भारत में अंधविश्वास और महिलाओं के स्वास्थ्य व पोषण के बीच का संबंध एक गहरा और बहुआयामी विषय है। आधुनिक युग में विज्ञान और तकनीक ने जितनी प्रगति की है, उतना ही यह उम्मीद की जाती है कि लोग तर्क और प्रमाण पर आधारित जीवनशैली अपनाएँगे। परंतु वास्तविकता यह है कि सामाजिक और सांस्कृतिक ढाँचे में गहराई से पैठे अंधविश्वास आज भी महिलाओं के जीवन को प्रभावित कर रहे हैं। महिलाएँ, जो परिवार और समाज की पोषण व्यवस्था की धुरी मानी जाती हैं, अक्सर इन्हीं मान्यताओं के कारण स्वास्थ्य संबंधी कई संकटों का सामना करती हैं। इन संकटों को केवल सामाजिक दृष्टिकोण से नहीं बल्कि सांख्यिकीय तथ्यों के आधार पर समझना ज़रूरी है, ताकि समाधान की दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकें।
भारत की राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) के आँकड़े इस विडंबना को स्पष्ट करते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, 15 से 49 वर्ष की आयु वर्ग की लगभग 57% महिलाएँ एनीमिया से पीड़ित हैं। एनएफएचएस -4 के दौरान यह आँकड़ा लगभग 53% था, यानी सुधार की बजाय स्थिति और बिगड़ी है। एनीमिया महिलाओं की कार्यक्षमता, गर्भधारण की क्षमता और माँ व बच्चे दोनों के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डालता है। इसका एक कारण यह है कि महिलाओं को कई बार आयरन युक्त खाद्य पदार्थ खाने से रोका जाता है, जैसे मासिक धर्म या गर्भावस्था के दौरान उन्हें मांस, अंडे या कुछ विशेष दालें खाने से मना करना। यह अंधविश्वासी मान्यता है कि इन खाद्य पदार्थों से गर्भस्थ शिशु पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
गर्भवती महिलाओं में एनीमिया की दर एनएफएचएस-5 के अनुसार लगभग 52% है। यानी आधी से अधिक गर्भवती महिलाएँ इस समस्या से जूझ रही हैं। इसका सीधा असर शिशु के जन्म के समय वजन, उसकी प्रतिरोधक क्षमता और मृत्यु दर पर पड़ता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) ने भी भारत में मातृ एवं शिशु मृत्यु दर को घटाने के लिए एनीमिया को प्रमुख चुनौती माना है। डब्लूएचओ की रिपोर्ट बताती है कि यदि गर्भवती महिलाओं में एनीमिया नियंत्रित न किया जाए तो यह न केवल प्रसव को जटिल बनाता है बल्कि शिशु की समयपूर्व मृत्यु की संभावना भी बढ़ा देता है।
भारत सरकार ने इस दिशा में कई कार्यक्रम शुरू किए हैं, जिनमें पोषण अभियान और एनीमिया मुक्त भारत प्रमुख हैं। पोषण अभियान की शुरुआत 2018 में की गई थी, जिसका उद्देश्य गर्भवती और स्तनपान कराने वाली माताओं तथा दो वर्ष से कम आयु के बच्चों पर विशेष ध्यान देना था। इस कार्यक्रम ने कई स्तरों पर प्रगति भी की है। उदाहरण के लिए, विश्व बैंक की रिपोर्ट में यह पाया गया कि लगभग 80% गर्भवती महिलाओं को पोषण संबंधी सूचना मिली, और आधे से अधिक महिलाओं ने पोषण संबंधी व्यवहार अपनाने की कोशिश की। परंतु समस्या यह है कि इन प्रयासों के बावजूद न्यूनतम स्वीकार्य आहार को अपनाने वाली महिलाओं और बच्चों का प्रतिशत अभी भी बहुत कम है। सर्वेक्षणों के अनुसार, बच्चों में यह दर मात्र 18% के आसपास है। यानी अधिकांश बच्चे अभी भी आवश्यक पोषण से वंचित हैं।
यहाँ यह सवाल उठता है कि जब सरकारें इतने व्यापक अभियान चला रही हैं तो फिर अपेक्षित परिणाम क्यों नहीं मिल रहे? इसका उत्तर अंधविश्वास और सामाजिक मान्यताओं में छिपा है। ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी यह धारणा है कि गर्भवती महिला को ज़्यादा भोजन नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे बच्चा बहुत बड़ा हो जाएगा और प्रसव कठिन होगा। इसी तरह कई समुदायों में यह मान्यता है कि गर्भवती महिला को दूध और दही जैसी चीज़ों का सेवन नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे प्रसव के बाद बच्चा बीमार हो सकता है। इन मान्यताओं का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है, परंतु महिलाएँ इन्हें मानने के लिए बाध्य होती हैं, क्योंकि सामाजिक दबाव और परिवार का वातावरण उनके निर्णय पर हावी रहता है।
