अंधविश्वास मानव सभ्यता की उस पुरानी धरोहर का हिस्सा है जो आज भी हमारे जीवन में गहरे तक मौजूद है। समय बदला, सभ्यता बदली, समाज बदला, शिक्षा और विज्ञान का विकास हुआ, किंतु अंधविश्वास अपनी जगह बनाए रहा। वह कभी परंपरा का रूप लेता है, कभी धार्मिक मान्यता का, कभी मनोवैज्ञानिक सहारे का और कभी आधुनिक तकनीक व डिजिटल युग की नई प्रवृत्तियों का। यही कारण है कि यह केवल इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि वर्तमान का भी सच है। काली बिल्ली रास्ता काट जाए तो लोग रुक जाते हैं, नींबू-मिर्च को नज़र उतारने का उपाय मानकर दरवाज़े पर टांगते हैं, मोबाइल नंबर में शुभ अंक खोजते हैं, वास्तुशास्त्र के हिसाब से घर बनवाते हैं, क्रिकेट में लकी ग्लव्स इस्तेमाल करते हैं और चुनाव में नेता शुभ मुहूर्त देखकर प्रचार आरंभ करते हैं। यह विविधता दर्शाती है कि अंधविश्वास समय और परिस्थिति के अनुसार रूप बदलता रहता है, लेकिन समाप्त नहीं होता।
भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में अंधविश्वास की जड़ें बेहद गहरी हैं। यहाँ हर क्षेत्र, हर धर्म, हर समुदाय और हर संस्कृति में किसी न किसी रूप में मान्यताएँ जुड़ी हुई हैं। मध्ययुगीन यूरोप में काली बिल्ली को जादू-टोना और चुड़ैलों से जोड़ा गया, तो भारत में इसे अपशकुन माना गया। यही कारण है कि आज भी यदि कोई काली बिल्ली रास्ता काट दे तो शिक्षित व्यक्ति भी पलभर को ठिठक जाता है। यह केवल विश्वास नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर बैठी अनिश्चितता और भय का परिणाम है।
इसी प्रकार नींबू-मिर्च का प्रयोग बुरी नज़र से बचने के लिए किया जाता है। दुकानदार, वाहन मालिक या घर-परिवार के लोग इसे लटकाकर मानते हैं कि इससे नकारात्मक ऊर्जा दूर रहती है। यह परंपरा अब व्यवसाय का हिस्सा बन चुकी है। बाजार में एनर्जाइज्ड नींबू-मिर्च तक बिकते हैं और ऑनलाइन पोर्टल पर इन्हें ऊँचे दामों पर बेचा जाता है। यह उदाहरण बताता है कि किस तरह अंधविश्वास आधुनिक उपभोक्तावाद में भी जगह बना लेता है।
संख्या तेरह से जुड़ा डर भी वैश्विक स्तर पर देखने को मिलता है। पश्चिम में इसे फोबिया तक कहा जाता है। बड़े-बड़े होटल और अपार्टमेंट में तेरहवीं मंज़िल का नाम ही नहीं होता। लोग मानते हैं कि तेरह अशुभ है। इसी तरह भारत में भी 13 पर खत्म होने वाले वाहन नंबर से लोग बचते हैं। इसके उलट 1111 या 9999 जैसे नंबर लाखों रुपये में बिकते हैं। टेलीकॉम कंपनियाँ विशेष अंक वाले मोबाइल नंबर नीलाम करती हैं। यह सब अंकशास्त्र और विश्वास का कारोबार है जो आधुनिक उपभोक्ता मानसिकता को गहरे तक प्रभावित करता है।
वास्तुशास्त्र भी आधुनिक समाज पर छाया हुआ है। घर बनाने से लेकर ऑफिस, दुकान या यहाँ तक कि पानी की टंकी की दिशा तक वास्तु के आधार पर तय की जाती है। रियल एस्टेट कंपनियाँ अपने प्रोजेक्ट को वास्तु कंप्लायंट बताकर ग्राहकों को आकर्षित करती हैं। इंजीनियरिंग और आर्किटेक्चर के वैज्ञानिक नियमों के बावजूद लोग वास्तु पर अधिक भरोसा करते हैं। कहीं रसोई दक्षिण-पूर्व में होगी, कहीं पूजा-घर उत्तर-पूर्व में ये सब परंपरा और विश्वास के नाम पर आज भी ज़िंदा हैं।
