भारत एक विविधताओं से भरा हुआ समाज है, जहाँ धर्म, संस्कृति, भाषा और पहचान के अनगिनत स्वरूप देखने को मिलते हैं। इसी विविधता में ट्रांसजेंडर समुदाय का भी एक विशेष स्थान है, जो सदियों से सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का हिस्सा रहा है। हिजड़ा, किन्नर, जोगता, आरावानी जैसी पारंपरिक पहचानें इस समुदाय का हिस्सा हैं, साथ ही आधुनिक समय में नॉन-बाइनरी, जेंडर-फ्लूइड और इंटरसेक्स व्यक्ति भी इसके अंतर्गत आते हैं। 2011 की जनगणना में लगभग 48 लाख लोगों ने स्वयं को ट्रांसजेंडर के रूप में पहचाना, लेकिन वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक मानी जाती है।
इतिहास में देखें तो प्राचीन भारत में किन्नरों को धार्मिक और सांस्कृतिक अनुष्ठानों में सम्मान प्राप्त था। महाभारत की कथा में शिखंडी और रामायण की कथा में हिजड़ों की उपस्थिति इसका प्रमाण है। मुगलकाल में भी दरबारों और सांस्कृतिक आयोजनों में उनकी भूमिका देखने को मिलती थी। लेकिन औपनिवेशिक काल में 1871 के क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट ने इस समुदाय को अपराधी वर्ग घोषित कर दिया, जिससे सामाजिक कलंक और भेदभाव की जड़ें गहरी हो गईं। आज भी भारतीय समाज उस ऐतिहासिक कलंक को ढो रहा है और यह समुदाय मुख्यधारा से बाहर रखा जाता है।
आधुनिक भारत में ट्रांसजेंडरों के अधिकारों के संदर्भ में राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण बनाम भारत संघ, 2014 का सुप्रीम कोर्ट का निर्णय एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है। इस निर्णय ने ट्रांसजेंडरों को थर्ड जेंडर की मान्यता दी और राज्य को इनके अधिकारों की रक्षा हेतु ठोस कदम उठाने का निर्देश दिया। इसके बाद 2019 में ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम लाया गया, जिसमें शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और सार्वजनिक सेवाओं में भेदभाव पर रोक लगाई गई। आत्म-पहचान का अधिकार भी प्रदान किया गया, जिसके तहत जिला मजिस्ट्रेट द्वारा पहचान पत्र जारी किया जाता है। 2020 में इस अधिनियम को लागू करने के लिए नियम बनाए गए और राष्ट्रीय परिषद की स्थापना की गई।
हालाँकि कानूनी सुधारों के बावजूद जमीनी हकीकत अलग है। पहचान पत्र जारी करने की प्रक्रिया जटिल और अपमानजनक बताई जाती है। दिसंबर 2023 तक केवल 65 प्रतिशत आवेदनों पर ही कार्रवाई हुई थी और हजारों आवेदन कानूनी समयसीमा से बाहर लंबित रहे। आत्म-पहचान को सरल बनाने के बजाय यह प्रक्रिया कई बार आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाती है और अधिकारियों की असंवेदनशीलता से लोग हतोत्साहित हो जाते हैं।
सामाजिक भेदभाव और उपेक्षा ट्रांसजेंडरों के जीवन की सबसे बड़ी चुनौती है। परिवार से अस्वीकृति, समाज में उपहास और हिंसा की घटनाएँ इन्हें मानसिक तनाव की ओर धकेल देती हैं। एनएचआरसी की रिपोर्ट के अनुसार, 31 प्रतिशत ट्रांसजेंडर आत्महत्या कर चुके हैं और 50 प्रतिशत ने 20 वर्ष की आयु तक आत्महत्या का प्रयास किया। स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच भी बड़ी समस्या है। लिंग-पुष्टि शल्यक्रिया की लागत दो से पाँच लाख रुपये तक होती है, जिसे अधिकांश लोग वहन नहीं कर सकते। बीमा कंपनियाँ अक्सर इसे कवर नहीं करतीं, हालाँकि आयुष्मान भारत टीजी प्लस योजना ने पाँच लाख रुपये तक का कवरेज दिया है, लेकिन इसकी जानकारी और पहुँच बेहद सीमित है।
रोजगार और आर्थिक अवसरों की स्थिति भी अत्यंत दयनीय है। आईएलओ की 2022 की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रांसजेंडरों में बेरोजगारी दर 48 प्रतिशत है। 92 प्रतिशत लोग आर्थिक बहिष्कार का सामना कर रहे हैं। कार्यस्थलों पर लिंग-तटस्थ सुविधाओं की कमी और सहकर्मियों का भेदभाव उन्हें काम के अवसरों से वंचित कर देता है। कुछ कंपनियों जैसे टाटा स्टील ने ट्रांसजेंडरों को कार्यबल में शामिल करने की पहल की है, लेकिन यह संख्या नगण्य है। विश्व बैंक की 2021 की रिपोर्ट के अनुसार, यदि ट्रांसजेंडरों को कार्यबल में शामिल किया जाए तो भारत की जीडीपी में 1.7 प्रतिशत तक की वृद्धि हो सकती है।
