं भाजपा ने बड़ी जीत हासिल कर साफ कर दिया है कि चुनावी रणनीति व प्रबंधन में वह विपक्ष पर भारी है। उसने मतदान में जाने वाली सीटों में बिहार और ओडीशा में कांग्रेस, राजद और बीजद के प्रबंधन को ध्वस्त कर दिया।
हरियाणा में भी उसने विपक्ष में सेंध लगा दी थी, लेकिन थोड़े अंतर से ही वह लगातार तीसरी बार कांग्रेस के प्रबंधन को मात देने से चूक गई। इन चुनावों को लेकर भाजपा की गंभीरता का अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि उसने चुनाव प्रभारियों की भी नियुक्ति की थी। दस राज्यों की 37 राज्यसभा सीटों के चुनाव में भाजपा और उसके सहयोगी विपक्ष पर भारी पड़े। भाजपा नेतृत्व वाले राजग को 22 सीटें और विपक्ष को 15 सीटें मिली है। राजग को दस सीटों का लाभ हुआ है तो विपक्षी खेमे को इतनी ही सीटों का नुकसान। इन चुनावों में भाजपा के नौ सदस्यों का कार्यकाल पूरा हुआ और उसके चुनकर आए 13 सदस्य यानी चार सीटों की बढ़ोतरी। भाजपा के सहयोगी दलों में जदयू ने दो, रालोमो, पीएमके,अन्नाद्रमुक ने एक सीट जीत जीतकर अपनी स्थिति बरकार रखी है यानी उनकी जितनी सीटें खाली हुई उतनी ही वापस आई। शिवसेना, राकांपा, यूपीपीएल को एक एक सीट का लाभ हुआ और भाजपा ने अपने समर्थन से एक निर्दलीय को भी जिताया।
राज्यसभा के इन चुनावों में सात राज्यों की 26 सीटों के लिए उतने ही उम्मीदवार होने से निर्विरोध निर्वाचन हो गया था, लेकिन तीन राज्यों में (11 सीटों पर) तय सीटों से एक-एक ज्यादा उम्मीदवार होने से चुनाव हुए। इनमें राजग को नौ और विपक्ष को दो सीटें मिली। राजग में भाजपा को पांच व सहयोगियों को चार सीटें हासिल हुई। इस पूरे चुनाव में राजग को दस सीटों का लाभ व विपक्ष को दस सीटों का नुकसान हुआ। चुनाव से पहले राजग के पास 12 सीटें थी और विपक्ष के पास 25 सीटें। नतीजों के बाद राजग के 22 सीटें हो गई, जबकि विपक्ष के पास 15 सीटें रह गई। भाजपा को चार सीटों का लाभ हुआ। राज्यवार भाजपा को बिहार में दो सीटों का लाभ हुआ। ओडीशा में भाजपा ने अपनी दो सीटें बरकरार रखी और एक निर्दलीय को जिताकर बीजद को एक सीट का झटका दिया। असम में भाजपा ने अपनी रिक्त हुई दोनों सीटें बरकरार रखी और एक सीट अपने सहयोगी यूपीपीएल को जिताई।
महाराष्ट्र में सात राज्यसभा सीटों में भाजपा को चार,राकांपा और शिवसेना को एक-एक सीट मिली है। इसके अलावा एक सीट पर विपक्ष से शरद पवार चुने गए हैं। भाजपा के कोटे से ही रिपब्लिकन पार्टी के रामदास आठवले फिर चुनकर आए हैं। यहां भाजपा को दो सीट का फायदा तो कांग्रेस, शिवसेना (यूबीटी) और शरद पवार की एनसीपी को एक सीट का घाटा हुआ। राकांपा व शिवसेना को एक-एक सीट का लाभ मिला। तमिलनाडु की छह राज्यसभा सीटों में अन्नाद्रमुक व पीएमके एक सीट बचाने में सफल रहे। चार सीटे विपक्ष को मिली। पश्चिम बंगाल की पांच राज्यसभा सीटों में तृणमूल कांग्रेस ने अपनी चार सीटें बचाए रखी तो बीजेपी को एक सीट का लाभ हुआ और माकपा को एक सीट का नुकसान हुआ।
छत्तीसगढ़ में भाजपा को एक सीट का फायदा तो कांग्रेस को एक सीट का नुकसान हुआ। तेलंगाना की दोनों सीटें कांग्रेस जीत ली है, उसे एक सीट का लाभ मिला है तो बीआरएस को एक सीट का नुकसान हुआ। हरियाणा की दो सीटों में भाजपा और कांग्रेस एक-एक सीट जीती हैं। यहां भाजपा को एक सीट का नुकसान हुआ है। हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस को एक सीट का लाभ मिला तो भाजपा को एक सीट का नुकसान हुआ। इस जीत के साथ ही विपक्ष की रणनीति पर सवाल उठ रहे है और उनके नेताओं की क्षमता व पार्टी के अंदरुनी कलह से निपटना एक बड़ी चुनौती साबित हो रहा है।
बदली राज्यसभा की तस्वीर
इन नतीजों के बाद राज्यसभा में एनडीए की स्थिति पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हो गई। ताजा आंकड़ों के अनुसार, उच्च सदन में एनडीए के पास कुल 140 सीटें हैं, जो बहुमत के आंकड़े से 17 अधिक हैं। इसमें सबसे बड़ी हिस्सेदारी भाजपा की है, जिसके पास 106 सीटें हैं। इसके अलावा एआईएडीएमके, जेडीयू, एनसीपी, टीडीपी और शिवसेना जैसे सहयोगी दल भी इस ताकत को और मजबूती दे रहे हैं। इस बढ़त का सीधा असर सरकार के कामकाज पर पड़ेगा। अब राज्यसभा में विधेयक पास कराना पहले की तुलना में आसान हो गया, क्योंकि सरकार को विपक्ष पर कम निर्भर रहना पड़ेगा। इससे कानून बनाने की प्रक्रिया तेज होने की संभावना है और कई महत्वपूर्ण सुधारों को आगे बढ़ाने में सहूलियत मिल सकती है। वहीं, संख्या कम होने के कारण विपक्ष की भूमिका सीमित हो सकती है, हालांकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में बहस और दबाव की उसकी भूमिका पूरी तरह खत्म नहीं होगी। कुल मिलाकर, राज्यसभा चुनाव 2026 ने यह साफ कर दिया है कि राजनीति में सिर्फ संख्या ही नहीं, बल्कि रणनीति, अनुशासन और समय पर लिए गए फैसले ही जीत तय करते हैं। एनडीए की मजबूत स्थिति जहां सरकार को विधायी मोर्चे पर बढ़त देगी, वहीं विपक्ष के लिए यह एक स्पष्ट संकेत है कि उसे अपनी रणनीति और संगठन दोनों को मजबूत करने की जरूरत है।











