मनुष्य की सभ्यता की शुरुआत से ही अज्ञात और रहस्यमय शक्तियों के प्रति भय और असुरक्षा रही है। जब प्राकृतिक घटनाओं, अकस्मात बीमारियों या मृत्यु के कारण समझ में नहीं आते थे, तब मानव ने उन्हें अलौकिक शक्तियों, भूत-प्रेत या टोना-टोटके से जोड़ दिया। यही अज्ञान और डर आज भी समाज में विभिन्न रूपों में प्रकट होता है। इनमें सबसे कुप्रसिद्ध और खतरनाक है डायन प्रथा, जिसके कारण आज भी ग्रामीण और आदिवासी समाजों की महिलाएँ पीड़ित होती हैं। उन्हें निर्वस्त्र घुमाया जाता है, प्रताड़ित किया जाता है और कभी-कभी हत्या तक कर दी जाती है। यह विडंबना है कि इक्कीसवीं सदी का भारत मंगलयान और चंद्रयान भेज रहा है, लेकिन कुछ हिस्सों में अंधविश्वास और पुरुषवादी सोच के कारण नागरिकों का जीवन और गरिमा खतरे में है।
हाल ही की घटनाएँ इस वास्तविकता को उजागर करती हैं। 2025 की शुरुआत में झारखंड के ईस्ट सिंहभूम जिले में 75 वर्षीय सिंगो किस्कू को टोना-टोटका करने का आरोप लगाकर मार डाला गया। इसी तरह मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में एक बेटे ने अपने पिता की हत्या कर दी, क्योंकि उसे विश्वास था कि पिता काला जादू कर रहे हैं। ये घटनाएँ केवल व्यक्तिगत अपराध नहीं हैं, बल्कि समाज में व्याप्त मानसिकता का संकेत हैं जिसमें विज्ञान और तर्क की जगह अंधविश्वास को अधिक महत्व दिया जाता है।
इतिहास में डायन प्रथा कोई नया अनुभव नहीं है। यूरोप और अमेरिका में सोलहवीं और सत्रहवीं सदी में हजारों महिलाओं को चुड़ैल घोषित कर जलाया गया या फांसी दी गई। भारत में भी यह प्रथा लंबे समय से चली आ रही है, विशेषकर बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान और असम के ग्रामीण और आदिवासी समाजों में। इस प्रथा में अधिकतर विधवाएँ, दलित और आदिवासी महिलाएँ निशाना बनती हैं। समाज अकाल, महामारी, मृत्यु या प्राकृतिक संकट का कारण किसी महिला में ढूँढता है। यही कारण है कि बलि का बकरा प्रायः महिला बन जाती है।
सामाजिक दृष्टिकोण से देखें तो यह प्रक्रिया एमिल डुर्खाइम के सामाजिक बलिदान सिद्धांत से मेल खाती है। डुर्खाइम के अनुसार समाज संकट की स्थिति में किसी को बलि का बकरा खोजता है। भारत के गाँवों में यही कार्य महिलाओं को डायन घोषित कर किया जाता है। गरीबी, शिक्षा की कमी और संसाधनों की तंगी भी इस प्रथा को बढ़ावा देती हैं। फसल खराब होने, पशु मृत्यु या बच्चों की बीमारी जैसी घटनाओं में लोग अलौकिक शक्तियों को दोष देते हैं।
डायन प्रथा का गहरा संबंध पुरुषवादी समाज और पितृसत्तात्मक सोच से है। जिन महिलाओं के पास संपत्ति या जमीन होती है, उन्हें डायन कहकर मार डालना इस प्रणाली का हिस्सा है, ताकि संपत्ति दबंगों के हाथ लग सके। यह केवल अंधविश्वास नहीं बल्कि सामाजिक नियंत्रण का औजार भी है। महिलाओं को अपमानित करना, निर्वस्त्र करना, गाँव से बहिष्कृत करना या मार डालना पितृसत्ता की हिंसक रणनीतियाँ हैं।
भारत का संविधान इस प्रकार के किसी भी भेदभाव को अस्वीकार करता है। अनुच्छेद 14 सभी को समानता का अधिकार देता है, और डायन प्रथा इसका प्रत्यक्ष उल्लंघन करती है। अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी देता है, जो डायन प्रथा में प्रताड़ित महिलाओं के लिए लांघा जाता है। अनुच्छेद 15 धर्म, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव निषिद्ध करता है, जबकि डायन प्रथा अक्सर इन्हीं आधारों पर महिलाओं को निशाना बनाती है। अनुच्छेद 51A नागरिकों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने का कर्तव्य सौंपता है, लेकिन समाज का एक बड़ा हिस्सा इससे पीछे है।