लेकिन अंधविश्वास सिर्फ परंपरागत रूप में ही नहीं, बल्कि आधुनिक युग में भी नए-नए रूपों में दिखाई देता है। मोबाइल फोन और सोशल मीडिया ने इसमें नई जान फूँक दी है। आज लोग मानते हैं कि यदि उनका मोबाइल नंबर किसी विशेष अंक पर समाप्त होता है तो वह शुभ है। किसी का मानना है कि 7 या 9 वाले नंबर अच्छे भाग्य लाते हैं। इसी तरह फेसबुक और व्हाट्सएप पर यह संदेश अक्सर फैलते हैं कि इस मैसेज को दस लोगों को भेजो वरना दुर्भाग्य आएगा। यह पुराने जमाने की चिट्ठी आगे बढ़ाओ परंपरा का डिजिटल संस्करण है। इंटरनेट और डिजिटल मीडिया ने अंधविश्वासों को बिजली की गति से फैलाने का काम किया है।
विद्यार्थियों और नौकरी के उम्मीदवारों के बीच भी अंधविश्वास देखने को मिलता है। कोई लकी पेन पर विश्वास करता है, कोई लकी शर्ट पर। परीक्षा में अच्छे अंक लाने या इंटरव्यू में सफल होने के लिए वे इन्हें इस्तेमाल करते हैं। यह दरअसल मानसिक दबाव से उपजा विश्वास है, लेकिन धीरे-धीरे यह आदत बन जाता है और अंधविश्वास का रूप ले लेता है।
खेलों में भी अंधविश्वास का असर साफ दिखाई देता है। क्रिकेट खिलाड़ी लकी बैट या लकी ग्लव्स का इस्तेमाल करते हैं। कोई खिलाड़ी हर मैच से पहले एक ही जर्सी पहनता है, तो कोई मैदान में उतरने से पहले विशेष प्रार्थना करता है। टेनिस खिलाड़ी राफेल नडाल पानी की बोतलों को एक खास क्रम में सजाते हैं। ये सब मानसिक आत्मविश्वास बढ़ाने का तरीका हो सकता है, लेकिन वस्तुतः यह भी अंधविश्वास का ही रूप है।
राजनीति और चुनावी दुनिया भी इससे अछूती नहीं है। कई नेता हर बार प्रचार की शुरुआत किसी विशेष मंदिर से करते हैं। कुछ हमेशा एक ही रंग के कपड़े पहनते हैं। चुनावी तारीख़ों को देखकर शुभ मुहूर्त निकाला जाता है। यहाँ अंधविश्वास केवल व्यक्तिगत विश्वास नहीं, बल्कि जनता से भावनात्मक जुड़ाव का साधन भी बन जाता है।
कोविड-19 महामारी ने अंधविश्वासों की बाढ़ ला दी थी। जब पूरा समाज अनिश्चितता और भय में जी रहा था, तब तरह-तरह के उपाय सामने आए। कहीं कहा गया कि गोमूत्र पीने से कोरोना दूर होगा, कहीं नींबू-अदरक को रामबाण बताया गया। सोशल मीडिया पर यह तक फैलाया गया कि ताली और थाली बजाने से वायरस भाग जाएगा। कुछ जगह कोरोना माता की पूजा तक की गई। यह घटनाएँ बताती हैं कि संकट के समय अंधविश्वास और भी तेज़ी से फैलते हैं, क्योंकि लोग भय और असुरक्षा में वैज्ञानिक तर्क छोड़कर आसान उपायों की ओर भागते हैं।
आज के डिजिटल और तकनीकी युग में अंधविश्वास का एक नया चेहरा टेक्नो-सुपरस्टिशन है। कुछ यूट्यूबर्स मानते हैं कि यदि उनका वीडियो किसी खास संख्या पर लाइक पहुँचे तो चैनल तेजी से बढ़ेगा। छात्र सोचते हैं कि एआई से पढ़ाई करेंगे तो पास होना तय है। क्रिप्टो निवेशक मानते हैं कि किसी खास तारीख़ पर निवेश करने से लाभ होगा। यह सब आधुनिक अंधविश्वास के उदाहरण हैं।
इसी कड़ी में स्वास्थ्य और फिटनेस जगत में भी नए अंधविश्वास पनपे हैं। सोशल मीडिया पर अक्सर यह ट्रेंड होता है कि यदि कोई विशेष डिटॉक्स ड्रिंक या चमत्कारी सप्लीमेंट लिया जाए तो हर बीमारी खत्म हो जाएगी। लोग बिना वैज्ञानिक प्रमाण के इन्हें अपनाते हैं। इसी तरह जिम संस्कृति में लकी प्रोटीन पाउडर या विशेष रंग की जर्सी पहनने का चलन भी अंधविश्वास की ही आधुनिक परत है।
ऑनलाइन गेमिंग और ई-स्पोर्ट्स ने भी अंधविश्वास को नई जमीन दी है। खिलाड़ी मानते हैं कि अगर वे गेम शुरू करने से पहले कोई खास गाना सुन लें तो जीत सुनिश्चित होगी, या अगर उन्होंने एक बार किसी खास समय पर लॉग-इन करके जीत हासिल की थी तो वही समय हर बार सफलता देगा।
