भारत की आज़ादी को पचहत्तर वर्ष से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन आज भी देश के सबसे प्राचीन और विशिष्ट समुदायों में से एक आदिवासी समाज मुख्यधारा से उपेक्षित बना हुआ है। संविधान निर्माताओं ने इस समुदाय को बराबरी दिलाने के लिए कई विशेष प्रावधान किए। अनुच्छेद 350ए यह सुनिश्चित करता है कि बच्चों को 14 वर्ष की आयु तक मातृभाषा में शिक्षा मिले। अनुसूचित जनजातियों को आरक्षण के माध्यम से राजनीतिक प्रतिनिधित्व दिया गया ताकि वे निर्णय लेने की प्रक्रिया में भाग ले सकें। फिर भी वास्तविकता यह है कि आदिवासी समाज की स्थिति आज भी शिक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका के मामले में बेहद पिछड़ी हुई है। लगभग 11 करोड़ आदिवासी, जो भारत की जनसंख्या का लगभग 8.6 प्रतिशत हिस्सा हैं, आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। राष्ट्रपति पद पर द्रौपदी मुर्मू का पहुँचना निश्चित रूप से एक ऐतिहासिक उपलब्धि है और इसने आदिवासी समाज को आत्मसम्मान का नया प्रतीक दिया है, लेकिन इस प्रतीकात्मक उपलब्धि के साथ ज़मीनी हकीकत का अंतर समझना भी ज़रूरी है।
भारत के आदिवासी लगभग 809 प्रखंडों में फैले हुए हैं जिन्हें अनुसूचित क्षेत्र कहा जाता है। लेकिन इनमें से आधे से अधिक आदिवासी इन अनुसूचित क्षेत्रों से बाहर रहते हैं, जिससे उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता। यह स्थिति बेहद विडंबनापूर्ण है क्योंकि जिन नीतियों और कार्यक्रमों को विशेष रूप से उनके लिए बनाया गया था, उनका असर उन्हीं तक पहुँचने से पहले ही रुक जाता है। आँकड़े बताते हैं कि शिक्षा के क्षेत्र में आदिवासी समाज सबसे पिछड़े वर्गों में आता है। शिक्षा मंत्रालय द्वारा 2024 में जारी आंकड़ों के अनुसार उच्च शिक्षा में आदिवासी छात्रों का सकल नामांकन अनुपात केवल 18.9 प्रतिशत है, जबकि राष्ट्रीय औसत 28 प्रतिशत से अधिक है। 24 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में 5,876 शिक्षकों में से केवल 203 शिक्षक अनुसूचित जनजाति वर्ग से आते हैं और 790 प्रोफेसरों में से केवल पाँच ही आदिवासी हैं। इस असमानता की जड़ उच्च शिक्षा में भारी ड्रॉपआउट दर है, जो लगभग 80 प्रतिशत से अधिक दर्ज की गई है। 2024 की नीट परीक्षा में आदिवासी छात्रों का प्रदर्शन बेहद सीमित रहा, जो यह दिखाता है कि भाषा की बाधा, डिजिटल डिवाइड और आर्थिक कठिनाइयाँ अभी भी उनके लिए उच्च शिक्षा को लगभग असंभव बना रही हैं।
स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी स्थिति बेहद चिंताजनक है। 