भारतीय समाज में मीडिया हमेशा से ही एक ऐसा दर्पण रहा है जो परंपरा और परिवर्तन दोनों को एक साथ दर्शाता है। मीडिया का स्वरूप संवेदनशील लिटमस टेस्ट की तरह है, जो यह परखने में मदद करता है कि समाज कितना लोकतांत्रिक, समान और न्यायपूर्ण है। भारतीय मीडिया ने स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आज तक समाज को दिशा देने का कार्य किया है, लेकिन इस दौरान सबसे बड़ी चुनौती रही है – महिलाओं का प्रतिनिधित्व।
ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
भारत में लंबे समय तक पत्रकारिता और मीडिया पुरुष-प्रधान क्षेत्र रहे। समाचार कक्षों, रेडियो स्टूडियो और फिल्म कैमरे महिलाओं से दूर ही रखे गए। लेकिन इस पुरुष-प्रधान संरचना को चुनौती देने वाली कुछ साहसी महिलाएँ भी सामने आईं।
1942 में विद्या मुंशी ने भारतीय मुख्यधारा की पहली महिला पत्रकार बनकर एक नए युग की शुरुआत की। उन्होंने अपने लेखन से यह सिद्ध किया कि पत्रकारिता केवल पुरुषों का पेशा नहीं है। इसके बाद 1965 में प्रतिमा पुरी दूरदर्शन पर भारत की पहली समाचार वाचिका बनीं। उस दौर में जब सेल्युलाइड पर महिलाओं को केवल नायिका या खलनायिका की भूमिकाओं में सीमित किया जाता था, प्रतिमा पुरी ने समाचार वाचन में पेशेवराना गरिमा स्थापित की।
भारत की पहली महिला फोटो पत्रकार होमाई व्यारावाला का योगदान भी अविस्मरणीय है। उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध से लेकर स्वतंत्र भारत की राजनीति तक कई ऐतिहासिक क्षणों को कैमरे में कैद किया। उनकी तस्वीरें केवल दस्तावेज़ ही नहीं बल्कि इतिहास का जीवंत प्रमाण बन गईं। इसी तरह प्रभा दत्त ने 1965 के भारत-पाक युद्ध को गुप्त रूप से कवर करके यह साबित किया कि महिला पत्रकार किसी भी कठिन परिस्थिति में अपनी जिम्मेदारी निभा सकती हैं।
इन अग्रदूतों ने आने वाली पीढ़ियों की पत्रकार महिलाओं के लिए रास्ते खोले। बरखा दत्त, निधि राजदान, फेय डिसूजा, सुचित्रा गुप्ता जैसी अनेक पत्रकारों ने मोर्चे की रिपोर्टिंग से लेकर स्टूडियो तक अपनी जगह बनाई।
न्यूज़रूम और संपादकीय सत्ता में असमानता
इतिहास के बावजूद वास्तविक स्थिति अभी भी असमान है। 2017 में न्यूज़लॉन्ड्री द्वारा किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि भारत के प्रमुख अखबारों – द हिंदू, द टाइम्स ऑफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स, द टेलीग्राफ और इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित लेखों में केवल 32% महिलाओं द्वारा लिखे गए थे। इसका मतलब यह है कि बाइलाइन की संख्या पुरुषों की तुलना में लगभग दोगुनी थी।
इसके अलावा, संपादकीय पदों और निर्णय लेने की प्रक्रिया में महिलाओं की उपस्थिति बेहद सीमित है। ग्लास सीलिंग की अवधारणा यहां स्पष्ट दिखाई देती है। कई बार समान योग्यता और अनुभव के बावजूद महिलाओं को प्रमोशन में रोका जाता है या केवल लाइफस्टाइल, संस्कृति और फैशन पन्नों तक सीमित कर दिया जाता है।
नेटवर्क ऑफ वीमेन इन मीडिया, इंडिया (एनडब्लूएमआई) की अम्मू जोसेफ लिखती हैं –कई महिला पत्रकार अभी भी अपने करियर में धीमी और सीमित प्रगति, या ठहराव का अनुभव करती हैं।
लोकप्रिय संस्कृति और रूढ़िबद्ध छवि
मीडिया की प्रस्तुति में महिलाओं की छवि अक्सर रूढ़िबद्ध रही है।
- फिल्मों में – महिलाओं को या तो त्यागमयी नायिका दिखाया गया या दंडित खलनायिका।
- टीवी धारावाहिकों में – महिला किरदारों को परिवार के इर्द-गिर्द सीमित कर दिया गया।
