लोकवाहिनी, संवाददाता:मुंबई। महाराष्ट्र की महायुति सरकार की सबसे महत्वाकांक्षी लाडली बहन योजना अब कानूनी विवादों और अदालती तल्ख टिप्पणियों के घेरे में आ गई है। शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों को उनके वैधानिक अधिकारों से वंचित रखना किसी भी हाल में स्वीकार्य नहीं है। बॉम्बे हाई कोर्ट ने स्पष्ट और सख्त शब्दों में कहा है कि फंड की कमी का बहाना बनाकर सरकारी या नगर निगम प्रशासन पेंशन और बकाया लाभों का भुगतान टाल नहीं सकता। अदालत ने यहाँ तक कह दिया कि अगर पैसे नहीं हैं तो गैर-जरूरी योजनाएं बंद करें या दफ्तरों की संपत्ति बेचें, लेकिन कर्मचारियों को उनका हक जरूर दें।
यह टिप्पणी सातवें वेतन आयोग लागू न होने से परेशान एक सेवानिवृत्त महिला कर्मचारी की याचिका पर सुनवाई के दौरान आई। मुंबई नगर निगम के शिक्षा विभाग में कार्यरत रही एक महिला कर्मचारी ने उच्च न्यायालय का दरवाजा तब खटखटाया, जब सेवानिवृत्ति के बाद भी उन्हें सातवें वेतन आयोग के अनुसार पेंशन और अन्य वैधानिक लाभ नहीं मिले। याचिका में बताया गया कि बार-बार आग्रह के बावजूद नगर निगम और सरकार की ओर से केवल फंड की कमी का हवाला दिया जा रहा है, जिससे उनका जीवन यापन कठिन हो गया है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने प्रशासन की दोहरी नीति पर तीखी टिप्पणी की। कोर्ट ने सवाल उठाया कि नगर निगम के अतिरिक्त आयुक्तों को तो सातवें वेतन आयोग के अनुसार पूरा वेतन मिलता है, जिसके लिए राज्य सरकार से धन आता है, लेकिन जब बात शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों की होती है तो अचानक फंड की कमी सामने आ जाती है। (पेज 6 पर)