2024 में जारी ट्राइबल हेल्थ रिपोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारत के आदिवासी समुदायों में शिशु मृत्यु दर अब भी राष्ट्रीय औसत से लगभग 50 प्रतिशत अधिक है। रिपोर्ट बताती है कि आदिवासी समाज में मलेरिया और टीबी की दर राष्ट्रीय औसत से तीन से चार गुना अधिक है। रिपोर्टें भी यही बताती हैं कि देश में होने वाली मलेरिया मौतों का लगभग आधा हिस्सा आदिवासी क्षेत्रों से आता है। कोविड-19 महामारी के दौरान छत्तीसगढ़ और झारखंड के आदिवासी गाँवों में ऑक्सीजन और अस्पतालों की कमी से भारी संख्या में मौतें हुईं, जिसने यह साफ़ कर दिया कि आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं तक उनकी पहुँच अब भी बहुत सीमित है। इसके अलावा, कुपोषण अब भी सबसे बड़ी समस्या है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) के अनुसार आदिवासी बच्चों में 45 प्रतिशत तक स्टंटिंग दर्ज की गई है।
आजीविका के संदर्भ में आदिवासी समाज की निर्भरता अब भी जंगल पर सबसे अधिक है। जंगल से भोजन, ईंधन, औषधि और आवासीय सामग्री सब कुछ प्राप्त होता है। लेकिन विडंबना यह है कि जिन जंगलों पर उनका जीवन टिका हुआ है, वही खनन और औद्योगिक परियोजनाओं की वजह से उनसे छीने जा रहे हैं। छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य में कोयला खनन के ख़िलाफ़ पिछले कुछ वर्षों से लगातार आंदोलन हो रहा है। हजारों आदिवासी महिलाएँ और पुरुष सड़कों पर उतरकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर चुके हैं। उनका कहना है कि खनन न केवल जंगल और ज़मीन छीन रहा है बल्कि उनकी पूरी सांस्कृतिक और सामाजिक व्यवस्था को खत्म कर देगा। इसी तरह झारखंड और ओडिशा में भी कई जगह बाँध और खनन परियोजनाओं ने बड़े पैमाने पर विस्थापन किया है। विस्थापित आदिवासी जब शहरों के आसपास बसाए जाते हैं तो वे अपने पारंपरिक जीवन और सामाजिक ढाँचे से कट जाते हैं, मानो मछली को पानी से निकालकर सूखी ज़मीन पर छोड़ दिया गया हो।
लेकिन इस उपेक्षा और संघर्ष के बीच आदिवासी संस्कृति की प्रगतिशीलता हमें चौंकाती है। जिस समाज को अक्सर पिछड़ा और परंपरावादी कहकर देखा जाता है, उसी में सबसे अधिक आधुनिक और संतुलित जीवन-दृष्टि देखने को मिलती है। आदिवासी समाज में स्त्रियों की स्थिति इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है। स्त्रियाँ खेतों और जंगल में पुरुषों के साथ बराबरी से काम करती हैं। विवाह में दहेज प्रथा लगभग न के बराबर है, बल्कि कई जगह पुरुष को स्त्री को देने के लिए उपहार देना पड़ता है। मायके की संपत्ति में स्त्रियों का अधिकार मान्य है। स्त्रियाँ सार्वजनिक जीवन में पुरुषों के साथ बैठकर खा-पी सकती हैं और काम कर सकती हैं। यह स्वतंत्रता आज भी भारत के कई गैर-आदिवासी समाजों में नहीं है।
सामुदायिक जीवन भी आदिवासी संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है। गीत, संगीत और नृत्य उनके जीवन का हिस्सा हैं। छत्तीसगढ़ का मुरिया नृत्य, ओडिशा का छऊ नृत्य, झारखंड का झूमर, कुल मिलकर यह बताते हैं कि उत्सव उनके जीवन के हर दिन में शामिल है। विवाह, मृत्यु या फसल कटाई हर अवसर पर पूरा समुदाय मिलकर गाता-बजाता और नाचता है। यह परंपरा यूरोप के कम्युनिटी डांस या चर्च के समूह गायन से मिलती-जुलती है। इस तुलना से यह साफ होता है कि आदिवासी संस्कृति को पिछड़ा कहना एक भूल है; असल में यह सबसे प्रगतिशील और संतुलित जीवन शैली है।
