प्रारंभिक स्मार्टफोन उपयोग किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डाल रहा है। हाल ही में सैपियन लैब्स द्वारा किए गए अध्ययन “द यंग माइंड: राइजिंग अग्रेशन एंड एंगर” ने 13 से 17 वर्ष के किशोरों में स्मार्टफोन के अत्यधिक उपयोग से उत्पन्न मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं की ओर ध्यान आकर्षित किया है। अध्यान में पाया गया कि कम उम्र में स्मार्टफोन इस्तेमाल करने वाले किशोरों में आक्रामकता, क्रोध, चिड़चिड़ापन, मतिभ्रम और वास्तविकता से अलगाव जैसी मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं अधिक देखी गई हैं। विशेष रूप से 13 वर्ष की आयु के किशोरों में ये समस्याएं गंभीर रूप से पाई गईं, जबकि उम्र बढ़ने के साथ ये लक्षण कुछ हद तक कम होते दिखाई दिए।
अध्यान में यह भी पाया गया कि मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का यह बढ़ता हुआ रुझान स्मार्टफोन के प्रारंभिक उपयोग से सीधे संबंधित है। अमेरिका और भारत में किए गए इस अध्यान में 10,475 इंटरनेट-सक्षम किशोरों के डेटा का विश्लेषण किया गया, जिसमें किशोरों की मानसिक स्थिति, जीवनशैली, नींद के पैटर्न और सामाजिक व्यवहार का मूल्यांकन किया गया। शोध में यह निष्कर्ष निकला कि प्रारंभिक डिजिटल पहुंच किशोरों को ऐसे जोखिमों में डालती है जो उनके भावनात्मक और सामाजिक विकास को प्रभावित कर सकते हैं।
विशेष रूप से, अध्यान में पाया गया कि किशोरों में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं में लिंग और सांस्कृतिक अंतर स्पष्ट रूप से देखे गए। अमेरिका में मानसिक स्वास्थ्य की गिरावट दोनों लिंगों में समान रूप से पाई गई, जबकि भारत में मुख्य रूप से किशोरियों में गिरावट दर्ज की गई। किशोरियों में आक्रामकता और क्रोध की दर अधिक पाई गई, जिसमें 65% किशोरियों ने मानसिक असुविधा की रिपोर्ट की। भारत में पुरुषों में कुछ मामलों में मानसिक स्वास्थ्य में सुधार देखा गया, जबकि अमेरिका में दोनों लिंगों में समान गिरावट दर्ज की गई।
शोध में यह भी पाया गया कि प्रारंभिक डिजिटल पहुंच किशोरों को अनुचित सामग्री, नींद की कमी और व्यक्तिगत बातचीत की कमी के जोखिम में डालती है। अत्यधिक ऑनलाइन समय किशोरों को वास्तविक दुनिया की चुनौतियों से दूर रखता है, जिससे वे अपनी भावनाओं को नियंत्रित करना और तनावपूर्ण परिस्थितियों में सामंजस्य स्थापित करना कठिन पाते हैं। किशोरों में मूड स्विंग्स, चिंता, अवसाद और कभी-कभी मतिभ्रम जैसी मानसिक लक्षणों की संख्या में वृद्धि हुई है। सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेमिंग के अत्यधिक उपयोग से किशोर वास्तविक जीवन की चुनौतियों का सामना करने के बजाय वर्चुअल दुनिया में खो जाते हैं।
डिजिटल तकनीक के सकारात्मक पहलू भी हैं। बच्चों के लिए शिक्षा, सीखने की सामग्री, और सामाजिक संपर्क अब डिजिटल माध्यम से सुलभ हैं। भारत में सरकार और शैक्षिक संस्थानों द्वारा कई पहल की गई हैं, जैसे कि इ-पीजी पाठशाला, प्रज्ञाता दिशानिर्देश, पीएम इ विद्या, दीक्षा प्लेटफॉर्म, स्वयं पोर्टल, एनईएटी 3.0 और अन्य। इन पहल के माध्यम से किशोरों को सुरक्षित और नियंत्रित डिजिटल शिक्षा अनुभव प्राप्त होता है। डिजिटल टूल्स जैसे कि इंटरैक्टिव गेम्स, सिमुलेशन और ऑनलाइन कोर्स बच्चों के सीखने की क्षमता को बढ़ाते हैं और उन्हें विभिन्न विषयों में कौशल विकसित करने में मदद करते हैं। मशीन लर्निंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित प्लेटफॉर्म बच्चों की व्यक्तिगत सीखने की शैली के अनुसार सामग्री प्रदान करते हैं।
