(रविकांत तिवारी)देश में बच्चों के प्रति बढ़ते अपराध और नाबालिगों का क्राइम की ओर आकर्षित होना चिंता का विषय बन गया है। देश के विभिन्न राज्यों में रोज बच्चों के खिलाफ क्राइम की घटनाएं पढ़ने को मिलती है। वहीं इन अपराधों में जान-पहचान वाले ही घटना को अंजाम दे रहें है। वहीं भारत में क्राइम पेट्रोल और सावधान इंडिया जैसे टीवी शो और क्राइम-आधारित कार्यक्रमों से वास्तविक अपराधों के प्रेरित होने के मामले बढ़े हैं। ये शो अक्सर क्राइम को विस्तार से चित्रित करके पेश करते है, जिससे अपराधियों को अपराध करने के नए-नए तरीके सिखाते हैं, जो समाज में हिंसा और आपराधिक मानसिकता को बढ़ावा दे रहे हैं।
इन कार्यक्रमों में हिंसक दृश्यों के कारण दर्शकों में संवेदनशीलता कम हो रही है, जिससे वे वास्तविक जीवन की हिंसा के प्रति आकर्षित हो रहे हैं। इन कार्यक्रमों की कहानियां वास्तविक घटनाओं पर आधारित होती हैं, लेकिन इन्हें इस तरह दिखाया जाता है कि वे संभावित अपराधियों को प्रेरित कर सकते हैं। अपराधी इन शो से अपराध करने की योजना और सबूत मिटाने के तरीके सीखते हैं और कानून के साथ खिलवाड़ करते है। वह बार-बार हिंसा और यौनशोषण जैसे दृश्य देखने से हिंसक व्यवहार को सामान्य मानने लगते हैं, जो समाज में अपराध की दर को बढ़ाता जा रहा है और इस डिजिटल दुनिया में मोबाइल पर बच्चों को यह हिसंक शो आसानी से देखने मिल जाते है। ऐसे शो में अक्सर महिलाओं के खिलाफ अपराध के तरीकों को बहुत विस्तार से दिखाया जाता है, जो समाज में सुरक्षा की भावना को प्रभावित करता है। कहीं न कहीं टीवी शो से नाबालिगों में पैसे कैसे आसानी से कमाएं जाएं और कैसे अपनी इछाएं जल्द से जल्द पूरी की जाए इस लालच में भटक जाते है एवं गलत रास्ते का चयन कर अपराध के दल-दल में फंस जाते है।
टीवी पर क्राइम शो मनोरंजन और जागरूकता के साथ-साथ गंभीर नकारात्मक प्रभाव भी डाल रहे हैं। यह जरूरी है कि कंटेंट निर्माता और नियामक इस तरह के शो को जिम्मेदार तरीके से पेश करें। दूसरी ओर टीवी शो और डिजिटल मीडिया के माध्यम से साइबर अपराध के नए और जटिल तरीकों के प्रति लोगों में जागरूकता तो बढ़ी है, लेकिन इससे साइबर अपराधियों को भी नए विचार मिल रहे हैं, जिससे भारत में साइबर अपराध सबसे तेज गति से बढ़ रहे हैं। हाल ही में नागपुर में हुई कुछ वारदातों से इसी का उदारण के तौर पर देखा जा सकता है। जहां एक 14 साल के मासूम बच्चे को हनुमान जयंती के दिन शोभा यात्रा से अपहरण कर लिया गया और बेहोश न होने पर उसकी निर्मम हत्या कर दी गयी। बच्चे के शव को आरोपियों ने बोरे में बांधकर उसके हाथ-पाव बांध दिए थे। आरोपी बच्चे के जरिए 45 लाख की फीरौती की मांग करना चाहते थे, लेकिन अपहरण के बाद जब अथर्व नानोरे को बेहोशी के लिए चूहे मारने वाली गोली सुंघाई गई तब भी अथर्व बेहोश नहीं हुआ। उसकी आवाज बंद करने के लिए आरोपियों ने अथर्व को जमकर मारा और उसकी गला घोंटकर हत्या कर दी।
दरअसल, ये पूरा मामला नागपुर के गिट्टीखदान थाने का है,जहां 14 वर्ष का अथर्व नानोरे अपने परिवार के साथ रहता था। अथर्व के पिताजी थोक में सब्जी विक्रेता के तौर पर काम करते हैं। अथर्व 2 अक्टूबर को हनुमान जयंती के दिन शोभायात्रा देखने पंहुचा था, लेकिन उसे क्या पता था कि वहां कुछ गिद्ध उसकी राह देख रहे हैं। अथर्व का जब शोभायात्रा देखने पहुंचा तब उसके परिचित धोखे से उसे अपने साथ ले गए और उसका अपहरण कर लिया। पुलिस के मुताबिक, आरोपी जय यादव, कृणाल साहू और आशिष साहू ने पैसों के लालच में अथर्व का अपहरण किया था और कुछ ही घंटों के भीतर उसकी हत्या कर दी। यह तीनों आरोपी मृतक के जान-पहचान के थे। यह सभी आरोपियों की उम्र 22 साल से कम थी। पैसों और लालच के चक्कर में इन लाेगों ने मासूम की जान ले ली। दूसरी घटना में तीन नाबालिग इंजीनियरिंग के छात्रों ने एक बुजुर्ग की हत्या सिर्फ मोबाइल और कार की लालच में हत्या कर दी थी। यह घटना अपनी अनावश्यक जरूरतों को पूरा करने और जल्द से जल्द ख्वाबों को पूरा करने के चक्कर में एक निर्दोष को बिना किसी कारण के मौत के घाट उतार दिया और पढाई के बदले जेल की हवा खा रहे है। डिजिटल और तकनीक का उपयोग करती युवा पीढ़ी के सामाजिक संस्कारों से कुछ सिखने के बजाय इन क्राइम और हिंसक-अश्लील शो से गलत रास्तों पर आगे बढ़ रहे है।
