भारत में महिलाओं की कार्यक्षेत्र में भागीदारी और उनकी पेशेवर स्थिति लंबे समय से चर्चा का विषय रही है। आधुनिक समय में शिक्षा और कौशल विकास के विस्तार ने महिलाओं को रोजगार के नए अवसर दिए हैं, किंतु आज भी कामकाजी महिलाओं पर असमानुपातिक बोझ बना हुआ है। हाल के वर्षों में कई घटनाएँ इस तथ्य को उजागर करती हैं कि विशेषकर शहरी और कॉर्पोरेट क्षेत्रों में काम करने वाली महिलाएँ अत्यधिक कार्यभार, तनाव और घरेलू जिम्मेदारियों के दोहरे दबाव का सामना करती हैं। अर्न्स्ट एंड यंग में कार्यरत एक युवा महिला चार्टर्ड अकाउंटेंट की दुखद मृत्यु ने इस मुद्दे को पुनः सार्वजनिक विमर्श का विषय बना दिया है और इसने यह प्रश्न उठाया है कि आखिर क्यों महिलाएँ कार्यबल में प्रवेश के बाद भी समान अवसरों, सुरक्षित वातावरण और संतुलित जीवन से वंचित रहती हैं।
भारत में कामकाजी महिलाओं की स्थिति पर दृष्टि डालें तो यह स्पष्ट होता है कि उनकी कार्य परिस्थितियाँ वैश्विक मानकों से भिन्न और कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण हैं। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) की रिपोर्ट बताती है कि भारतीय पेशेवर महिलाएँ औसतन 55 घंटे प्रति सप्ताह काम करती हैं। इसका अर्थ है कि वे प्रतिदिन लगभग 9 से 11 घंटे दफ्तर में बिताती हैं। इसके बाद भी घरेलू दायित्वों से मुक्ति नहीं मिलती और उन्हें अवैतनिक देखभाल कार्यों के लिए प्रतिदिन 5 से 7 घंटे अतिरिक्त देने पड़ते हैं। इस प्रकार उनके पास आराम और व्यक्तिगत जीवन के लिए केवल 7-10 घंटे बचते हैं। तुलना के लिए देखें तो जर्मनी में आईटी और मीडिया क्षेत्रों में कार्यरत महिलाएँ औसतन 32 घंटे साप्ताहिक काम करती हैं और रूस में 40 घंटे। यह अंतर केवल कार्यभार का ही नहीं बल्कि कार्य-जीवन संतुलन की सोच और नीति का भी है।
युवा महिलाओं की स्थिति और भी गंभीर है। 15 से 24 वर्ष की आयु वर्ग की महिलाएँ सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी तथा मीडिया जैसे क्षेत्रों में प्रति सप्ताह औसतन 57 घंटे काम करती हैं। वैज्ञानिक और तकनीकी गतिविधियों में भी वे 55 घंटे से कम नहीं देतीं। यह प्रवृत्ति चिंताजनक है क्योंकि यह दर्शाती है कि उम्र घटने के साथ कार्यघंटे बढ़ते जाते हैं। अर्थात् कार्यबल में प्रवेश करते ही युवा महिलाओं से अपेक्षा की जाती है कि वे सामान्य मानकों से कहीं अधिक मेहनत करें।
व्यावसायिक भूमिकाओं में महिलाओं की हिस्सेदारी अब भी सीमित है। केवल 8.5% महिलाएँ पेशेवर वैज्ञानिक और तकनीकी नौकरियों में कार्यरत हैं और आईसीटी क्षेत्रों में यह आँकड़ा 20% है। इस लिहाज से भारत 145 देशों में 15वें सबसे निचले स्थान पर आता है। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि महिलाओं को गुणवत्तापूर्ण और नेतृत्वकारी भूमिकाओं में अवसर मिलने में भारी बाधाएँ हैं।