अंधविश्वास केवल भोजन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह महिलाओं की स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच पर भी असर डालता है। उदाहरण के लिए, कई जगह यह माना जाता है कि प्रसव केवल घर पर होना चाहिए और अस्पताल जाने से माँ और बच्चे पर बुरा असर पड़ेगा। नतीजतन, कई महिलाएँ प्रसव के समय उचित स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित रह जाती हैं। इसी कारण मातृ मृत्यु दर और नवजात मृत्यु दर को कम करने में भारत को लगातार चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
किशोरियों की स्थिति भी चिंताजनक है। एनएफएचएस-5 के अनुसार, लगभग 59% किशोर लड़कियाँ एनीमिया से ग्रस्त हैं। यह आयु वर्ग वह है जहाँ लड़कियों को अधिक पोषण की आवश्यकता होती है, क्योंकि वे शारीरिक और मानसिक विकास के दौर से गुजर रही होती हैं। परंतु अक्सर परिवारों में यह धारणा होती है कि लड़कियों को लड़कों की तुलना में कम खाना चाहिए या उन्हें मांसाहार, दूध, फल आदि नहीं दिए जाते। कई परिवारों में तो यह भी माना जाता है कि किशोरियों को अधिक पोषण देने से उनका शरीर जल्दी विकसित हो जाएगा और इससे सामाजिक समस्याएँ खड़ी होंगी। इस प्रकार की सोच न केवल उनके स्वास्थ्य को प्रभावित करती है बल्कि उनके भविष्य को भी खतरे में डाल देती है।
सरकारी आँकड़े यह भी दिखाते हैं कि जिन इलाकों में शिक्षा का स्तर कम है, गरीबी अधिक है और सामाजिक असमानताएँ गहरी हैं, वहाँ महिलाओं में कुपोषण और एनीमिया की दर बहुत अधिक है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की महिलाओं में यह समस्या सामान्य से कहीं ज्यादा है। एनएफएचएस-5 में स्पष्ट रूप से यह दर्ज है कि सामाजिक-आर्थिक स्थिति, शिक्षा और क्षेत्रीय भिन्नताएँ महिलाओं के स्वास्थ्य पर निर्णायक असर डालती हैं।
इस स्थिति को बदलने के लिए केवल सरकारी योजनाएँ पर्याप्त नहीं हैं। जब तक सामाजिक स्तर पर अंधविश्वास और मान्यताओं को चुनौती नहीं दी जाएगी, तब तक कोई भी पोषण अभियान अपनी पूरी सफलता नहीं पा सकेगा। इसके लिए सामुदायिक जागरूकता, शिक्षा और महिलाओं को सशक्त बनाने की आवश्यकता है। आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और आशा कार्यकर्ता इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। महामारी के दौरान यह देखा गया कि जब आंगनवाड़ी कार्यकर्ता घर-घर जाकर पोषण संबंधी जानकारी देने लगीं तो महिलाओं ने कई नई आदतें अपनाईं। इसका असर सकारात्मक रहा, परंतु स्थायी परिवर्तन के लिए इस प्रयास को निरंतर बनाए रखना होगा।
वर्तमान समय में यह भी देखा गया है कि सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों का उपयोग करके अंधविश्वास को चुनौती दी जा सकती है। जब महिलाएँ एक-दूसरे के अनुभव साझा करती हैं, वैज्ञानिक जानकारी प्राप्त करती हैं और स्वास्थ्य विशेषज्ञों से जुड़ती हैं तो वे पारंपरिक मान्यताओं से बाहर निकलने की कोशिश करती हैं। सरकार और गैर-सरकारी संगठनों को इस दिशा में और अधिक प्रयास करना चाहिए।
डब्लूएचओ ने अपनी रिपोर्टों में यह सुझाव दिया है कि यदि भारत 2030 तक मातृ और शिशु मृत्यु दर को वैश्विक लक्ष्यों के अनुरूप लाना चाहता है, तो उसे महिलाओं में एनीमिया और कुपोषण की समस्या को गंभीरता से लेना होगा। इसके लिए न केवल स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार करना आवश्यक है बल्कि उन सामाजिक और सांस्कृतिक जड़ों पर भी प्रहार करना होगा जहाँ से अंधविश्वास पनपता है।
संक्षेप में कहा जाए तो अंधविश्वास और सामाजिक मान्यताएँ महिलाओं के स्वास्थ्य और पोषण की सबसे बड़ी बाधाएँ हैं। सरकारें योजनाएँ बनाती हैं, आँकड़े जुटाती हैं और नए कार्यक्रम शुरू करती हैं, परंतु जब तक महिलाओं को यह समझ नहीं आएगा कि उनके स्वास्थ्य की देखभाल सबसे पहले उनकी अपनी ज़िम्मेदारी है, तब तक यह समस्या दूर नहीं होगी। इसके लिए शिक्षा सबसे बड़ा हथियार है। जब महिलाएँ पढ़ी-लिखी होंगी, तो वे अपने लिए सही-गलत का निर्णय स्वयं कर पाएँगी। तभी अंधविश्वास की बेड़ियाँ टूटेंगी और महिलाएँ स्वस्थ व सशक्त बनेंगी।











