नई दिल्ली। नक्सल प्रभावित इलाकों में सुरक्षा बलों को बड़ी सफलता मिली है। छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले में 21 माओवादी कैडर हथियार छोड़कर मुख्यधारा में लौट आए। गृह मंत्री अमित शाह ने इस आत्मसमर्पण को सरकार के नक्सलवाद उन्मूलन अभियान में एक महत्वपूर्ण पड़ाव बताते हुए कहा कि माओवादी हिंसा अब अपने अंतिम दौर में पहुंच चुकी है। सरेंडर करने वालों में 13 वरिष्ठ कैडर शामिल हैं, जिन पर सुरक्षा एजेंसियों की लंबे समय से निगरानी थी और जो कई हमलों में शामिल रहे थे।
अमित शाह ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर लिखा कि कांकेर में आत्मसमर्पण करने वाले ये नक्सली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार की अपील पर हिंसा का रास्ता छोड़कर विकास और शांति की मुख्यधारा में शामिल हुए हैं। उन्होंने कहा कि जो भी अब भी हथियार लिए जंगलों में छिपे बैठे हैं, वे जल्द आत्मसमर्पण करें और अपने परिवारों के पास लौटें। शाह ने दोहराया कि भारत सरकार पूरी दृढ़ता के साथ 31 मार्च 2026 तक नक्सलवाद का समाप्त कर देने के संकल्प पर काम कर रही है।
नक्सल मोर्चे पर यह एकालौता विकास नहीं है। इससे पहले 17 अक्टूबर को बस्तर संभाग के जगदलपुर में केंद्रीय समिति के एक सदस्य सहित 210 माओवादी पुलिस और केंद्रीय बलों के सामने हथियार डाल चुके हैं। इन पर कुल 9.18 करोड़ रुपये का इनाम घोषित था और उन्होंने 153 से अधिक हथियार सुरक्षा बलों के हवाले किए थे। वहीं 2 अक्टूबर को बीजापुर में 103 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया था, जिनमें से 49 पर कुल 1.06 करोड़ रुपये से अधिक का इनाम घोषित था। पिछले कुछ महीनों में इस तरह के लगातार आत्मसमर्पण यह संकेत देते हैं कि संगठन की जमीनी पकड़ तेजी से कमजोर होती जा रही है और शीर्ष नेतृत्व भी अब कहीं सुरक्षित नहीं है।
सरकार का दावा है कि दृढ़ सुरक्षा अभियान के साथ-साथ सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और संचार जैसी विकास योजनाओं के तेज क्रियान्वयन ने इस क्षेत्र में बड़ा बदलाव लाया है। नक्सलवाद, जो दशकों से आदिवासी इलाकों में भय और पिछड़ेपन का कारण रहा है, अब सरकार और स्थानीय समाज दोनों के संयुक्त प्रयासों से पीछे हटता दिख रहा है। शाह का यह वक्तव्य राजनीतिक रूप से भी स्पष्ट संदेश देता है कि केंद्र सरकार नक्सलवाद को केवल सुरक्षा चुनौती मानकर नहीं चल रही, बल्कि इसे भारत के विकास मॉडल के विरुद्ध खड़ा आखिरी अवरोध समझकर उखाड़ फेंकने को तैयार है।
इस तेजी के साथ एक बात साफ हो रही है—माओवाद अब ज़मीन खिसकती देख रहा है। जिन इलाकों में कभी सुरक्षा बलों की आवाजाही भी मुश्किल मानी जाती थी, वहां आज आत्मसमर्पण की कतारें दिख रही हैं। आने वाले महीनों में यह अभियान कितना निर्णायक मोड़ लेता है, यह देखना महत्वपूर्ण होगा, लेकिन संकेत स्पष्ट हैं—नक्सलवाद का अध्याय अब इतिहास का हिस्सा बनने की ओर बढ़ चुका है।











