उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद जी का मूल नाम धनपतराय श्रीवास्तव था जिनका उर्दू रचनाओं में नाम नवाबराय होता था। इनका जन्म उत्तर प्रदेश के वाराणसी के लमही गांव में 31 जुलाई 1880 में हुआ था। उन्होंने एक अध्यापक, पत्रकार और लेखक के रूप में देश को अपनी सेवाएं दी। इनकी माता का नाम आनंदी देवी, पिता का नाम मुंशी अजायब लाल था जो एक डाक मुंशी थे। प्रेमचंद लेखकीय उपनाम था जो उन्होंने ‘सोजे वतन’ नामक अपनी पुस्तिका के सरकार द्वारा जब्त करके जलाये जाने के बाद रखा था ताकि उन्हें फिर राजकोप का शिकार न बनना पड़े। बचपन अन्य बच्चों की तरह गांव में खेलकूद में बीता। मौलवी से फारसी, उर्दू की शिक्षा ली। 7 साल की उम्र में माँ का देहांत हो गया था। बहन का भी विवाह हो गया। माँ की कमी पूरी नहीं हुई तभी तो अपनी कई कहानियों में माँ की छत्र-छाया से दूर बच्चे का चित्रण उन्होंने किया है।
कर्मभूमि में अमरकांत कहता है
जिंदगी की वह उम्र, जब इंसान को मुहब्बत की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, बचपन होती है, उस वक्त पौधे को तरी मिल जाये तो जिंदगी भर के लिए उसकी जड़ें मजबूत हो जाती हैं। उस वक्त खुराक न पाकर उसकी जिंदगी खुश्क हो जाती है। मेरी माँ का उसी जमाने में देहांत हुआ और तब से मेरी रूह की खुराक नहीं मिली। वही भूख मेरी जिंदगी है।
उस मन:स्थिति में इस लड़के नवाब के बिगड़ जाने की पूरी संभावना थी लेकिन प्रकृति जैसे अपने जंगली पेड़ पौधों को बचाती है वैसे ही प्रेमचंद को भी बचाया। उन्होंने किताबों में अपनी जिंदगी तलाशी और 13 साल की उम्र में फैजी की तिलिस्म-ए-होशरूबा (जिसमें दो-दो हजार पन्नों की अठारह जिल्दे थीं ) पढ़ डाली। यही नहीं रेनाल्ड की मिस्ट्रीज ऑफ द कोर्ट ऑफ लंदन की पच्चीसों किताबों के उर्दू तर्जुमें, मिर्जा रूसवा और रतननाथ शरशार के ढेरों किस्से, मौलाना सज्जाद हुसैन की हास्य कृतियां आदि ढेरों किताबें पढ़ डाली। एक बुकसेलर बुद्धिलाल की दुकान पर वे बैठते थे और उसकी दुकान की अंग्रेजी पुस्तकों की कुंजियां और नोट्स बेचा करते थे और उसके मुआवजे में उसकी दुकान से सैकड़ों उपन्यास लेकर पढ़ डाले थे।
वे सरल सहज प्रवृत्ति के थे। सीधी-सादी जीवनशैली, निश्छल, विनयशील स्वभाव । 15 वर्ष की अल्पायु में विवाह हुआ जो असफल रहा। फिर 1906 में विधवा शिवरानी देवी से दूसरा विवाह किया। उनके 6 बच्चे हुए जिनमें 3 बचे। पुत्र – अमृतराय, श्रीपथ राय तथा पुत्री – कमला देवी श्रीवास्तव। 1899 में स्कूल के मास्टर बने जो सिलसिला 1921 तक चला। नौकरी करते हुए ही उन्होंने इंटर और बी.ए. किया। तबादलों के कारण उन्हें प्रतापगढ़ से इलाहाबाद, कानपुर से हमीरपुर से बस्ती फिर बस्ती से गोरखपुर । इन तबादलों ने उन्हें घाट-घाट का पानी ही नहीं पिलाया भारतीय जन-जीवन को करीब से देखने और महसूस करने का अवसर भी प्रदान किया। यह अनुभव संपदा उनके लिए अत्यंत मूल्यवान साबित हुई।