यदि घरेलू कार्यों की बात करें तो तस्वीर और भी जटिल हो जाती है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (2019-21) दर्शाता है कि श्रम बल से बाहर रहने वाली महिलाएँ प्रतिदिन औसतन 7.5 घंटे अवैतनिक घरेलू और देखभाल कार्यों में बिताती हैं। वहीं कामकाजी महिलाएँ भी औसतन 5.8 घंटे घरेलू जिम्मेदारियों को देती हैं। इसके विपरीत बेरोजगार पुरुष प्रतिदिन केवल 3.5 घंटे और नौकरीपेशा पुरुष महज 2.7 घंटे घरेलू कामों में योगदान देते हैं। यह असमानता दर्शाती है कि घरेलू कामकाज का बोझ लगभग पूरी तरह महिलाओं के कंधों पर ही है।
क्षेत्रीय विविधताओं के बावजूद तस्वीर अधिक नहीं बदलती। 15-59 वर्ष की आयु वर्ग की लगभग 85% महिलाएँ बिना वेतन के घरेलू कार्य करती हैं और इसमें ग्रामीण-शहरी अंतर नगण्य है। हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्यों में पुरुषों की घरेलू कार्यों में भागीदारी कई बार 50% से भी कम दर्ज की गई है। इससे स्पष्ट है कि घरेलू श्रम को लेकर सामाजिक सोच में अभी भी बड़ा बदलाव आवश्यक है।
कॉर्पोरेट और व्हाइट-कॉलर नौकरियों की स्थिति पर विचार करें तो समस्याएँ और स्पष्ट हो जाती हैं। व्हाइट-कॉलर कर्मचारी वेतनभोगी पेशेवर होते हैं, जो प्रबंधकीय या प्रशासनिक कार्य करते हैं। इनके लिए कानूनी ढाँचा अभी भी असंगठित है। औद्योगिक विवाद अधिनियम, दुकानें और प्रतिष्ठान अधिनियम तथा कारखाना अधिनियम जैसे कानून तो हैं, किंतु इनका अनुप्रयोग निजी क्षेत्र में समान रूप से नहीं होता। मानक अनुबंध की कमी से कंपनियों में असमानता रहती है और कर्मचारी अधिकारों पर प्रभाव पड़ता है।
2023 में एसोचैम के अध्ययन से पता चला कि 42% भारतीय व्हाइट-कॉलर कर्मचारी प्रति सप्ताह 48 घंटे की कानूनी सीमा से अधिक काम करते हैं। टीमलीज (2022) के सर्वेक्षण ने भी यह उजागर किया कि 68% पेशेवर कार्य-जीवन संतुलन के साथ संघर्ष कर रहे हैं। यह स्थिति मानसिक स्वास्थ्य, पारिवारिक संबंधों और उत्पादकता सभी को प्रभावित करती है। इसके अलावा गिग इकॉनमी के उदय ने समस्याओं को और बढ़ा दिया है। फ्रीलांसरों और अनुबंध आधारित कर्मचारियों को प्रायः सवेतन अवकाश, स्वास्थ्य बीमा और सामाजिक सुरक्षा जैसे बुनियादी अधिकार नहीं मिलते।
श्रम कानूनों की कठोरता को लेकर भी बहस है। आईटी और सेवा क्षेत्र जैसे गतिशील क्षेत्रों में अत्यधिक विनियमन से नवाचार और अनुकूलनशीलता प्रभावित हो सकती है। वहीं, कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि कठोर नियमों से अधिक खुला संवाद और विश्वास का माहौल कार्य-जीवन संतुलन के लिए आवश्यक है। किंतु यह भी सत्य है कि यदि न्यूनतम मानक और सुरक्षा उपाय सुनिश्चित न हों, तो कंपनियाँ कर्मचारियों पर असमानुपातिक दबाव डालने से नहीं हिचकिचातीं।