वर्तमान के युवा का ज्यादा से ज्यादा समय मोबाइल और टीवी पर गुजारते है। वहीं तीसरी घटना में नागपुर के ही सीआरपीएफ क्षेत्र में एक युवक ने अपने साथी के साथ मिलकर एक जवान की हत्या कर दी क्योंकि जवान ने अपनी नाबालिग बेटी से मिलने से मना किया था। युवक आकाश मंडल ठाकुर की बेटी का पीछा कर रहा था और बार-बार उनके घर के पास मंडराता रहता था। जब बेटी ने अपने पिता को इस बारे में बताया तो पंकज ठाकुर ने आकाश से पूछा कि तुम बार-बार यहां क्यों मंडरा रहे हो? इसके बाद आरोपी ने एक बार फिर ठाकुर की बेटी से बात करने की कोशिश करते हुए देखा गया। इससे आरोपी और पंकज ठाकुर के बीच बहस छिड़ गई। कुछ ही देर बाद आरोपी आकाश मंडल अपने भाई हर्षित मंडल और कई अन्य साथियों के साथ वापस लौटा। उन्होंने पंकज ठाकुर को ढूंढ निकाला और उन पर अचानक हमला कर दिया।
घटना के बाद उन्हें तुरंत पास के एक अस्पताल ले जाया गया। हालांकि इलाज के दौरान डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। इसी तरह अप्रैल में ही वर्धा में एक नाबालिग ने अपने चाचा और भतीजे का एक शादी समारोह में सरेआम हत्या कर दी थी। युवाओं में हिसंक प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है। वे हर बात पर इतना उत्तेजित हो जाते हैं कि अपने करियर का विचार किये बिना कुछ भी करने पर उतारू हो जाते हैं और अपना पूरा करियर बरबाद कर देते है। यहां तक की परिजनों की समझाइश भी उन्हें बुरी लगती है। जिस तरह की घटनाएं आये दिन सामने आ रही हैं उससे तो यही लगता है कि हम तकनीक में चाहे जितने आगे निकल रहे हों पर हमारे संस्कार और सहनशीलता खोते जा रहे है। वे अपने आगे किसी की सुन्ना ही नहीं चाहते है। अहम और वहम के बीच अपनी जिंदगी नर्क बना रहे है।
वहीं राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो (एनसीआरबी) की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, 2023 में देश में बच्चों के खिलाफ अपराध के कुल 1,77,335 मामले दर्ज किए गए, जो 2022 की तुलना में 9.2% की वृद्धि दर्शाते हैं। 2023 में अपराध दर प्रति एक लाख बाल जनसंख्या पर 39.9 थी , जबकि 2022 में यह 36.6 थी। प्रतिशत के हिसाब से, 2023 में बच्चों के खिलाफ अपराध के अंतर्गत प्रमुख अपराध श्रेणियां बच्चों का अपहरण और अगवा करना (79,884 मामले, 45%) और बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण (पीओसीएसओ) अधिनियम” (67,694 मामले, 38.2%) थीं। इन आंकड़ों में 40,434 यौन उत्पीड़न के मामले शामिल हैं , जिनसे 40,846 पीड़ित प्रभावित हुए हैं । इसके बाद गंभीर हमले और उत्पीड़न के 22,444 मामले दर्ज किए गए। 40,434 मामलों में से , 39,076 मामलों में अपराधी पीड़ितों के परिचित थे, जिनमें 3,224 मामलों में परिवार के सदस्य, 15,146 मामलों में पारिवारिक मित्र या पड़ोसी या नियोक्ता या अन्य परिचित व्यक्ति और 20,706 मामलों में मित्र या ऑनलाइन मित्र या विवाह के बहाने लिव-इन पार्टनर शामिल थे।
पीड़ितों के जनसांख्यिकीय आंकड़ों से पता चलता है कि 762 पीड़ित छह वर्ष से कम आयु के थे, 3,229 पीड़ित छह से 12 वर्ष की आयु के बीच के थे, 15,444 पीड़ित 12 से 16 वर्ष की आयु के बीच के थे और 21,411 पीड़ित 16 से 18 वर्ष की आयु के बीच के थे, जिससे बाल पीड़ितों की कुल संख्या 40,846 हो जाती है। इनमें से अधिकांश बलात्कार से संबंधित अनुभागों में शामिल लड़कियां थीं। अपहरण और अगवा करना सबसे बड़ा योगदानकर्ता बनकर उभरा है , जिसमें आईपीसी के तहत 79,884 मामले दर्ज किए गए हैं, जिनमें 82,106 बच्चे पीड़ित हुए हैं, यानी प्रति एक लाख पर 18 की दर से। इनमें से 58,927 से अधिक मामले सामान्य अपहरण के थे , जिनमें 37,844 ऐसे मामले शामिल थे जिनमें लापता बच्चों को अपहरण माना गया था। गौरतलब है कि 14,637 मामलों में नाबालिग लड़कियों का अपहरण करके उनसे जबरन शादी कराने का मामला शामिल था। आईपीसी के तहत दर्ज अन्य महत्वपूर्ण अपराधों में 1,219 हत्याएं शामिल थीं, जिनमें से 89 बलात्कार या पीओसीएसओ उल्लंघन से जुड़ी थीं; 3,050 मामूली चोट के मामले और आत्महत्या के लिए उकसाने के 373 मामले शामिल थे।