कई राज्यों ने डायन प्रथा को रोकने के लिए कानून बनाए। बिहार ने डायन प्रथा निवारण अधिनियम, 1999 लागू किया। झारखंड ने 2001 में इसी तरह का कानून बनाया। छत्तीसगढ़ ने 2005 में टोना-प्रताड़ना निवारण अधिनियम पारित किया। राजस्थान और असम ने 2015 में डायन-प्रताड़ना निवारण अधिनियम, 2015 लागू किया। महाराष्ट्र ने 2013 में काला जादू और अघोरी प्रथाओं के खिलाफ कानून बनाया। इन कानूनों का उद्देश्य स्पष्ट है डायन बताकर किसी महिला को प्रताड़ित करने वालों को कड़ी सजा देना। असम के कानून में तो यह प्रावधान है कि यदि किसी महिला ने आरोप की वजह से आत्महत्या कर ली तो आरोपी को आजीवन कारावास हो सकता है।
हालांकि केवल कानून बनाने से समस्या खत्म नहीं होती। पुलिस कई बार मामले दर्ज करने से कतराती है, गवाह सामने नहीं आते और सामाजिक दबाव के कारण कार्यवाही में देरी होती है। यही कारण है कि केवल कानूनी प्रावधानों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है।
आज के डिजिटल युग में अंधविश्वास ने नया रूप ले लिया है। सोशल मीडिया, व्हाट्सऐप और अन्य प्लेटफॉर्म पर अफवाहें तेजी से फैलती हैं। कई बार किसी महिला की तस्वीर के साथ संदेश जोड़ दिया जाता है कि यह चुड़ैल है। अफवाहें लिंचिंग और सामूहिक हिंसा तक ले जाती हैं। मीडिया में सनसनीखेज़ प्रस्तुति भी डर और अंधविश्वास को बढ़ावा देती है। जिम्मेदार पत्रकारिता का अर्थ है कि इस तरह की घटनाओं को अपराध के रूप में प्रस्तुत किया जाए और समाज को कानून और विज्ञान की जानकारी दी जाए।
मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो अंधविश्वास का मुख्य कारण भय और असुरक्षा है। लोग अज्ञात और असामान्य घटनाओं के डर को भूत-प्रेत में ढूँढते हैं। कई बार मानसिक बीमारियों से पीड़ित महिलाओं को डायन मान लिया जाता है। डिप्रेशन, सिज़ोफ्रेनिया जैसी मानसिक बीमारियों को भूत या टोना-टोटके का प्रभाव समझकर पीड़ित को प्रताड़ित किया जाता है। यह सामूहिक वहम का रूप भी ले लेता है, जिसे मास हिस्टीरिया कहते हैं। पूरा गाँव मानने लगता है कि कोई महिला चुड़ैल है और सामूहिक हिंसा होती है।
अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण से देखें तो अफ्रीका के कई देशों में आज भी चुड़ैल-शिकार होता है। तंज़ानिया और नाइजीरिया में हर साल सैकड़ों महिलाएँ इसका शिकार होती हैं। यूरोप और अमेरिका में शिक्षा और कानून ने इस प्रथा को समाप्त कर दिया। भारत को भी इसी दिशा में चलना होगा।
सुधार की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण है शिक्षा और जागरूकता। प्राकृतिक घटनाओं का वैज्ञानिक कारण समझाने, महिलाओं को शिक्षा और संपत्ति के अधिकार देने, पुलिस और न्यायपालिका को संवेदनशील बनाने और गैर-सरकारी संस्थाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने की आवश्यकता है। असम की कार्यकर्ता बिरुबाला राभा ने वर्षों तक अभियान चलाकर कानून लागू कराया। डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म का उपयोग कर छोटे-छोटे वीडियो, डॉक्यूमेंट्री और पोस्टर बनाकर लोगों को बताया जा सकता है कि डायन प्रथा अपराध है और इसके लिए सख्त सजा हो सकती है।
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि डायन, चुड़ैल और भूत जैसी धारणा मानव मन का वहम हैं। जब तक समाज डर और अज्ञान से मुक्त नहीं होगा, महिलाओं को हिंसा और अपमान झेलना पड़ेगा। संविधान हमें समानता, स्वतंत्रता और गरिमा का अधिकार देता है। यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम अंधविश्वास की जंजीरें तोड़ें और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाएँ। डर को विश्वास में बदलने के बजाय शिक्षा और जागरूकता के माध्यम से अज्ञान मिटाना होगा। महिलाओं को चुड़ैल कहकर अपमानित करने की बजाय उन्हें सम्मान देना चाहिए, क्योंकि वही जीवन की जननी हैं।






