नई दिल्ली | मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर दाखिल जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा कदम उठाते हुए इसे राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) को हस्तांतरित कर दिया है। अदालत ने आयोग को निर्देश दिया है कि वह इस मामले की निगरानी करे और सुनिश्चित करे कि मानसिक बीमारी से जूझ रहे नागरिकों के अधिकारों का संरक्षण हो।
अधिवक्ता गौरव कुमार बंसल द्वारा 2018 में दायर इस याचिका में दावा किया गया था कि देशभर में मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम के महत्वपूर्ण प्रावधानों का पालन नहीं हो रहा है, जिससे मानसिक समस्याओं से पीड़ित लोगों की गरिमा और स्वतंत्रता का गंभीर उल्लंघन हो रहा है। शीर्ष अदालत की दो-न्यायाधीशीय पीठ — न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आर. महादेवन — ने कहा कि केंद्र सरकार के हलफनामे के मुताबिक अधिनियम के तहत केंद्रीय मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण (CMHA), राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण (SMHA) और मानसिक स्वास्थ्य समीक्षा बोर्ड (MHRB) का गठन किया जा चुका है। अब इनकी कार्यप्रणाली व प्रभाव का मूल्यांकन NHRC करेगी।
याचिका में सबसे गंभीर आरोप उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले में एक धर्म आधारित मानसिक आश्रय स्थल पर मानसिक रोगियों को जंजीरों से बांधने का है। कोर्ट ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की तस्वीरें बेहद चिंताजनक हैं और किसी भी रूप में बर्दाश्त नहीं की जा सकतीं। अदालत ने स्पष्ट कहा कि मानसिक रोग से पीड़ित मरीजों को जंजीरों में बांधना संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है, जो प्रत्येक नागरिक को गरिमा के साथ जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी देता है।
गौरतलब है कि 2017 में बने मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम का उद्देश्य मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को अधिकार-आधारित ढांचे में लाना और मरीजों को सम्मानजनक उपचार उपलब्ध कराना है। सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी केंद्र व सभी राज्यों को निर्देश दिए थे कि वे इस कानून को प्राथमिकता से लागू करें और मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों में मानवाधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
अब यह जिम्मेदारी NHRC के पास है कि वह इस संवेदनशील मुद्दे पर सख्त निगरानी रखते हुए अदालत की मंशा के अनुसार कार्रवाई सुनिश्चित करे, ताकि मानसिक स्वास्थ्य से जूझ रहे लोगों को अब और अपमानजनक स्थितियों का सामना न करना पड़े।