उनकी पत्नी शिवरानी देवी सच्ची, स्वाभिमानी, दबंग और अनुशासनप्रिय थी। प्रेमचंद जैसे कोमल स्वभाव के व्यक्ति की सच्ची जीवन सहचरी साबित हुईं। गांधीजी के आह्वान पर प्रेमचंद ने सरकारी नौकरी छोड़ी जिसमें पत्नी ने सहयोग दिया। अपनी प्रेस भी खोली पर घाटे का सौदा रहा। माधुरी के संपादक बने, फिर हंस भी शुरू किया। जागरण नामक साप्ताहिक पत्र भी निकाला। फिल्मों के लिए कहानी भी लिखी। मुंबई भी गए पर फिर बनारस लौट आये। 8 अक्टूबर 1936 को लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हो गया।
अपने बारे में वे कहते हैं । मेरी जिंदगी में ऐसा है ही क्या जो किसी को सुनाऊँ। बिल्कुल सीधी सपाट जिंदगी है जैसी देश के करोड़ों लोग जीते हैं। एक सीधा-सादा गृहस्थी के पचड़ों में फंसा हुआ तंगदिल मुदर्रिस जो सारी जिंदगी कलम घिसता रहा, इस उम्मीद में कि कुछ आसूदा हो सकेगा, मगर हो न सका। मैं नदी किनारे खड़ा हुआ नरकुल हूँ हवा के थपेड़ों से मेरे अंदर भी आवाज पैदा हो जाती है। बस इतनी सी बात है। मेरे पास अपना कुछ नहीं है जो कुछ है, उन हवाओं का है जो मेरे भीतर बजी। और जो हवाएं उनके भीतर बजीं वही उनका साहित्य है, भारतीय जनता के दुख सुख का साहित्य हमारे आपके सुख दुख का साहित्य, जिसे आप इसी कारण इतना प्यार करते हैं।
1901 में उनकी साहित्यिक यात्रा आरंभ हो चुकी थी पर पहली हिंदी कहानी सरस्वती के दिसंबर 1915 के अंक में “सौत” के नाम से छपी और 1936 में अंतिम कहानी कफन नाम से प्रकाशित हुई। इन वर्षों की अवधि का उनका विपुल लेखन ही वह कहानी कह गया कि वे कलम के सिपाही, हिंदी कहानी के पितामह, उपन्यास सम्राट के नाम से मशहूर हुए। उनकी कालजयी कृतियों ने उस दौर में जितनी लोकप्रियता हासिल की, उसके बाद के 100 वर्षों में यानी पूरी एक सदी तक और उसके बाद भी लोकप्रियता और प्रभाव में अपने शीर्ष पर रहीं।
प्रेमचंद जी ने 300 से अधिक कहानियों और एक दर्जन से अधिक उपन्यास लिखे। कुछ नाटक भी और विभिन्न लेख भी लिखे। अनुवाद भी किया और उनकी रचनाओं का विश्व की विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हुआ। उन्होंने उर्दू और हिंदी में समान अधिकार से लिखा। 33 वर्षों के रचनात्मक जीवन में वे साहित्य की ऐसी विरासत सौंप गये जो गुणों की दृष्टि से अमूल्य है और आकार की दृष्टि से असीमित।
प्रेमचंद जी के मरणोपरांत उनकी कहानियाँ मानसरोवर नाम से 8 खण्डों में प्रकाशित हुई। उनके प्रमुख उपन्यासों में गोदान, सेवासदन, निर्मला, गबन, रंगभूमि, प्रेमाश्रम, कायाकल्प, कर्मभूमि, प्रतिज्ञा, मनोरमा, वरदान, रूठी रानी आदि शामिल है।
उनकी प्रसिद्ध कहानियों में पंचपरमेश्वर , दो बैलों की कथा, ईदगाह, बड़े भाई साहब, पूस की रात, कफन , ठाकुर का कुआँ, बूढ़ी काकी , मंत्र, घर जमाई, बड़े घर की बेटी, नमक का दारोगा आदि है।
नाटकों में संग्राम, कर्बला और प्रेम की वेदी प्रमुख है। वे सफल अनुवादक भी रहे। नेहरू के लिखे पत्र- पिता के पत्र पुत्री के नाम अंग्रेजी से अनुवाद , टालस्टाॅय की कहानियाें, गाल्सवर्दी के तीन नाटकों का हड़ताल, चांदी की डिबिया और न्याय नाम से अनुवाद। सरशार के उर्दू उपन्यास फसान–ए-आजाद का हिंदी में अनुवाद – आजाद कथा भी बहुत मशहूर हुआ।