साथ ही, डिजिटल तकनीक बच्चों में समस्या समाधान, कोडिंग, डिजिटल साक्षरता और संज्ञानात्मक क्षमताओं को विकसित करने में मदद करती है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म बच्चों और किशोरों को परिवार और मित्रों से जुड़े रहने में मदद करते हैं, जिससे अकेलेपन की भावना कम होती है और सामाजिक संबंध मजबूत होते हैं। डिजिटल माध्यम से मानसिक स्वास्थ्य संसाधनों तक आसान पहुँच मिलती है, जैसे कि राष्ट्रीय टेली मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम, किरण हेल्पलाइन और मानस मोबाइल ऐप, जो बच्चों और किशोरों को मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से निपटने में मदद करते हैं।
हालांकि, अत्यधिक डिजिटल उपयोग किशोरों में कई नकारात्मक प्रभाव भी लाता है। स्क्रीन की लत, ऑनलाइन गेमिंग, और सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग बच्चों में शारीरिक निष्क्रियता, नींद की कमी, और मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को बढ़ाता है। यह तनाव, चिंता, अवसाद, और आत्महत्या के विचारों को जन्म दे सकता है। डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से बच्चों की व्यक्तिगत जानकारी चोरी, धोखाधड़ी, और हानिकारक सामग्री के जोखिम में रहती है। साइबरबुलिंग और ऑनलाइन शोषण बच्चों के आत्म-सम्मान और मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डालते हैं।
अत्यधिक डिजिटल उपयोग किशोरों को ऑनलाइन हिंसा, चरमपंथ और नकारात्मक सामाजिक प्रभाव के जोखिम में डालता है। हिंसक ऑनलाइन गेम्स और ग्राफिक सामग्री किशोरों में आक्रामकता को सामान्य बनाने का खतरा उत्पन्न करती है। युवा इंटरनेट उपयोगकर्ता चरमपंथी समूहों द्वारा प्रभावित होने और भड़काने के लिए लक्षित किए जा सकते हैं। सोशल मीडिया पर आदर्शीकृत जीवन और एफओएमओ (फियर ऑफ मिसिंग आउट) की भावना किशोरों में चिंता, तनाव और असंतोष को बढ़ाती है।
भारत सरकार और संबंधित संस्थानों ने बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कई महत्वपूर्ण पहल की हैं। पोक्सो अधिनियम 2012 बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा प्रदान करता है। चाइल्ड लाइन 1098 राष्ट्रीय 24 घंटे आपातकालीन सेवा है जो बच्चों को तत्काल सहायता प्रदान करती है। साइबर सुरक्षा शिक्षा अब स्कूल पाठ्यक्रम का हिस्सा बन चुकी है और सीबीएसई व शिक्षा मंत्रालय ने इसके लिए विशेष पाठ्यक्रम तैयार किए हैं। आईटी अधिनियम, 2000 की धारा 67B के तहत सीएसएएम (बाल यौन शोषण सामग्री) के लिए सख्त दंड निर्धारित है। सीसीपीडब्लूसी (महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध साइबर अपराध रोकथाम) परियोजना साइबर अपराध से निपटने और जागरूकता बढ़ाने के लिए कार्य करती है।
