नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की कुछ धाराओं को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर विचार करते समय बहुत सावधानी बरतेगा। न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की बेंच ने स्पष्ट किया कि हजारों वर्षों से चली आ रही हिंदू सामाजिक संरचना को तोड़ने से बचना जरूरी है।
अदालत का नजरिया
कोर्ट ने कहा:
“हमें हिंदू समाज की संरचना को कमतर नहीं दिखाना चाहिए। सामाजिक ढांचा महत्वपूर्ण है, लेकिन महिलाओं को अधिकार देने के साथ संतुलन भी बनाए रखना जरूरी है।”
सुप्रीम कोर्ट ने पक्षकारों को मध्यस्थता केंद्र में भेजा ताकि व्यापक समाधान से पहले आपसी समझौते की संभावना तलाशी जा सके।
याचिकाकर्ताओं की दलील
वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि चुनौती दी गई धाराएं महिलाओं के खिलाफ भेदभावपूर्ण हैं। उन्होंने जोर दिया कि परंपरा के नाम पर महिलाओं को समान संपत्ति अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।
केंद्र सरकार की दलील
अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज ने अधिनियम का बचाव करते हुए कहा कि यह कानून समुचित रूप से तैयार किया गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता सामाजिक ढांचे को नष्ट करने का प्रयास कर रहे हैं।
विचाराधीन धाराएं
मुख्य रूप से धारा 15 और 16 पर सवाल उठाए गए हैं, जो बिना वसीयत मृत्यु वाली हिंदू महिलाओं की संपत्ति के हस्तांतरण को नियंत्रित करती हैं।
- धारा 15 के अनुसार, यदि कोई हिंदू महिला बिना वसीयत मरती है, तो उसकी संपत्ति सबसे पहले पति के उत्तराधिकारियों को मिलती है, उसके माता-पिता को नहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि महिलाओं के अधिकार और सामाजिक संरचना के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। कोर्ट की सुनवाई आगे जारी रहेगी और सभी पक्षों को न्यायसंगत समाधान की संभावना के लिए मध्यस्थता प्रक्रिया से गुज़रना होगा।











