नई दिल्ली। तपेदिक (टीबी) के खिलाफ भारत की लड़ाई को और तेज करने के लिए, भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) ने दो स्वदेशी रूप से विकसित टीबी परीक्षण किटों को मान्यता दी है। ये किट न केवल किफायती हैं, बल्कि रोग का जल्दी पता लगाने का एक महत्वपूर्ण विकल्प भी प्रदान करती हैं।
टीबी का उन्मूलन मुख्य रूप से जल्दी और सटीक पहचान पर निर्भर करता है, ताकि रोगियों का समय पर इलाज शुरू किया जा सके और सामुदायिक संचरण को रोका जा सके।
आईसीएमआर ने बयान में कहा कि हाल ही में मान्यता प्राप्त किटों में ‘क्वांटिप्लस एमटीबी फास्ट डिटेक्शन किट’ शामिल है, जिसे तेलंगाना स्थित ह्यूवेल लाइफसाइंसेज ने विकसित किया है। यह पहली ओपन सिस्टम आरटी-पीसीआर किट है जो किसी भी पीसीआर मशीन पर काम कर सकती है और विशेष मशीनों तक सीमित नहीं है।
सूत्र ने बताया, “इसका मतलब है कि भारत की अधिकतर प्रयोगशालाएं, यहां तक कि जिनके पास विशेष ‘क्लोज्ड’ उपकरण नहीं हैं, अब मानक पीसीआर मशीनों का उपयोग करके तेजी से टीबी परीक्षण कर सकती हैं।”
क्वांटिप्लस किट एक बार में 96 नमूनों का परीक्षण कर सकती है और थूक के नमूनों से वयस्कों में टीबी का पता लगाने में सक्षम है। इससे न केवल जल्दी उपचार शुरू किया जा सकेगा, बल्कि परीक्षण की लागत में भी कमी आएगी।
आईसीएमआर ने बताया कि प्रमाणित दूसरी किट ‘यूनीएएमपी एमटीबी न्यूक्लिक एसिड टेस्ट कार्ड’ भी ह्यूवेल लाइफसाइंसेज द्वारा विकसित की गई है।
आईसीएमआर के संचारी रोग प्रभाग की प्रमुख डॉ. निवेदिता गुप्ता ने कहा,
“हमारी कठोर और सुव्यवस्थित सत्यापन प्रक्रिया यह सुनिश्चित करती है कि नवीन टीबी निदान शीघ्र मान्य हों। यह प्रयास स्वदेशी अनुसंधान और नवाचार को मजबूत करता है, बीमारी की जल्दी पहचान और उपचार में कमियों को दूर करता है और अंततः देश को टीबी उन्मूलन के लक्ष्य के करीब ले जाता है।”
यह कदम भारत के टीबी उन्मूलन मिशन और सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रति देश की प्रतिबद्धता को और मजबूती देगा।








