भारत में अवैध शराब से होने वाली मौतें कोई नई घटना नहीं हैं। लगभग हर वर्ष किसी न किसी राज्य से यह खबर आती है कि दर्जनों लोग जहरीली शराब पीने से मर गए या स्थायी रूप से अपाहिज हो गए। देश भर के विभिन्न राज्यों में अवैध शराब से हजारों लोग मारे जाते है और इन मौतों के कारण के पीछे जांच में पाया जाता है कि शराब में अत्यधिक मात्रा में मेथनॉल नामक जहरीला रसायन मिला हुआ था। यह घटना केवल एक हादसा नहीं है बल्कि भारत की सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक विफलताओं का प्रतिबिंब है। दरअसल, अवैध शराब केवल कानून व्यवस्था का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह गरीबी, बेरोज़गारी, अज्ञानता और भ्रष्टाचार जैसे कई पहलुओं से जुड़ा हुआ प्रश्न है।
भारत में जिस प्रकार शराब के उत्पादन, वितरण और उपभोग पर नियंत्रण के लिए कड़े कानून बनाए गए हैं, उसी अनुपात में शराब का अवैध कारोबार भी तेजी से फैलता गया है। हूच शब्द का प्रयोग अक्सर घटिया और अवैध शराब के लिए किया जाता है। यह शब्द अलास्का की हूचिनो जनजाति से लिया गया है, जो शराब बनाने के लिए जानी जाती थी। भारत में हूच आमतौर पर छोटे-छोटे भट्टियों में बनाई जाती है, जहाँ न तो स्वास्थ्य संबंधी मानक पूरे किए जाते हैं और न ही सुरक्षा उपाय अपनाए जाते हैं। इसमें कभी-कभी औद्योगिक रसायन जैसे मेथनॉल की मिलावट कर दी जाती है, जिससे यह शराब अधिक तीव्र प्रभाव वाली हो जाती है, लेकिन साथ ही जानलेवा भी बन जाती है।
मेथनॉल स्वयं एक महत्वपूर्ण औद्योगिक रसायन है। इसका रासायनिक सूत्र CH₃OH है और इसे मिथाइल अल्कोहल या वुड स्पिरिट भी कहा जाता है। यह रंगहीन, वाष्पशील तरल है जिसकी गंध हल्की मीठी पर तीखी होती है। सामान्य परिस्थितियों में मेथनॉल का उपयोग पेंट, वार्निश, प्लास्टिक और रसायनिक पदार्थों के निर्माण में किया जाता है। इसके अतिरिक्त यह ईंधन योजक और एंटीफ्रीज़ एजेंट के रूप में भी काम आता है। लेकिन इसकी सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जहाँ यह उद्योगों के लिए उपयोगी है, वहीं इंसान के शरीर में जाने पर यह बेहद विषैला साबित होता है। मेथनॉल लीवर में टूटकर फॉर्मिक एसिड में बदलता है, जिससे रक्त का पीएच घट जाता है और शरीर में मेटाबॉलिक एसिडोसिस की स्थिति उत्पन्न होती है। इससे कोशिकाओं में ऑक्सीजन का उपयोग रुक जाता है, अंगों की कार्यप्रणाली बाधित होती है और ऑप्टिक तंत्रिका को स्थायी क्षति पहुँचती है। यही कारण है कि जहरीली शराब पीने वाले कई लोग हमेशा के लिए अंधे हो जाते हैं। गंभीर स्थिति में यह मस्तिष्क में सूजन और रक्तस्राव कराता है और अंततः कोमा या मृत्यु का कारण बन जाता है।
सरकार ने शराब और मेथनॉल के नियमन के लिए कई कानून बनाए हैं। खाद्य सुरक्षा एवं मानक (मादक पेय) विनियम 2018 शराब में मेथनॉल की सीमा तय करता है। खतरनाक रसायन निर्माण, भंडारण और आयात नियम 1989 में मेथनॉल को सूचीबद्ध किया गया है और भारतीय मानक आईएस 517 मेथनॉल की गुणवत्ता तय करता है। इसके बावजूद कानून का प्रवर्तन अक्सर कमजोर रहता है। यही वजह है कि बाजार में आसानी से मिलावटखोरी होती है और जानलेवा घटनाएँ बार-बार सामने आती हैं।
