नयी दिल्ली। देश में मतदाता सूचियों की बड़े पैमाने पर सफाई अभियान यानी विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दूसरे चरण की शुरुआत से पहले ही राजनीतिक बहस तेज हो गई है। निर्वाचन आयोग ने घोषणा की है कि बिहार के बाद अब 12 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में यह प्रक्रिया शुरू होगी। 4 नवंबर से गणना और सत्यापन कार्य शुरू होगा, मसौदा सूची 9 दिसंबर को और अंतिम मतदाता सूची 7 फरवरी 2026 को प्रकाशित होगी। लगभग 51 करोड़ मतदाता इस प्रक्रिया में शामिल होंगे, जिनमें उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल जैसे चुनावी रूप से अहम राज्य शामिल हैं।
कांग्रेस ने इस अभियान की नीयत पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि भाजपा के इशारे पर फर्जी मतदाताओं के नाम जोड़ने और वास्तविक मतदाताओं के नाम हटाने की कवायद चल रही है। पार्टी के प्रवक्ता पवन खेड़ा ने दावा किया कि बिहार में SIR के दौरान हुई व्यापक अनियमितताओं के बाद सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा। उनके अनुसार, “जब कर्नाटक के आलंद में धांधली उजागर हुई, तो यह साबित हो गया कि वोट लिस्ट छेड़छाड़ योजनाबद्ध है। ऐसे आयोग द्वारा SIR कराना संदेह पैदा करता है।”
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी आयोग की प्रक्रिया को लेकर संदेह जताया। उन्होंने कहा कि आयोग को जल्दबाजी छोड़कर पहले बिहार चुनाव के प्रभावों का मूल्यांकन करना चाहिए। उनके अनुसार, SIR की यह कवायद यदि राजनीतिक रूप से प्रेरित हुई तो आयोग की विश्वसनीयता प्रभावित होगी, खासकर तब जब जम्मू-कश्मीर में परिसीमन को लेकर पहले ही विवाद रहा है।
उधर, पश्चिम बंगाल में SIR की घोषणा से पहले ही 200 से अधिक वरिष्ठ अधिकारियों के तबादलों से राजनीतिक तनातनी चरम पर पहुंच गई है। तृणमूल कांग्रेस ने आरोप लगाया कि भाजपा जल्द ही ‘पात्र मतदाताओं के नाम हटाने’ की साजिश में SIR का इस्तेमाल करेगी। टीएमसी नेता कुणाल घोष ने कहा कि उनकी पार्टी इस प्रक्रिया का हर स्तर पर लोकतांत्रिक विरोध करेगी। वहीं बंगाल भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी ने जवाब देते हुए कहा कि “अवैध मतदाताओं को बचाने की कोशिश करने वाले ही असल में परेशान हैं। घुसपैठियों पर कार्रवाई होगी।”
इस बीच, माकपा ने पारदर्शिता का मुद्दा उठाया है। पार्टी नेता मोहम्मद सलीम ने सवाल किया कि बिना जनगणना पूरी किए SIR का आधार क्या होगा और किस हिट-लिस्ट पर नाम काटने का काम होगा? उन्होंने आशंका जताई कि इस प्रक्रिया का दुरुपयोग कर वास्तविक मतदाताओं को भी हटाया जा सकता है और इसी कारण वे प्रत्येक बूथ पर पर्यवेक्षक तैनात करने की तैयारी कर रहे हैं।
निर्वाचन आयोग ने सभी आरोपों से इनकार करते हुए कहा है कि SIR का उद्देश्य केवल मतदाता सूची को त्रुटिरहित बनाना है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के अनुसार, आयोग संवैधानिक दायित्व निभा रहा है जिससे कोई योग्य मतदाता छूट न जाए और कोई अयोग्य नाम सूची में न रह सके। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि असम में अलग से आदेश जारी होगा क्योंकि वहां नागरिकता के विशेष प्रावधान लागू हैं।
मतदाता सूची सुधार सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया है, लेकिन जैसे ही यह चुनावी राज्यों तक पहुंची है, इसका राजनीतिक महत्व कई गुना बढ़ गया है। अब यह सिर्फ एक तकनीकी अभियान नहीं, बल्कि चुनाव पूर्व सियासत का अहम मुद्दा बन गया है, जिसकी दिशा आने वाले महीनों में देश की लोकतांत्रिक तस्वीर पर बड़ा प्रभाव डाल सकती है।