- विज्ञापनों में – महिलाएँ कपड़े धोने, बर्तन साफ करने और खाना परोसने तक ही बंधी दिखाई गईं।
फिल्म निर्माता बिशाखा दत्त का कहना है कि भारतीय सिनेमा ने स्त्री-केंद्रित कथाओं को धीरे-धीरे नायिका-केंद्रित लेकिन दंडात्मक भूमिकाओं में बदल दिया। शोमा मुंशी की पुस्तक रेमोर्ट कंट्रोल भारतीय टीवी में महिलाओं की सीमित और रूढ़िबद्ध छवि को उजागर करती है। विज्ञापन उद्योग ने भी पितृसत्ता को मजबूत किया है। यहाँ महिलाएँ अक्सर केवल उपभोक्ता उत्पाद बेचने का साधन भर रह गईं।
डिजिटल इंडिया और जेंडर डिजिटल डिवाइड
भारत आज दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा इंटरनेट और स्मार्टफोन उपभोक्ता बाजार है। लेकिन इस डिजिटल क्रांति में भी महिलाएँ पीछे हैं।
लाइवमिंट की रिपोर्ट शी इज ऑफलाइन (2021) के अनुसार, वैश्विक स्तर पर डिजिटल जेंडर गैप का लगभग 42% हिस्सा केवल भारत से आता है। भारत में मोबाइल फोन रखने वाली महिलाओं की संख्या पुरुषों से बहुत कम है। लिर्नेशिया की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में केवल 43% महिलाएँ मोबाइल फोन का उपयोग करती हैं। इंटरनेट उपयोगकर्ताओं में भी महिलाएँ एक-तिहाई से कम हैं। इस असमानता का सीधा असर डिजिटल पत्रकारिता पर पड़ता है। महिलाएँ न केवल तकनीकी संसाधनों से वंचित हैं बल्कि ऑनलाइन उत्पीड़न और ट्रोलिंग का सामना भी अधिक करती हैं।
आधुनिक उदाहरण और संघर्ष
इन सबके बावजूद कई प्रेरणादायक उदाहरण मौजूद हैं। इन उदाहरणों से साफ होता है कि चुनौतियों के बीच भी महिला पत्रकारिता न केवल जीवित है बल्कि नई ऊर्जा और दृष्टि के साथ आगे बढ़ रही है।
- खबर लहरिया – बुंदेलखंड की ग्रामीण महिलाओं द्वारा चलाया जाने वाला यह अखबार आज डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी सक्रिय है। राइटिंग विद फायर वृत्तचित्र ने इसकी ताकत और जुझारूपन को पूरी दुनिया तक पहुँचाया। यह उदाहरण बताता है कि पत्रकारिता केवल महानगरों की मुख्यधारा तक सीमित नहीं, बल्कि गाँवों की महिलाएँ भी अपने हक़ की आवाज बुलंद कर सकती हैं।
- बरखा दत्त – कोविड-19 महामारी के दौरान जब अधिकांश मीडिया संस्थान स्टूडियो से रिपोर्टिंग कर रहे थे, बरखा दत्त सड़क पर थीं। उन्होंने अपनी ग्राउंड रिपोर्टिंग से यह साबित किया कि महिला पत्रकार सबसे कठिन परिस्थितियों में भी समाज की आवाज बन सकती हैं।
- राणा अय्यूब – खोजी पत्रकारिता में उनका नाम साहस और निर्भीकता के प्रतीक के रूप में जाना जाता है। सरकार की आलोचना और अल्पसंख्यक समुदायों के पक्ष में आवाज उठाने पर उन्हें लगातार ऑनलाइन ट्रोलिंग और जान से मारने की धमकियों का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उनका संघर्ष बताता है कि महिला पत्रकारों को लोकतंत्र बचाने के लिए दोगुनी लड़ाई लड़नी पड़ती है।
- साक्षी जोशी – मुख्यधारा चैनलों से अलग होकर स्वतंत्र पत्रकारिता की राह चुनना आसान नहीं था। लेकिन उन्होंने डिजिटल प्लेटफॉर्म को अपनी ताकत बनाया। आज वे लाइव सत्रों, स्वतंत्र वीडियो रिपोर्टिंग और जनसरोकार से जुड़े मुद्दों के जरिए यह साबित कर रही हैं कि महिलाएँ डिजिटल मीडिया की अग्रिम पंक्ति में खड़ी हैं।
- निधि राजदान – लंबे समय तक एनडीटीवी से जुड़ी रहीं और टीवी न्यूज़रूम की प्रतिष्ठित आवाज़ बनीं। विदेशी विश्वविद्यालय से जुड़े विवाद का सामना करने के बावजूद उन्होंने पत्रकारिता और शिक्षण दोनों क्षेत्रों में अपनी जगह बनाई। उनकी यात्रा इस बात की मिसाल है कि व्यक्तिगत चुनौतियाँ भी किसी महिला पत्रकार की पेशेवर साख को कम नहीं कर सकतीं।