शिक्षा के क्षेत्र में भी स्थिति संतोषजनक नहीं है। 2011 की जनगणना के अनुसार, ट्रांसजेंडरों की साक्षरता दर मात्र 56.1 प्रतिशत है, जबकि राष्ट्रीय औसत 74 प्रतिशत है। विद्यालयों और कॉलेजों में ताने, उत्पीड़न और असंवेदनशील वातावरण के कारण पढ़ाई बीच में ही छोड़ने वालों की संख्या अधिक है। केरल और महाराष्ट्र जैसे राज्यों ने कुछ सकारात्मक कदम उठाए हैं। केरल ने विश्वविद्यालय स्तर पर आरक्षण और छात्रावास सुविधाएँ उपलब्ध कराई हैं, जबकि महाराष्ट्र ने कॉलेजों में ट्रांसजेंडर सेल स्थापित किए हैं। लेकिन देशभर में ऐसी पहलों की व्यापक कमी है।
सरकार की कई योजनाएँ इस समुदाय की मदद के लिए लागू की गई हैं। स्माइल योजना के अंतर्गत पुनर्वास और आजीविका सुनिश्चित करने की कोशिश की जा रही है। गरिमा गृह के रूप में सुरक्षित आवास और कौशल विकास के लिए आश्रय स्थल बनाए गए हैं। राष्ट्रीय पोर्टल पर पहचान पत्र और अन्य सुविधाओं के लिए ऑनलाइन आवेदन संभव है। इसके अतिरिक्त, ट्रांसजेंडरों को अब विकलांगता पेंशन योजनाओं के अंतर्गत भी शामिल किया गया है। जनवरी 2022 में गृह मंत्रालय ने जेलों में तीसरे लिंग के कैदियों की गोपनीयता और गरिमा सुनिश्चित करने के निर्देश भी जारी किए।
हालाँकि इन योजनाओं का प्रभाव सीमित है क्योंकि जागरूकता की कमी और प्रशासनिक उदासीनता इनके लाभार्थियों तक पहुँचने में बाधा बनती है। समाज में भी अभी व्यापक संवेदनशीलता की आवश्यकता है। जब तक परिवार, शैक्षणिक संस्थान और कार्यस्थल इस समुदाय को बराबरी का दर्जा नहीं देंगे, तब तक कानूनी प्रावधान पर्याप्त नहीं होंगे।
अंतर्राष्ट्रीय अनुभव से भी भारत बहुत कुछ सीख सकता है। अर्जेंटीना में लिंग पहचान की स्व-घोषणा को मान्यता दी गई है और स्वास्थ्य सेवाओं तक मुफ्त पहुँच है। कनाडा में व्यापक भेदभाव-विरोधी कानून हैं और कार्यस्थलों पर लिंग-तटस्थ सुविधाएँ सुनिश्चित की गई हैं। ब्रिटेन ने जेंडर रिकग्निशन एक्ट लागू किया है, जो लिंग पहचान को कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है। भारत को इन सर्वोत्तम प्रथाओं से प्रेरणा लेकर अपनी नीतियों को और सशक्त बनाना चाहिए।
आगे की राह स्पष्ट है, सबसे पहले, कानूनी ढाँचे का अक्षरशः पालन होना चाहिए और पहचान पत्र प्रक्रिया को सरल, सम्मानजनक और समयबद्ध बनाया जाना चाहिए। आर्थिक अवसरों को बढ़ाने के लिए आरक्षण, उद्यमिता ऋण और लिंग-तटस्थ कार्यस्थलों की अनिवार्यता आवश्यक है। स्वास्थ्य सेवाओं में लिंग-पुष्टि शल्यक्रिया और मानसिक स्वास्थ्य को बीमा के अंतर्गत शामिल करना चाहिए। शिक्षा में लिंग-संवेदनशील पाठ्यक्रम और सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित करना चाहिए। समाज में जागरूकता लाने के लिए मैं भी मानव हूँ जैसे अभियानों को बढ़ावा देना होगा और कूवगम महोत्सव, ट्रांसजेंडर प्राइड मार्च जैसे सांस्कृतिक आयोजनों से विविधता का सम्मान बढ़ाना होगा।
भारत में ट्रांसजेंडरों के अधिकारों को लेकर उल्लेखनीय प्रगति हुई है, लेकिन अभी भी बहुत लंबा रास्ता तय करना बाकी है। सुप्रीम कोर्ट के नालसा निर्णय और 2019 के अधिनियम ने इन्हें कानूनी पहचान दी है, परंतु जमीनी स्तर पर भेदभाव, हिंसा और बहिष्कार की समस्याएँ बनी हुई हैं। यदि भारत वास्तव में समावेशी लोकतंत्र बनना चाहता है तो उसे ट्रांसजेंडरों को केवल कानूनी मान्यता ही नहीं बल्कि सम्मानजनक जीवन, समान अवसर और गरिमा भी देनी होगी। यह तभी संभव होगा जब समाज, सरकार और संस्थाएँ मिलकर इस समुदाय को अपनी मुख्यधारा का हिस्सा बनाएँ। एक ऐसा भारत जहाँ हर व्यक्ति चाहे उसका लिंग कोई भी हो, गरिमा और सम्मान के साथ जी सके, तभी सच्चे अर्थों में समावेशी भारत कहलाएगा।









