बुलढाणा। भारतीय ज्ञान परंपरा में आयुर्वेद और योगशास्त्र विश्व को स्वस्थ भविष्य देने की क्षमता रखते हैं। इनके प्रसार के साथ-साथ औषधीय वनस्पतियों का संरक्षण भी आवश्यक है और यह केवल शासन का कार्यक्रम न रहकर जनआंदोलन बनना चाहिए, ऐसा प्रतिपादन राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने किया।
केंद्र सरकार के आयुष मंत्रालय तथा अखिल भारतीय आयुर्वेद महासम्मेलन के संयुक्त तत्वावधान में शेगांव स्थित ‘विसावा भक्तनिवास’ परिसर में आयोजित ‘राष्ट्रीय आरोग्य मेले’ का उद्घाटन बुधवार, 25 फरवरी को राष्ट्रपति के हाथों हुआ।
‘आरोग्यं परमं सुखम्’ का संदेश
राष्ट्रपति ने कहा कि योग और आयुर्वेद मन और शरीर के संतुलन के माध्यम से स्वस्थ जीवनशैली का मार्ग दिखाते हैं। ‘आरोग्यं परमं सुखम्’ हमारी संस्कृति का मूल संदेश है। देश को सशक्त बनाने के लिए नागरिकों का स्वस्थ होना आवश्यक है, जिसमें योग, आयुर्वेद, यूनानी जैसी आयुष पद्धतियाँ महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
उन्होंने आयुष मंत्रालय द्वारा अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थानों की स्थापना, आयुष औषधालयों, औषधि परीक्षण प्रयोगशालाओं तथा वैश्विक पारंपरिक चिकित्सा केंद्रों के पुनरुद्धार जैसे कदमों की सराहना की। साथ ही औषधीय पौधों के संरक्षण और विस्तार पर भी बल दिया।
इस अवसर पर राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने कहा कि भारतीय आहार पद्धति में पारंपरिक रूप से औषधीय गुणों वाली वनस्पतियों का उपयोग होता रहा है, किंतु आधुनिक खानपान में बदलाव के कारण बीमारियाँ बढ़ी हैं। इसलिए आयुर्वेद और आयुष पद्धतियों का व्यापक प्रसार आवश्यक है।
केंद्रीय आयुष राज्य मंत्री प्रतापराव जाधव ने कहा कि निरामय जीवनशैली, वेलनेस और समग्र स्वास्थ्य सुरक्षा आयुष की आधारशिला है। विश्व आज वेलनेस की ओर अग्रसर है और भारत की प्राचीन चिकित्सा पद्धति देश को वैश्विक नेतृत्व दिला सकती है। औषधीय पौधों की खेती करने वाले किसानों को भी इसका लाभ मिलेगा।