स्मार्टफोन स्वामित्व में देरी, सख्त नियमन, अभिभावकों की निगरानी और डिजिटल साक्षरता बच्चों को सुरक्षित डिजिटल वातावरण प्रदान करने में मदद कर सकते हैं। विशेषज्ञों का सुझाव है कि किशोरों को कम से कम 8वीं कक्षा तक स्मार्टफोन का उपयोग रोकने से आक्रामकता, चिंता, और आत्महत्या की दर में कमी लाई जा सकती है। डिजिटल शिक्षा और मानसिक स्वास्थ्य समर्थन के माध्यम से बच्चों को ऑनलाइन खतरों और साइबरबुलिंग से सुरक्षित रखा जा सकता है।
वर्तमान समय में, भारत में लगभग 82% किशोर स्मार्टफोन का उपयोग करते हैं और 76% सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सक्रिय हैं। इस उच्च दर के कारण बच्चों की मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ रही हैं। डब्लूएचओ के अनुसार, विश्व स्तर पर 1 में से 7 किशोर किसी न किसी मानसिक विकार से प्रभावित हैं, जिसमें अवसाद, चिंता और व्यवहारिक विकार प्रमुख हैं। किशोरों में ऑनलाइन सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता बढ़ाना आवश्यक है।
किशोरों में प्रारंभिक डिजिटल उपयोग से उत्पन्न मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के कई मामलों की रिपोर्ट उपलब्ध हैं। उदाहरण के लिए, दिल्ली की एक स्कूल ने बताया कि 13-15 वर्ष के छात्रों में सोशल मीडिया और गेमिंग के कारण तनाव और आक्रामक व्यवहार में वृद्धि हुई है। कुछ छात्रों ने स्कूल छोड़ने या आत्महत्या के विचार की रिपोर्ट भी दी। इसी तरह, मुंबई के एक अध्ययन में पाया गया कि किशोरियों में सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग चिंता, नींद की कमी और आक्रामकता बढ़ाता है। इन केस स्टडी से यह स्पष्ट होता है कि डिजिटल उपयोग पर नियंत्रण और माता-पिता की निगरानी आवश्यक है।
प्रारंभिक स्मार्टफोन उपयोग किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक विकास पर गंभीर प्रभाव डाल रहा है। डिजिटल शिक्षा और सुरक्षित ऑनलाइन अनुभव सकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं, लेकिन अत्यधिक डिजिटल उपयोग से शारीरिक निष्क्रियता, मानसिक तनाव, आक्रामकता और साइबर खतरों का जोखिम बढ़ जाता है। भारत में बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य को सुनिश्चित करने के लिए नियमन, डिजिटल शिक्षा, माता-पिता की भागीदारी और जागरूकता महत्वपूर्ण हैं।
सही डिजिटल आदतें अपनाना, जैसे कि स्क्रीन टाइम को नियंत्रित करना, सोशल मीडिया और गेमिंग का संतुलित उपयोग करना और ऑनलाइन गतिविधियों के लिए समय निर्धारित करना, किशोरों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए बेहद आवश्यक है। इसके साथ ही साइबर सुरक्षा शिक्षा प्राप्त करना उन्हें ऑनलाइन जोखिमों जैसे साइबरबुलिंग, पहचान चोरी और हानिकारक सामग्री से सुरक्षित रखता है। मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े संसाधनों तक आसान पहुँच सुनिश्चित करना, जैसे कि हेल्पलाइन, मोबाइल ऐप, और स्कूल-कॉलेज स्तर पर काउंसलिंग सुविधाएं, किशोरों को तनाव, चिंता और अवसाद जैसी समस्याओं से निपटने में सक्षम बनाता है। इस प्रकार, डिजिटल जीवन में संतुलन बनाए रखना और सुरक्षा उपाय अपनाना किशोरों के सुरक्षित, स्वस्थ और उत्पादक विकास के लिए महत्वपूर्ण कारक हैं।