मर्यादा, माधुरी, हंस जागरण का संपादन तथा बाल साहित्य । विभिन्न विषयों पर लेख और निबंध। विपुल रचना सामग्री की विरासत उन्होंने हमें सौंपी है।
1918 से 1936 तक के युग को प्रेमचंद युग के नाम से जाना जाता है। उनकी कहानियों में आदर्शोन्मुख यथार्थवाद की एक नई परम्परा शुरू की। वे सांप्रदायिकता, भ्रष्टाचार, जमींदारी, कर्जखोरी, गरीबी, उपनिवेशवाद पर लिखते रहे। वे आम भारतीय के रचनाकार थे। उनके लेखन ने युगान्तकारी परिवर्तन किये यही कारण है कि वे एक सदी बीत जाने के बाद भी आज भी प्रासंगिक बने हुए हैं।
कबीर की तरह प्रेमचंद जी ने पाखण्ड का विरोध किया। उन्होंने मानवीय रिश्तों की बात की, बेमेल विवाह, बाल विवाह दहेज प्रथा का विरोध किया। समरसता की बात की, भाई भतीजावाद पर कुठाराघात किया। किसानों की दशा पर पूरी संवेदना से लिखा। उन्हें मनोविज्ञान की प्रखर समझ थी। समाज की संरचना को वे बखूबी समझते थे। उनकी रचनाओं में वे नायक हुए जिसे भारतीय समाज अछूत और घृणित समझता था। उन्होंने सरल, सहज और आम बोल-चाल की भाषा का प्रयोग किया और अपने प्रगतिशील विचारों को दृढ़ता से तर्क देते हुए समाज के सामने प्रस्तुत किया।

वे उच्चकोटि के मानव थे। साधारण गँवई लिबास में रहते थे। उनके जीवन का अधिकांश समय गांव में बीता। वे साधारण दिखने वाले असाधारण मजबूत शक्ति के मालिक थे। आडम्बर और दिखावे से कोसों दूर थे । जीवन की उनकी सहजता ही उनकी लेखनी में भी थी ।आधुनिक हिंदी साहित्य की चेतना रूपांतरण के वे बड़े लेखक थे। उन्होंने अपनी परवर्ती लेखकों का मानस विस्तार कर सर्वाधिक प्रभावित किया। प्रेमचंद जी का लेखन स्वाधीनता के बुनियादी सरोकारों से सूत्रबद्ध है। उनके लेखन में जाति, धर्म, संप्रदाय या किसी भेदभाव के बिना, भारतीय समाज की बहुलता के मद्देनजर सभी वर्गों की सहभागिता निहित है। प्रेम, बलिदान और त्याग के उच्च आदर्श उनके आरंभिक लेखन में हैं पर उनका दायरा व्यापक और यथार्थपरक होता गया। किसान, स्त्री और दलितों को समाज की सामंती और पूंजीवादी व्यवस्था के शोषण और उत्पीड़न से मुक्त कराने का प्रयास था उनके लेखन में। उनकी वास्तविकता प्रेमचंद की कहानियों और उपन्यासों में दिखाई गयी और उनकी मुक्ति की आवाज भी लेखन में उठी। हिंदू-मुस्लिम सहअस्तित्व की जरूरी चिंताए भी उनके लेखन से अछूती न रहीं। मानवीय वृत्ति तो वही है, ईर्ष्या, द्वेष, शोषण भेदभाव आदि। हमने प्रगति की है पर उनके लेखन की प्रासंगिकता आज पूरी एक सदी के बाद भी कायम है यह उनकी सशक्त लेखनी का ही प्रताप है। हम उनकी रचनाओं के द्वारा उनकी लेखनी को समझने का प्रयास करते हें। उनका सर्वाधिक प्रसिद्ध उपन्यास गोदान आज भी नये परिप्रेक्ष्य में विचार के लिए प्रेरित करता है। यह औपनिवेशिक युग में किसानों के शोषण की गाथा ही नहीं, समकालीन नव-उपनिवेशवाद, भूमंडलीकरण की चुनौतियों और उसके विमर्शों से सामना करनेवाली सच्ची रचना भी है। प्रेमचंद के समय महाजनों का महाजन अंग्रेजी राज था । आज अमेरिकी साम्राज्यवाद आर्थिक नीतियों में अदृश्य रूप से घुसा है। देश में बड़े पैमाने पर किसानों की आत्महत्या के चलते ही कर्जमाफी की योजनाएं बनी हैं। गरीब आदमी आज भी सर्वाधिक संकटग्रस्त है । जीवन और जीविका के लिये जूझते-झींकते होरी आज भी गांवों में मौजूद है। गोदान की अप्रतिम दृष्टि और सृजन अपने समय को अतिक्रमित करता है।
