लोकवाहिनी, संवाददाता:नई दिल्ली। विवादों में घिरे इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को अपना इस्तीफा सौंप दिया है, जिससे उनके खिलाफ जारी महाभियोग की कार्यवाही निष्प्रभावी हो गई है। पिछले साल न्यायमूर्ति वर्मा के दिल्ली स्थित आवास से जली हुई नोटों की गड्डियां बरामद होने के बाद से वह आलोचनाओं का सामना कर रहे हैं।
दिल्ली उच्च न्यायालय के तत्कालीन न्यायाधीश न्यायमूर्ति वर्मा के दिल्ली स्थित आवास में 14 मार्च, 2025 को होली की रात लगभग 11 बजकर 35 मिनट पर आग लगने के बाद भारी मात्रा में नकदी मिलने का दावा किया गया था। आग बुझाने के लिए अग्निशमन विभाग के कर्मचारी मौके पर पहुंचे और आग पर काबू पाया।
नौ अप्रैल को राष्ट्रपति को भेजे गए एक पत्र में 57 वर्षीय न्यायमूर्ति वर्मा ने कहा कि वह अत्यंत दुख के साथ अपना इस्तीफा दे रहे हैं और इस पद पर सेवा करना उनके लिए सम्मान की बात थी। राष्ट्रपति को भेजे गए त्यागपत्र में उन्होंने कहा, “राष्ट्रपति महोदया, मैं आपके सम्मानित कार्यालय पर उन कारणों का बोझ नहीं डालना चाहता जिनके चलते मुझे यह पत्र प्रेषित करना पड़ रहा है, लेकिन अत्यंत पीड़ा के साथ मैं इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश पद से तत्काल प्रभाव से अपना त्यागपत्र दे रहा हूँ। इस पद पर सेवा करना मेरे लिए सम्मान की बात रही है।”
वर्मा के इस्तीफे के कारण उन्हें उनके पद से हटाने के उद्देश्य से लंबित महाभियोग की कार्यवाही अब निष्प्रभावी हो जाती है। घटना के बाद महाभियोग प्रस्ताव से पहले एक पूर्व शर्त के तहत उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, मद्रास उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश मुनीश्वर नाथ श्रीवास्तव और वरिष्ठ अधिवक्ता बी. वी. आचार्य सहित तीन सदस्यीय जांच समिति जांच कर रही थी।
न्यायमूर्ति वर्मा के मामले में कई उतार-चढ़ाव आए। उन्होंने न्यायाधीशों की दो निंदात्मक रिपोर्ट के बाद तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना की इस्तीफे की सलाह को मानने से इनकार कर दिया था। कोई विकल्प नहीं होने पर न्यायमूर्ति खन्ना ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का अनुरोध किया था। (पेज 6 पर)








