नयी दिल्ली। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने शुक्रवार को कौटिल्य आर्थिक शिखर सम्मेलन 2025 को संबोधित करते हुए कहा कि जब पूरी दुनिया अभूतपूर्व अस्थिरता और अनिश्चितता से गुजर रही है, तब भारत एक ऐसी शक्ति के रूप में सामने आया है जो न केवल स्थिरता प्रदान करता है, बल्कि बाहरी झटकों को झेलने में भी सक्षम है।
विश्व व्यवस्था और असंतुलन की चुनौती
सीतारमण ने अपने संबोधन में कहा कि आज की दुनिया गंभीर असंतुलन का सामना कर रही है। व्यापारिक अवरोध, ऊर्जा संकट और भू-राजनीतिक संघर्षों ने वैश्विक व्यवस्था की नींव को हिला दिया है। उन्होंने कहा कि युद्ध और रणनीतिक प्रतिद्वंद्विताएँ सहयोग और संघर्ष की सीमाओं को नए तरीके से परिभाषित कर रही हैं। जिन गठबंधनों को कभी मज़बूत माना जाता था, वे आज परीक्षा के दौर से गुजर रहे हैं, जबकि नए गठबंधन आकार ले रहे हैं।
अस्थायी नहीं, संरचनात्मक बदलाव
वित्त मंत्री ने कहा कि मौजूदा परिस्थितियाँ केवल अस्थायी व्यवधान नहीं हैं, बल्कि यह पूरी तरह से एक संरचनात्मक बदलाव है। रूस-यूक्रेन युद्ध, बढ़ते व्यापार तनाव, ऊँचे शुल्क, निवेश में गिरावट और अस्थिर ऊर्जा कीमतों ने वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं।
भारत की स्थिति क्यों है अलग?
सीतारमण ने कहा कि भारत की अर्थव्यवस्था ने इन परिस्थितियों में जिस मजबूती का प्रदर्शन किया है, वह किसी संयोग का परिणाम नहीं है। इसके पीछे पिछले एक दशक की मज़बूत नीतियाँ और सुधार हैं। उन्होंने कहा कि भारत का उदय आकस्मिक नहीं बल्कि एक योजनाबद्ध रणनीति का नतीजा है।
सरकार की नीतियाँ और सुधार
वित्त मंत्री ने गिनाया कि सरकार ने पिछले वर्षों में राजकोषीय अनुशासन बनाए रखने, पूंजीगत व्यय की गुणवत्ता सुधारने और मुद्रास्फीति पर नियंत्रण रखने जैसे ठोस कदम उठाए हैं। इन नीतियों ने भारतीय अर्थव्यवस्था की नींव को मज़बूत किया है और विकास को गति दी है।
घरेलू कारकों पर आधारित विकास मॉडल
सीतारमण ने कहा कि भारत की जीडीपी वृद्धि लंबे समय से घरेलू उपभोग और निवेश पर आधारित रही है। यह स्थिर मॉडल सुनिश्चित करता है कि वैश्विक स्तर पर आने वाले झटकों का असर न्यूनतम रहे। उन्होंने दावा किया कि यही कारण है कि भारत निरंतर प्रगति कर रहा है और वैश्विक परिदृश्य में एक जुझारू अर्थव्यवस्था बनकर उभरा है।
नई वैश्विक व्यवस्था और भारत की भूमिका
सीतारमण ने कहा कि दुनिया एक ऐसे दौर में प्रवेश कर चुकी है जहाँ पुरानी व्यवस्थाएँ और ढाँचे अतीत बनते जा रहे हैं। शीत युद्ध के बाद का वैश्वीकरण और बहुपक्षीय सहयोग अब वैसा प्रभावशाली नहीं रहा जैसा पहले था। ऐसे में भारत स्थिरता और संतुलन का नया केंद्र बनकर उभर रहा है।
विकासशील देशों की आवाज़ पर ज़ोर
वित्त मंत्री ने अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से अपील की कि वे अब ऐसे विचारों और नीतियों पर काम करें जो वर्तमान वास्तविकताओं को दर्शाएँ। ‘‘जरूरी है कि विकासशील देशों की आवाज़ वैश्विक नियम-निर्माण में हाशिये पर न रहे। बल्कि उन्हें भविष्य गढ़ने में केंद्रित भूमिका दी जाए।’’
सीतारमण ने अपने संबोधन के अंत में कहा कि भारत का उदय केवल आर्थिक संकेतकों का परिणाम नहीं है, बल्कि यह रणनीतिक दृष्टिकोण, लचीली नीतियों और जनता के विश्वास का संयोजन है। उन्होंने भरोसा जताया कि आने वाले समय में भारत न केवल अपनी आंतरिक मजबूती से आगे बढ़ेगा, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में स्थिरता का स्तंभ बनकर भी खड़ा रहेगा।






