लोकवाहिनी संवाददाता:नई दिल्ली। दिल्ली की एक अदालत ने शुक्रवार को प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और 21 अन्य लोगों को शराब नीति मामले में बरी कर दिया। केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को कड़ी फटकार लगाते हुए कोर्ट ने कहा कि उस नीति में कोई व्यापक साजिश या आपराधिक इरादा नहीं मिला। इस मामले में बरी किए गए 21 अन्य आरोपियों में तेलंगाना जागृति की अध्यक्ष के. कविता भी शामिल हैं।
सीबीआई को कड़ी फटकार लगाते हुए विशेष न्यायाधीश जितेंद्र सिंह ने आरोपियों के खिलाफ एजेंसी के आरोपपत्र पर संज्ञान लेने से इनकार कर दिया। उन्होंने यह भी कहा कि संघीय एजेंसी का मामला न्यायिक जांच में खरा नहीं उतरता, खासकर तब जब सीबीआई ने मात्र अनुमानों के आधार पर साजिश की कहानी गढ़ने की कोशिश की।
सीबीआई आम आदमी पार्टी (आप) की पूर्ववर्ती सरकार द्वारा अब रद्द की जा चुकी आबकारी नीति के निर्माण और कार्यान्वयन में कथित भ्रष्टाचार की जांच कर रही थी। इस मामले में केजरीवाल छह महीने जेल में रहे, जबकि सिसोदिया करीब दो साल तक सलाखों के पीछे रहे। जांच एजेंसी के एक प्रवक्ता ने कहा कि जांच के कई पहलुओं को या तो नजरअंदाज किया गया है या उन पर विचार नहीं किया गया है।
विशेष न्यायाधीश जितेंद्र सिंह ने जांच में हुई चूक के लिए सीबीआई पर नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि केजरीवाल के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं थे, जबकि सिसोदिया तथा अन्य आरोपियों के खिलाफ प्रथम दृष्टया कोई मामला नहीं बनता था। आबकारी नीति में कोई व्यापक साजिश या आपराधिक इरादा नहीं था।
न्यायाधीश ने कुछ भ्रामक कथनों पर जोर दिया और कड़े शब्दों में कहा कि विस्तृत आरोपपत्र में कई कमियां हैं जिनकी पुष्टि सबूतों या गवाहों से नहीं होती है। न्यायाधीश सिंह ने कहा, “आरोपपत्र में आंतरिक विरोधाभास है, जो साजिश की थ्योरी की जड़ पर प्रहार करता है।” उन्होंने कहा कि किसी भी सबूत के अभाव में केजरीवाल के खिलाफ लगाए गए आरोप टिक नहीं सकते और पूर्व मुख्यमंत्री को बिना किसी ठोस सबूत के फंसाया गया है। न्यायाधीश ने कहा कि यह कानून के शासन के प्रतिकूल था।
सिसोदिया के संबंध में न्यायाधीश ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई सबूत नहीं है जो उनकी संलिप्तता को दर्शाता हो और न ही उनसे कोई बरामदगी की गई है। अदालत ने गवाहों के बयानों के आधार पर अपना मामला बनाने के लिए भी संघीय जांच एजेंसी की आलोचना की। अदालत ने कहा, “अगर इस तरह के आचरण की अनुमति दी जाती है, तो यह संवैधानिक सिद्धांतों का गंभीर उल्लंघन होगा। किसी आरोपी को क्षमादान देकर उसे गवाह बनाना, उसके बयानों का इस्तेमाल जांच/विवरण में मौजूद कमियों को भरने और अन्य लोगों को आरोपी बनाने के लिए करना गलत है।”