पूंजीवादी औद्योगिक विकास के खतरों को प्रेमचंद ने वर्षों पहले रंगभूमि में उजागर किया था। भूमंडलीय नीतियां , ग्रामीण अस्मिता , निम्नवर्गीय जीवन और सपनों पर कहर बरपा रही हैं। शहरों के पास की गंवई जमीन और जीवन हमेशा कथित विकास के एजेंडे की भेंट चढ़ता है। प्रेमचंद ने बेदखली की कथा तब कही थी जब औपनिवेशिक भारत में पूंजीवादी उद्योगीकरण ने पांव पसारने शुरू किये थे।
प्रेमचंद जी की चर्चित कहानी कफन भी विमर्श और विवाद के केन्द्र में रही है। सहमतियों और असहमतियों के बीच इसकी आंतरिक शक्ति और लेखकीय परिपक्वकता इसे कभी अप्रासंगिक नहीं होने देती। अपने कलात्मक शिखर पर संयम से रची इस कहानी को लेकर प्रेमचंद आज भी चुनौती की तरह अडिग हैं। इस पर बहुत विचार हुआ पर सामान्य तर्कों से परे जाकर ही कहानी, कहानी बनती है। तभी वह गहरे निहितार्थों की कहानी है किसी वर्ग जाति की निंदा की नहीं। आज भी इस कहानी को पढ़कर मानवता शर्मसार होती है। पीसू और माधव जैसे लोग आज भी समाज में अपनी अकर्मण्यता और असंवेदनशीलता से मानव समाज को कलंकित करने में कसर नहीं छोड़ते हैं। कफन के उधारी के पैसों से शराब पीकर नशे में धुत हो जाना वो भी तब जब घर में मृतक स्त्री यूं ही पड़ी हो, असंवेदनशीलता की पराकाष्ठा है जो प्रेमचंद की कलम ही उजागर कर सकती थी।
दलित वर्ग के प्रति वे संवेदनशील थे। गोदान का मातादीन सिलिया प्रसंग ही नहीं, सदगति, ठाकुर का कुआं और दूध का दाम आदि कहानियाँ इस संदर्भ में विशेष रूप से चर्चित रहीं। ठाकुर का कुआँ कहानी में गंदे पानी को पीने की मजबूरी की कितनी जीवंत तस्वीर उन्होंने प्रस्तुत की। गंगी का पानी से भरा मटका, ठाकुर के दरवाजे की आहट से कैसे टूट जाता है और वह डर से भागती घर पहुंचती है जहाँ जीखू गंदे, बदबूदार पानी को पीने विवश है। आज भी ये तस्वीर नहीं बदली है। राजस्थान में एक स्कूल के दलित बच्चे ने शिक्षक के मटके से पानी पी लिया था तो उसकी मार-मार कर हत्या कर दी गई थी। छूआछूत आज भी हमारे समाज में कलंक की तरह विराजमान है और उसी पर प्रहार करती ये कहानी है ठाकुर का कुआँ।ऊंचे कहलाने वाले लोग किस तरह पतित कर्म करते हैं और जाति में निम्न होने पर भी सही कर्म करने वालों पर गंगी के उदगार पाठकों को सोचने पर विवश करता है।
उस वक्त स्त्री की सामाजिक अस्मिता के अनेक सवाल सामाजिक, धार्मिक सुधार आंदोलनों का अहम हिस्सा था। सेवासदन और निर्मला उपन्यास, बड़े घर की बेटी, घासवाली और बूढ़ी काकी, सुभागी आदि कहानियों के जरिए प्रेमचन्द ने अपने रचनात्मक सरोकारों से स्त्री जीवन से जुड़ी समस्याओं को अभिव्यक्त किया। उन्होंने पहले सैकड़ों ऐसी कहानियाँ लिखीं जिनका हृदय परिवर्तन पर अंत है। उन्होंने अपनी सीमाओं का अतिक्रमण कर कथायात्रा के अगले मुकाम पर श्रेष्ठ कलात्मक और यथार्थोन्मुख कहानियां लिखीं।