प्रकृति के साथ उनका सहजीवन आज की दुनिया के लिए सबसे बड़ा सबक है। आदिवासी जल, जंगल और ज़मीन को सिर्फ़ संसाधन नहीं बल्कि माँ मानते हैं। उनकी कृषि पद्धतियाँ टिकाऊ विकास का असली उदाहरण हैं। संयुक्त राष्ट्र की खाद्य और कृषि संगठन ने 2023 में भारत की आदिवासी कृषि प्रणालियों को विश्व स्तर पर महत्वपूर्ण कृषि विरासत प्रणालियां के रूप में मान्यता दी। भारत में इसे जनजातीय विरासत कृषि प्रणाली कहा गया। इसमें पाँच तत्व जल, जंगल, ज़मीन, पशु और लोग साथ होते हैं और यही टिकाऊ विकास और जलवायु न्याय का सबसे मजबूत मॉडल है। 2023 के कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज़ (कौप28) जलवायु सम्मेलन में भारत ने इन्हीं आदिवासी कृषि पद्धतियों को जलवायु परिवर्तन के समाधान के रूप में प्रस्तुत किया था। यह वैश्विक मंच पर आदिवासी ज्ञान की स्वीकृति का ऐतिहासिक क्षण था।
हाल के वर्षों में आदिवासी समाज ने अपनी पहचान और अधिकारों के लिए कई आंदोलन खड़े किए हैं। झारखंड में सरना धर्म को अलग पहचान दिलाने की मांग के लिए कई बार राज्यव्यापी बंद बुलाए गए। यह मांग केवल धार्मिक पहचान की नहीं बल्कि सांस्कृतिक अस्तित्व की लड़ाई है। छत्तीसगढ़ के बस्तर में 2025 की शुरुआत में आयोजित निवेश सम्मेलन को भी आदिवासी संगठनों ने विरोध का स्वर दिया। उनका कहना था कि निवेश के नाम पर जंगल और ज़मीन छीन ली जाएगी और स्थानीय लोगों को रोजगार नहीं मिलेगा।
डिजिटल युग में आदिवासी समाज भी अपनी पहचान बना रहा है। खबर लहरिया जैसे प्लेटफ़ॉर्म, जो ग्रामीण और आदिवासी महिलाओं द्वारा चलाया जाता है, आज डिजिटल मीडिया में सशक्त आवाज़ बन चुका है। रघुनाथ मुर्मू द्वारा निर्मित ओल चिकी लिपि संथाली भाषा को लिखित रूप देने का प्रयास था और आज भी यह नई पीढ़ी तक आदिवासी ज्ञान पहुँचाने का माध्यम बन रही है।
इन सब बातों से यह स्पष्ट है कि आदिवासी संस्कृति केवल भारत की 8.6 प्रतिशत जनसंख्या का प्रतिनिधित्व नहीं करती, बल्कि यह हमारी सभ्यता की जड़ें और भविष्य दोनों है। उन्होंने हमें सिखाया कि लैंगिक समानता, सामुदायिकता और प्रकृति-प्रेम ही जीवन का संतुलित मार्ग है। उन्होंने यह साबित किया कि बिना औद्योगिक प्रदूषण और अत्यधिक उपभोग के भी जीवन खुशहाल हो सकता है। उनकी परंपराएँ आज के सतत विकास लक्ष्यों से कहीं आगे हैं। लेकिन शहरीकरण और विस्थापन की वजह से उनकी संस्कृति धीरे-धीरे कमज़ोर हो रही है। यदि इस दिशा में तुरंत ठोस कदम न उठाए गए तो यह प्रगतिशील धरोहर हमारे हाथों से फिसल जाएगी।
इसलिए जब भारत विश्वगुरु बनने की राह पर आगे बढ़ रहा है, तो उसे केवल पश्चिम से सीखने की ज़रूरत नहीं है। असली प्रेरणा हमारी अपनी आदिवासी संस्कृति में है, जो हमें संतुलन, स्वतंत्रता और टिकाऊ जीवन की राह दिखाती है। यही संस्कृति हमारी सबसे प्रगतिशील धरोहर है, जिसे अब और नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।











