चिंताजनक:यवतमाल जिले में किसान आत्महत्याओं का सिलसिला जारी
लोकवाहिनी, संवाददाता
अमरावती। पश्चिम विदर्भ के यवतमाल जिले की ‘किसान आत्महत्या प्रभावित जिला’ यह कलंकित पहचान मिटाने के सभी सरकारी दावे खोखले साबित हुए हैं। चालू वर्ष में जनवरी से जून 2026 तक इन छह महीनों में जिले में कुल 152 किसानों द्वारा विभिन्न कारणों से अपनी जीवन यात्रा समाप्त करने की बेहद चौंकाने वाली और चिंताजनक आंकड़े सामने आए हैं। प्रकृति की अनिश्चितता, बढ़ती उत्पादन लागत, कर्ज का बोझ और प्रशासनिक शर्तों-नियमों के इस दुष्चक्र में फंसा यहां का अन्नदाता पूरी तरह से हताश हो चुका है, यह भयावह तस्वीर सामने आई है। जिले में किसानों की आत्महत्याओं का यह सिलसिला केवल किसी एक विशेष क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि जिले के अधिकांश ग्रामीण इलाकों में फैल चुका है। रालेगांव, मारेगांव, दारव्हा, पुसद, महागांव और यवतमाल तालुकों में आत्महत्याओं का प्रमाण सबसे अधिक गंभीर है। जिन गांवों में सिंचाई की कोई सुविधा नहीं है और पूरी तरह से वर्षा आधारित कपास-सोयाबीन फसलों पर निर्भरता है, ऐसे अति दुर्गम गांवों के छोटे किसान इस संकट में अधिक फंस रहे हैं। आत्महत्या करने वालों में 30 से 50 वर्ष आयु वर्ग के युवा और जिम्मेदार किसानों का प्रमाण सबसे अधिक है। परिवार की जिम्मेदारी, बच्चों की शिक्षा और सिर पर चढ़े कर्ज के पहाड़ के कारण निराश हुए युवा किसान यह कदम उठा रहे हैं, ऐसा आंकड़ों से दिखाई देता है। (पेज 6 पर)
ढाई वर्षों में 800 आत्महत्याएं
चालू वर्ष में जनवरी से जून तक छह महीनों की अवधि में जिले में कुल 152 किसानों द्वारा आत्महत्या किए जाने की जानकारी प्रशासन के पास दर्ज है। इसमें जनवरी महीने में 25, फरवरी में 31, मार्च में 27, अप्रैल में 31, मई में 16 और जून महीने में 22 किसानों ने आत्महत्या की है। प्रशासन के रिकॉर्ड के अनुसार, 2024 में पूरे वर्ष में 300 से अधिक किसानों ने आत्महत्या की। वहीं, 2025 में इसमें वृद्धि होकर यह संख्या 342 तक पहुंच गई। ढाई वर्षों में कुल 800 से अधिक किसानों द्वारा आत्महत्या किए जाने के कारण प्रशासन के सभी दावों और उपाययोजनाओं के विफल होने का आरोप लगाया जा रहा है। प्रशासन की ओर से आत्महत्याओं के सिलसिले को रोकने के लिए किसान स्वावलंबन मिशन और बलीराजा चेतना प्रकल्प जैसे उपक्रम चलाकर परामर्श और सहायता देने के दावे किए जाते हैं। हालांकि, वास्तव में गांवों में जाकर देखने पर प्रशासनिक व्यवस्था और किसानों के बीच बड़ी खाई दिखाई देती है। फसल को कानूनी न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं मिलना, फसल बीमा मुआवजा मिलने में होने वाली देरी और साहूकारों के जाल के कारण जनवरी से जून 2026 के केवल छह महीनों में 152 किसानों द्वारा आत्महत्या करना पूरी व्यवस्था की विफलता पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है।