‘सोहाग का शव’ परदेस जाकर दूसरी स्त्री के फेर में पड़े केशव की कहानी है जिसमें उसकी पत्नी सुभद्रा के गजब के जीवट की गाथा है जो केशव की दूसरी पत्नी को अपने सोहाग के प्रतीक और पति की फोटो भेज कर कहती है ये मेरे सोहाग का शव है जिसे तुम टेम्स नदी में प्रवाहित कर देना। यह संस्कार भी तुम लोगों के हाथों हो जाये तो अच्छा है। स्त्री की सरलता को जब पुरुष ठगने लगता है तो वह भीतर तक आहत हो जाती है, उसे मारने का भी विचार करती है पर पति के प्रेम में परदेस तक आने वाली सुभद्रा उसके मर्म पर चोट कर स्वयं लौट जाती है। स्त्रियाँ अपने चरित्र और मन की मजबूती से स्वयं को सम्भालने में सफल होती हैं। बहुत मर्मस्पर्शी कहानी है सोहाग का शव। शीर्षक भी अपने आप में बहुत मर्मभेदी है।

वृद्धों की हालत हम सबसे छुपी नहीं है। बूढ़ी काकी का घर के उत्सव के दिन तिरस्कार और भोजन के लिए तड़पना अंतस तक भिगो देता है। ये कहानी आज भी कई घरों में दुहराई जा रही है। बुढ़ापे में स्वादेन्द्रियां प्रबल हो जाती है।
खाने की लालसा बढ़ जाती है तभी तो कलम के कुशल चितेरे कहते हैं बुढ़ापा बहुधा बचपन का पुनरागमन होता है। बच्चों की सी चाहत, उत्सुकता और अधैर्य। उस पर भतीजे और बहू का तिस्कार, बूढ़ी काकी का रुदन और अंत में रूपा का पश्चाताप, सब आज भी आँख भिगो देता है। भोजन के लिए उनकी उत्कंठा देखें –
बूढ़ी काकी चलने के लिए तैयार हुई। यह विश्वास कि एक मिनट में पूड़ियां और मसालेदार तरकारियां सामने आएंगी, उनकी स्वादेन्द्रियों को गुदगुदाने लगा। उन्होंने मन में तरह-तरह के मंसूबे बांधे-पहले तरकारी से पूड़ियां खाऊंगी फिर दही और शक्कर से। कचौरियां रायते के साथ मालूम होंगी। चाहे कोई बुरा माने चाहे भला, मैं तो मांग-मांग कर खाऊंगी।
काकी को भोजन नहीं मिलता तो पहले तो पोती लाडली की बचायी पूड़ी खाती हैं पर क्षुधा नहीं बुझती और
और उसी बूढ़ी काकी को जब अर्धरात्रि तक भोजन नहीं मिलता तो
वह जूठी पत्तल से बचे टुकड़े उठाकर खाने लगती है। उस दृश्य की कल्पना भी आँख भिगो देती है पर फिर रूपा काकी से क्षमा मांगती है। अंत का दृश्य जैसे आँखों के सामने जीवंत हो उठता है। प्रेमचंद जी की कलम का प्रभाव देखें।
आधी रात जा चुकी थी, आकाश पर तारों के थाल सजे हुए थे और उन पर बैठे हुए देवगण स्वर्गीय पदार्थ सजा रहे थे परंतु उनमें से किसी को वह परमानंद न प्राप्त हो सकता था जो बूढ़ी काकी को अपने सम्मुख थाल देख कर हो रहा था । भोले भाले बच्चों की भांति जो मिठाइयां पाकर मार और तिरस्कार सब भूल जाता है बूढ़ी काकी वैसे ही सब भूलकर बैठी हुई खाना खा रही थी। उनके एक-एक रोयें से सच्ची सदिच्छाएं निकल रही थी और रूपा बैठी इस स्वर्गीय दृश्य का आनंद लेने में निमग्न थी। बड़े घर की बेटी कहानी में आनंदी अपने व्यवहार से श्रीकंठ सिंह और लालबिहारी दोनों भाईयों के बीच होते अलगाव को रोक लेती है। तब ससुर बेनी माधवसिंह कहते हैं- बड़े घर की बेटियां ऐसी ही होती हैं। बिगड़ता हुआ काम बना लेती हैं।
स्त्रियों में कितनी क्षमता होती है घर-परिवार को जोड़ लेने की। ये कहानियाँ आज भी पढ़ी जाने के लिए बनी हैं ताकि लोग सबक सीख सकें, पारिवारिक एकता का महत्व समझ सकें।