शेयर बाजार और क्रिप्टोकरेंसी में निवेशक भी तरह-तरह के अंधविश्वास पालते हैं। कोई मानता है कि मंगलवार को शेयर खरीदना शुभ है, तो कोई मानता है कि अमावस्या पर निवेश करने से लाभ होगा। क्रिप्टो ट्रेडिंग में तो कई लोग चाँद और ग्रहों की चाल देखकर निवेश का समय तय करते हैं।
इन्फ्लुएंसर कल्चर ने भी अंधविश्वासों को नया मंच दिया है। सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर किसी प्रोडक्ट या टोटके को लाइफ-चेंजिंग बताकर बेचते हैं और लाखों लोग उस पर विश्वास कर लेते हैं। चाहे वह क्रिस्टल हीलिंग हो, एनर्जी स्टोन हो या फिर कोई मिस्टिक रिंग लोग इन्हें भाग्य बदलने वाला मानकर खरीदते हैं।
मनोविज्ञान के अनुसार अंधविश्वास का जन्म मानव की अनिश्चितता और भय से होता है। जब किसी के पास किसी घटना का वैज्ञानिक या तर्कसंगत उत्तर नहीं होता, तो वह कल्पना और विश्वास का सहारा लेता है। एक बार जब कोई घटना विश्वास से जुड़ जाती है और दोहराई जाती है, तो धीरे-धीरे यह अंधविश्वास का रूप ले लेती है। यह मनुष्य को मानसिक सहारा देता है, आत्मविश्वास बढ़ाता है, और कभी-कभी सामाजिक जुड़ाव का माध्यम भी बनता है।
लेकिन समस्या तब होती है जब अंधविश्वास समाज की प्रगति में बाधा डालने लगता है। शिक्षा और स्वास्थ्य में इसका असर बेहद खतरनाक हो सकता है। उदाहरण के लिए, यदि कोई रोगी आधुनिक चिकित्सा के बजाय झाड़-फूंक और तंत्र-मंत्र में उलझा रहता है, तो उसकी जान तक जा सकती है। इसी तरह यदि विद्यार्थी मेहनत और अध्ययन छोड़कर लकी पेन या अंकशास्त्र पर विश्वास कर ले तो उसका भविष्य प्रभावित होता है। कोविड महामारी में यह सबसे बड़ा खतरा साबित हुआ जब लोग वैज्ञानिक उपायों की बजाय झूठे दावों पर भरोसा करने लगे।
विज्ञान और तर्कशीलता अंधविश्वास का सबसे बड़ा प्रतिकार हैं। शिक्षा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तार्किक सोच का प्रसार समाज को अंधविश्वास के नकारात्मक प्रभावों से बचा सकता है। परंपरा और संस्कृति का सम्मान करना आवश्यक है, लेकिन यदि वे अंधविश्वास का रूप लेकर जीवन, स्वास्थ्य और प्रगति को प्रभावित करने लगें, तो उन्हें चुनौती देना भी जरूरी है।
अंधविश्वास पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकता, क्योंकि यह मानव की मानसिक संरचना से जुड़ा है। जब तक भविष्य अनिश्चित है, भय और असुरक्षा है, तब तक अंधविश्वास किसी न किसी रूप में मौजूद रहेगा। परंतु इसका दायरा और प्रभाव शिक्षा और वैज्ञानिक चेतना के माध्यम से सीमित किया जा सकता है।
आज जब हम चाँद और मंगल तक पहुँच चुके हैं, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और जेनेटिक इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों में नई क्रांतियाँ हो रही हैं, तब भी काली बिल्ली, नींबू-मिर्च, वास्तु, अंकशास्त्र, लकी नंबर, मैसेज फॉरवर्ड, हेल्थ सप्लीमेंट्स, क्रिप्टो निवेश, ई-स्पोर्ट्स रिचुअल और इन्फ्लुएंसर ट्रेंड जैसे अंधविश्वास हमारी मानसिकता में जड़ें जमाए हुए हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि अंधविश्वास सिर्फ अतीत का हिस्सा नहीं, बल्कि वर्तमान का भी यथार्थ है। यह हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम अंधविश्वास को समझें, उसकी जड़ों को पहचानें, तर्क और विज्ञान से परखें और जब वह समाज के लिए हानिकारक हो तो उसका विरोध करें।









