नई दिल्ली। उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों की तथाकथित “बड़ी साज़िश” से जुड़े यूएपीए केस में लगभग पांच वर्ष से जेल में बंद छात्र नेताओं और कार्यकर्ताओं — उमर ख़ालिद, शरजील इमाम, गुलफ़िशा फ़ातिमा और मीरान हैदर — की जमानत सुनवाई आज सुप्रीम कोर्ट में फिर टल गई। अदालत ने दिल्ली पुलिस द्वारा जवाब दाखिल न करने पर कड़ी आपत्ति जताते हुए पुलिस को फटकार लगाई और कहा कि अब यह देरी और स्वीकार नहीं की जा सकती। अगली सुनवाई 31 अक्टूबर को होगी।
सुनवाई की शुरुआत में ही अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस. वी. राजू ने जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए समय माँगा। लेकिन जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की पीठ ने दो हफ़्ते का समय देने से स्पष्ट इनकार कर दिया।
पीठ ने कहा —
“सच कहें तो, जमानत के मामलों में जवाब दाखिल करने का सवाल ही नहीं उठता। आपको पर्याप्त समय दिया जा चुका है। पाँच साल हो चुके हैं। अब और देरी नहीं होगी।”
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी और अन्य वकीलों ने यह मुद्दा उठाया कि मामले में ट्रायल का कोई ठोस प्रगति नहीं हुई और अभियुक्त बिना दोष सिद्ध हुए वर्षों से जेल में सजा भुगत रहे हैं।
क्या है मामला?
फरवरी 2020 में सीएए-एनआरसी विरोध प्रदर्शनों के बीच भड़की दिल्ली हिंसा में 53 लोगों की मौत हुई, 700 से अधिक घायल हुए। इस मामले की सबसे विवादास्पद FIR-59/2020 दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल ने दर्ज की थी।
पुलिस का दावा है कि यह हिंसा पूर्वनियोजित ‘साज़िश’ का परिणाम थी, जिसमें इन कार्यकर्ताओं की भूमिका रही।
लेकिन आरोपित सभी आरोपों से इनकार करते रहे हैं और इसे शांतिपूर्ण विरोध को अपराध साबित करने की कोशिश बताते हैं।
देरी पर उठते सवाल
मानवाधिकार संगठनों और कानूनी विशेषज्ञों ने कहा है कि
इतने लंबे समय तक मुकदमे की प्रगति के बिना गिरफ्तारी — न्यायिक प्रक्रिया की बुनियादी भावना पर हमला है।
ग़ौरतलब है कि दिल्ली हाईकोर्ट ने सितंबर 2025 में इन सभी को जमानत देने से इनकार कर दिया था, जिसके बाद वे सुप्रीम कोर्ट पहुँचे हैं।
क्या आगे?
कोर्ट ने साफ़ कर दिया है कि इसी हफ्ते सुनवाई होगी और पुलिस की प्रक्रियात्मक देरी को अब आधार नहीं माना जाएगा।
अब नज़र 31 अक्टूबर पर — क्या इन पाँच साल पुराने आरोपों के बीच फँसे इन कार्यकर्ताओं को आखिरकार न्याय मिलेगा?