जेल कहानी में नायिका मृदुला जब जुलूस का प्रतिनिधित्व करती है तो उस कलम की उसकी शक्ति अलग ही होती है। मैं अपने हृदय में एक विचित्र बल और उत्साह का अनुभव कर रही थी। एक अबला स्त्री जिसे संसार का ज्ञान नहीं , जिसने कभी घर से बाहर पाँव नहीं निकाला, आज अपने प्यारों के उत्सर्ग की बदौलत इस महान पद पर पहुंच गयी थी। जो बड़े-बड़े अफसरों को भी प्राप्त नहीं। मैं इस समय जनता के हृदय पर राज कर रही थी।
स्त्री सशक्तिकरण का ऐसा उदाहरण है जो दुख तकलीफ से उबरकर आज की सशक्त होती नारी का भी चित्र दिखलाती है। ये कहानियाँ कभी अप्रासंगिक न हो सकेंगी। ऐसी ही कहानियाँ हैं- पत्नी से पति बनती गोदावरी की।
प्रेमचंद के लिखे मुहावरों ने, कथनों ने समय की सारी सीमायें लांघ ली है। पंच परमेश्वर में खाला जब अलगू चौधरी से कहती हैं- क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे। पंच की जुबान से खुदा बोलता है। इन वाक्यों ने आज भी प्रेमचंद की लेखनी को अमर सिद्ध किया है।
आज के दौर में जब न्याय व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह उठते हैं तो पंचपरमेश्वर की कहानी और भी प्रासंगिक हो उठती है। जुम्मनशेख और अलगू चौधरी की मित्रता न्याय के कारण फिर से सूखती लता की तरह हरी हो जाती है।
अकर्मण्य लोगों में प्राण फूंकने वाली कहानी शंखनाद, भाईयों के सदा से चलने वाले विवाद की कहानी दो भाई, विलासिता की ओर बढ़कर फिर आत्मिक शांति के लिए लौटने वाले जोड़े की कहानी शांति जिसमें स्त्री विचार करती है-
तूने फैशन वस्त्राभूषणों से अवश्य उन्नति की है। तुझमें अपने स्वार्थों का ज्ञान हो आया है, तुझमें जीवन के सुख भोगने की योग्यता अधिक हो गयी है तू अब अधिक गर्विणी, दृढ़हृदय और शिक्षा सम्पन्न भी हो गयी लेकिन तेरे आत्मिक बल का विनाश हो गया क्योंकि तू अपने कर्तव्य को भूल गयी है।
आज विलासता की ओर बढ़ते लोगों को सबक सिखाने के लिए पर्याप्त है। प्रेमचंद की लेखनी अपनी प्रासंगिकता पर कभी प्रश्न उठाने की अनुमति न देगी ऐसा हम सब जानते हैं। कुछ रचनाओं के और उदाहरण हम देखेंगे। आजाद देश में बेसहारा और पीड़ित वर्ग को हक और न्याय मिलना जितना जरूरी था उतना ही हिंदू मुस्लिम का भाईचारा । प्रेमचंद के उस धर्म निरपेक्ष सपने की अहमियत आज भी कम न हुई है। उन्होंने सांप्रदायिकता प्रतिरोध और हिंदू मुस्लिम एकता का प्रबल समर्थन कई लेखों, कहानियों, उपन्यासों और “कर्बला” नाटक द्वारा किया है। पत्रकारिता में उनके वैचारिक लेखन भी प्रेरणास्पद हैं। लेखन के विविध आयामों के बीच वे मूलत: युगप्रवर्तक कथाकार थे अपने जीवन के संघर्ष से, जनजीवन से एकात्म होकर उन्होंने साहित्य की पूंजी कमाई। यह उनकी निष्ठा, प्रतिबद्धता और साधना की मिसाल है। देश के लिए उनके देखे सपने की आकांक्षा अभी खत्म नहीं हुई है। इसलिए वे आज भी प्रासंगिक हैं। वे अपनी रचनाओं के साथ संघर्षों और चुनौतियों के मार्गदर्शक हैं।