अब प्रश्न यह है कि महिलाओं की श्रम बल भागीदारी कम क्यों है और क्यों वे कार्यबल में अपनी पूरी क्षमता का उपयोग नहीं कर पातीं। सबसे बड़ी बाधा पितृसत्तात्मक सामाजिक मानदंड हैं। पारंपरिक धारणाएँ अब भी महिलाओं को गृहिणी और देखभालकर्ता की भूमिका तक सीमित करना चाहती हैं। शिक्षा और रोजगार में उनकी भागीदारी को लेकर परिवार और समाज की अपेक्षाएँ सीमित होती हैं। इसके साथ ही लैंगिक वेतन अंतर भी महिलाओं को हतोत्साहित करता है। विश्व असमानता रिपोर्ट 2022 बताती है कि पुरुष श्रम आय का 82% कमाते हैं, जबकि महिलाओं की हिस्सेदारी मात्र 18% है। इस असमानता से न केवल महिलाओं की आर्थिक स्थिति कमजोर होती है बल्कि उनकी प्रेरणा भी घटती है।
सुरक्षा संबंधी चिंताएँ भी एक बड़ा कारण हैं। कार्यस्थल पर उत्पीड़न और हिंसा का डर कई महिलाओं को औपचारिक रोजगार से दूर रखता है। नेतृत्वकारी भूमिकाओं में महिलाओं का कम प्रतिनिधित्व भी एक दुष्चक्र पैदा करता है। जब निर्णय लेने वाली भूमिकाओं में महिलाएँ नहीं होंगी, तो नीतियाँ और वातावरण भी प्रायः पुरुष-प्रधान दृष्टिकोण से ही संचालित होंगे, जिससे अन्य महिलाओं के लिए भी अवसर सीमित रहेंगे।
इस स्थिति को सुधारने के लिए बहुआयामी प्रयास आवश्यक हैं। सबसे पहले, कार्यस्थलों पर महिलाओं के समावेशन और समर्थन को प्राथमिकता देनी होगी। इसमें सवेतन मातृत्व अवकाश, लचीले कार्य घंटे, सुरक्षित वातावरण और लैंगिक समानता सुनिश्चित करने वाली नीतियाँ शामिल हैं। कंपनियों को नियुक्ति, पदोन्नति और वेतन में लैंगिक पूर्वाग्रह को समाप्त करना होगा।
सांस्कृतिक बदलाव भी उतना ही महत्वपूर्ण है। कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व के तहत मानसिक स्वास्थ्य सहायता, काउंसलिंग और कार्य-जीवन संतुलन को बढ़ावा देने वाली पहलें की जा सकती हैं। अत्यधिक कार्य घंटे को हतोत्साहित करने से कर्मचारियों की थकान कम होगी और उत्पादकता बढ़ेगी।
कानूनी सुधार भी आवश्यक हैं। मौजूदा श्रम कानूनों का सख्ती से पालन हो और गिग व फ्रीलांस कामगारों के लिए नए नियम बनाए जाएँ। न्यूनतम वेतन, सामाजिक सुरक्षा, विवाद समाधान और सुरक्षा उपाय सुनिश्चित करने से महिलाएँ भी नये कार्यक्षेत्रों में सुरक्षित महसूस करेंगी।
सरकार की भूमिका भी अहम है। लचीले कार्य वातावरण, स्वास्थ्य कवरेज और विविधता को प्रोत्साहन देने वाली नीतियाँ बनाई जानी चाहिए। साथ ही, कर्मचारी अधिकारों और नियोक्ता की जिम्मेदारियों पर जन-जागरूकता अभियान भी चलाए जाने चाहिए।
इस प्रकार स्पष्ट है कि भारत में कामकाजी महिलाओं पर असमानुपातिक बोझ केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं बल्कि एक संरचनात्मक चुनौती है। घरेलू कार्य, सामाजिक मानदंड, लैंगिक असमानता, असुरक्षित कार्यस्थल और असंगठित नीतियाँ मिलकर यह बोझ और बढ़ा देती हैं। समाधान के लिए केवल कानूनी उपाय पर्याप्त नहीं होंगे, बल्कि समाज और संस्कृति में व्यापक बदलाव भी आवश्यक है। जब तक महिलाएँ कार्यक्षेत्र और घर दोनों में समान रूप से मान्यता और सहयोग नहीं पाएंगी, तब तक उनका बोझ असमानुपातिक बना रहेगा।