- अर्फा खानम शेरवानी – द वायर जैसी डिजिटल मीडिया संस्था से जुड़कर उन्होंने न केवल खोजी और विश्लेषणात्मक पत्रकारिता को नई दिशा दी बल्कि महिलाओं और अल्पसंख्यकों की आवाज़ को बुलंद किया। उन्हें भी ट्रोलिंग, ऑनलाइन बदनाम करने और धमकियों का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने पत्रकारिता के मूल्यों से समझौता नहीं किया।
आज के घटनाक्रम से जुड़ाव
2023 में भारतीय संसद ने महिला आरक्षण विधेयक यानी नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित किया, जिसमें संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 33% आरक्षण देने का प्रावधान है। लेकिन मीडिया संस्थानों में अभी तक ऐसा कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।
2024- 25 के चुनावी कवरेज में भी महिला पत्रकारों की भूमिका महत्वपूर्ण रही। कई टीवी और डिजिटल चैनलों पर महिला एंकरों ने चुनावी बहस को दिशा दी। लेकिन दूसरी ओर, सोशल मीडिया पर महिला पत्रकारों को अभद्र टिप्पणियों और ट्रोलिंग का शिकार होना पड़ा।
एआई और डीपफेक तकनीक ने भी महिला पत्रकारों के लिए नए खतरे पैदा किए हैं। हाल ही में कई महिला पत्रकारों और एक्टिविस्टों की फेक वीडियो बनाकर उन्हें बदनाम करने की घटनाएँ सामने आईं। यह ट्रेंड दिखाता है कि डिजिटल सुरक्षा अब पत्रकारिता की सबसे बड़ी चुनौती बन गई है।
नीतिगत सुधार और आवश्यक कदम
महिलाओं की समान भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए मीडिया संस्थानों को कुछ ठोस कदम उठाने होंगे –
- समान कार्य के लिए समान वेतन
- भेदभाव रहित पदोन्नति
- सुरक्षित कार्यस्थल – पोश एक्ट (कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न रोकथाम, निषेध और निवारण अधिनियम, 2013) कानून का सख्त पालन।
- मातृत्व अवकाश और क्रेच सुविधाएँ – ताकि मातृत्व और करियर दोनों संतुलित रह सकें।
- टेक्नोलॉजी प्रशिक्षण – महिलाओं को नई डिजिटल तकनीकों पर प्रशिक्षित करना।
- नेटवर्क और सहायता समूह – महिला पत्रकारों के संगठनों को और मज़बूत करना।
नारीवादी दृष्टिकोण और वैश्विक परिप्रेक्ष्य
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखा जाए तो स्कैंडिनेवियाई देशों – नॉर्वे, स्वीडन और फिनलैंड में मीडिया संस्थानों में महिलाओं की भागीदारी 50% से अधिक है। बीबीसी (यूके) और न्यूयॉर्क टाइम्स (अमेरिका) जैसे संस्थानों ने लैंगिक समानता की दिशा में ठोस पहल की है।
भारत को भी इसी दिशा में आगे बढ़ना होगा। यहाँ महिलाओं को न केवल न्यूज़रूम में समान स्थान चाहिए, बल्कि नीति निर्धारण और प्रबंधन स्तर पर भी उनकी निर्णायक भागीदारी आवश्यक है। मीडिया केवल समाज का दर्पण नहीं, बल्कि उसका निर्माता भी है। यदि मीडिया में महिलाओं का प्रतिनिधित्व सीमित या विकृत होगा, तो समाज भी उसी छवि को आत्मसात करेगा।
भारतीय लोकतंत्र की मजबूती तभी संभव है जब मीडिया अपने भीतर लैंगिक समानता को अपनाए। विद्या मुंशी, प्रतिमा पुरी, होमाई व्यारावाला और प्रभा दत्त जैसी महिलाओं ने जिस रास्ते की शुरुआत की थी, उसे आज की पीढ़ी को और आगे बढ़ाना होगा।
आज जब देश डिजिटल इंडिया और नारी शक्ति वंदन की बात कर रहा है, तब मीडिया संस्थानों को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि हर महिला पत्रकार को न केवल समान अवसर मिले बल्कि उसकी सुरक्षा और गरिमा की भी गारंटी हो।