विधवा विवाह के लिए उस समय के उनके प्रयास आज भी प्रासंगिक हैं। प्रतिज्ञा उपन्यास में पूर्णा की कथा जहां एक युवा विधवा स्त्री के दुख और परेशानी की कहानी कहती हैं वहीं युवा अमृतराय की दृढ़ प्रतिज्ञा को विधवाओं के आश्रम के रूप में साकार कराती है। युग परिवर्तन के लिए ऐसे उपन्यासों की आज भी प्रासंगिकता बनी हुई है।
नायिका पूर्णा का कमला प्रसाद के कुत्सित इरादों को कुर्सी फेंककर धराशायी कर देना और अपने चारित्रिक बल का परिचय देना निसंदेह प्रेरक है। आज भी विधवाओं की स्थिति इतनी नहीं सुधरी है। अमृतराय जैसे युवाओं की प्रतिज्ञा की आज भी आवश्यकता बनी हुई है। जिससे किसी विधवा का विवाह हो सके और किसी नवयौवना का जीवन नष्ट न हो सके। इस उपन्यास की यह पंक्तियाँ देखे जो पूर्णा ने कही थी –
ईश्वर को आप बार-बार बीच में घसीट लाते हैं। इसका मतलब भी समझ रही हूं। ईश्वर किसी को कुमार्ग की ओर नहीं ले जाते। इसे चाहे आप प्रेम कहिए या वैराग्य कहिए। लेकिन है कुमार्ग ही। मैं इस धोखे में नहीं आने वाली। आप भूलकर भी मेरी ओर आँख न उठाइएगा। नहीं तो मैं यहाँ न रहूंगी। यदि कुछ न हो सकेगा तो डूब मरूंगी। अपना धर्म छोड़ने के पहले या तो अपने प्राण दे दूंगी या तुम्हारे ले लूंगी।
स्त्री अपनी चारित्रिक दृढ़ता का परिचय हमेशा देती रही है। ऐतिहासिक उपन्यास रूठी रानी भी चर्चित रहा जिसमें उमादे अपने पति मारवाड़ के बहादुर राजा मालदेव से इसलिए रूठ जाती है क्योंकि नशे में वे बांदी के पास चले जाते हैं। महारानी का ये व्यवहार जीवनपर्यंत नहीं बदलता। वे महाराजा को कभी माफ नहीं करती। साहसिक नारी की कहानी है जो पति की आश्रिता बनकर कमजोर पड़ने के बदले अपने अस्तित्व को बेजोड़ बनाए रखती है। पति की जान बचाती है। उसका साथ निभाती है। सती भी हो जाती है।
पर अपना स्वाभिमान कायम रखती है। स्त्री की ऐसी चारित्रिक दृढ़ता समाज को नैतिक पतन से रोकती है। और यही कारण है कि ऐसी कहानियां जितनी उस युग में प्रासंगिक थीं आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं।
स्त्री की दुर्बलता पर भी प्रेमचंद ने बात की है। गबन में उपन्यास की नायिका ‘जालपा’ के आभूषण प्रेम के कारण रमानाथ का गबन की ओर उन्मुख होना जहां उन्होंने दर्शाया है वहीं विपत्ति की स्थिति देख जालपा का आभूषण बेचकर पति को बरी कराना और परिवार को एक सूत्र में बांध लेना भी बताया है।
प्रेमचंद जी की प्रगतिशील सोच का परिणाम है जो सौ साल पहले ही मिस पद्मा द्वारा आजाद ख्यालों वाली महिला को अपने से ज्यादा उम्र के पुरुष के साथ लिव इन रिलेशन में दिखाया है। प्रेमचंद की कहानियों की प्रासंगिकता ही परिणाम है कि निर्देशक गुलजार ने प्रेमचंद की कहानियों का फिल्मीकरण किया। जिन्हें दूरदर्शन पर तहरीर नामक धारावाहिक के रूप में प्रदर्शित किया गया है।
ईदगाह की चर्चा के बगैर हम प्रेमचंद जी के साहित्य पर बात को विराम नहीं दे सकते। हामिद और दादी के रिश्ते में जिस संवेदनशीलता को प्रेमचंद की अंतर्दृष्टि ने उकेरा है वो चिमटे खरीदने के साथ खत्म नहीं होती। बच्चे की दादी के प्रति भावना और उनके त्याग को महसूस करना ममता और त्याग की अनूठी कहानी कहती है। मेले की चकाचौंध में बालमन दादी की तकलीफ का ध्यान रखे ये बहुत बड़ी सीख प्रेमचंद की कलम ही दे सकती थी।
शतरंज के खिलाड़ी, नमक का दारोगा, लॉटरी, घर जमाई, पूस की रात, जैसी कितनी कहानियाँ हैं जिन पर यदि लिखा जाये तो पूरा एक ग्रंथ ही बन जाये पर अपनी बातों को समेटने का प्रयास करती हूँ।
प्रेमचंद जी ने साहित्य को सदैव प्रयोजनीय माना। उनकी किस्सागोई की कला अदभुत थी। बच्चों से लेकर बड़ों तक के मनोविज्ञान को छूती हुई उनकी कहानियां आज भी विपुल पठन-पाठन का अंग बनी हुई हैं। वे कहते थे कि मैं और चीजों की तरह कल को भी उपयोगिता की तुला पर तौलता हूँ। बेशक कला आनंद का विषय है जिसमें आध्यात्मिक आनंद भी शामिल है पर कोई ऐसा आध्यात्मिक आनंद भी नहीं जो अपनी उपयोगिता का पहलू न रखता हो।
उनके विचार से किसी भी रचना को जीवन की सच्चाई का दर्पण होना चाहिए। साहित्य समाज का दर्पण है तो उसका प्रतिबिंब तो उभर कर आना ही चाहिए। वे कहते हैं जो साहित्य सुरुचि पैदा न करे, न आध्यात्मिक व मानसिक तृप्ति दे, न सौंदर्य प्रेम को जागृत करे न कठिनाइयों पर विजय प्राप्ति करने के लिये मन में दृढ़ता का संकल्प पैदा करे वह साहित्य कहलाने का अधिकारी नहीं है ।
प्रगतिशील लेखक संघ के अधिवेशन में उन्होंने अपने भाषण में कहा था-
हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा जिसमें उच्च चिंतन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौंदर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो, जीवन की सच्चाईयों का प्रकाश हो, जो हममें गति और बेचैनी पैदा करे, सुलाये नहीं क्योंकि अब और ज्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है।
1936 में ये शब्द कहे गये थे जो आज भी वैसे ही हैं – प्रासंगिक और सार्थक। धर्म, जाति और वर्ण की संकीणताओं से हमें मुक्त होना है तो ऐसे अमर साहित्य साधक की रचनाओं को और पढ़ना होगा, समझना होगा। नयी पीढ़ी को भी इससे परिचित करवाना होगा।
वे कहते हैं कि साहित्य हर रस में सौन्दर्य खोज लेता है। जीवन और साहित्य के संबंधों की तह खोलते हुए वे कहते हैं कि जीवन केवल जीना, खाना, सोना और मर जाना नहीं है। यह तो पशुओं का जीवन हुआ। जो वृत्तियां समाज या प्रकृति से मेल जोल में बाधक हों वह मनुष्य के लिए शुभ नहीं है। मानवीय अवगुण पर संयम रख कर ही जीवन को मंगलमय बनाया जा सकता है।
साहित्य में वे उच्चादर्श के हामी थे। वे मानते थे कि लेखक को आदर्शवादी होना चाहिए। वाल्मिकी व्यास, सूर, तुलसी और कबीर के साहित्य को वे अपने समय का सच्चा साहित्य मानते थे। क्योंकि इनके साहित्य से एक दिशा मिलती है। मनुष्य का परिमार्जन होता है।
एक बेहतन दुनिया के निर्माण में प्रेमचंद जी की कहानियों एवं उपन्यासों का विशेष योगदान है। इनकी रचनाओं से लोगों ने हिंदी सीखी है। जीवन में सही मार्ग पकड़ा है। उन्हें जिस प्रेम से लोगों ने पहले पढ़ा है आगे भी पढ़ते रहेंगे क्योंकि वे एक पीढ़ी के रचनाकार नहीं है। वे पीढ़ियों के रचनाकार है, कथाकार हैं।
साहित्य के इस अमर साधक को मैं पुन: नमन करती हूँ।
– रीमा दीवान चड्ढा, नागपुर (महाराष्ट्र)