भारत में अवैध शराब त्रासदियों के कई कारण हैं। सबसे पहला कारण है गरीबी और आर्थिक विवशता। समाज का वह वर्ग जो महंगी और ब्रांडेड शराब खरीदने में सक्षम नहीं होता, अक्सर स्थानीय स्तर पर तैयार की गई सस्ती शराब का सहारा लेता है। यह शराब वैध शराब की तुलना में कई गुना सस्ती होती है क्योंकि इसमें उत्पाद शुल्क और कर चोरी की जाती है। दूसरा बड़ा कारण है मेथनॉल का दुरुपयोग। औद्योगिक उपयोग के लिए मिलने वाला यह रसायन अवैध शराब निर्माताओं के हाथों में आसानी से पहुँच जाता है और वे इसका उपयोग शराब को अधिक तगड़ा बनाने के लिए करते हैं। तीसरा कारण है कमजोर प्रवर्तन आबकारी अधिनियम 1944 और अन्य राज्य स्तरीय कानून होने के बावजूद स्थानीय स्तर पर निगरानी ढीली रहती है। जिन राज्यों में शराबबंदी लागू है, वहाँ स्थिति और भी खराब है क्योंकि लोग गुप्त रूप से शराब का उत्पादन और वितरण करने लगते हैं।
चौथा बड़ा कारण राजनीतिक संरक्षण और भ्रष्टाचार है। अवैध शराब के व्यापार में राजनीतिक और नौकरशाही गठजोड़ की भूमिका अक्सर उजागर होती रहती है। कई बार यह आरोप लगते हैं कि स्थानीय पुलिस और आबकारी अधिकारी रिश्वत लेकर आँख मूँद लेते हैं और माफिया बिना किसी भय के कारोबार करते रहते हैं। पाँचवा कारण है सामाजिक कलंक और अज्ञानता। ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में लोग नकली शराब के खतरों के बारे में पूरी जानकारी नहीं रखते। जब जहरीली शराब पीने के बाद लक्षण दिखाई देते हैं तो सामाजिक कलंक या डर के कारण लोग समय पर अस्पताल नहीं जाते और इलाज में देर हो जाती है।
इसके अतिरिक्त रिपोर्टिंग तंत्र का अभाव भी बड़ी समस्या है। स्थानीय स्तर पर लोग शराब माफियाओं से डरते हैं और पुलिस या प्रशासन को शिकायत नहीं करते। गुमनाम शिकायत की कोई मजबूत प्रणाली न होने के कारण अवैध कारोबारियों पर समय रहते कार्रवाई नहीं हो पाती। साथ ही, मेथनॉल जैसी वस्तुओं की डिजिटल ट्रैकिंग और निगरानी न होने से यह आसानी से अवैध शराब उत्पादन में पहुँच जाता है।
पिछले वर्षों में भारत ने कई बड़ी त्रासदियाँ देखी हैं। 2015 में मुंबई के मालवानी इलाके में जहरीली शराब पीने से लगभग 100 लोगों की मौत हो गई थी। 2020 में पंजाब के कई जिलों में अवैध शराब से 100 से अधिक लोग मारे गए। 2022 में बिहार के सारण जिले में शराबबंदी के बावजूद नकली शराब पीने से 40 लोगों की मौत हो गई। 2024 में तमिलनाडु के कल्लाकुरिची जिले में 50 से अधिक लोगों की जान गई। ये घटनाएँ इस बात का सबूत हैं कि अवैध शराब का संकट समय-समय पर किसी न किसी राज्य में विकराल रूप लेता है।
कानूनी दृष्टि से देखें तो आबकारी अधिनियम 1944 शराब के उत्पादन और वितरण पर नियंत्रण करता है। भारतीय न्याय संहिता 2023 में शराब से संबंधित मौतों पर हत्या और गैर-इरादतन हत्या की धाराएँ लागू होती हैं। परंतु भारत के संविधान की सातवीं अनुसूची में शराब का विनियमन राज्यों के अधिकारक्षेत्र में आता है। इसलिए अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग नीतियाँ लागू होती हैं। बिहार और गुजरात जैसे राज्यों ने पूर्ण शराबबंदी लागू की है, लेकिन वहाँ भी अवैध शराब की घटनाएँ होती रहती हैं। इसका अर्थ है कि केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसका प्रभावी प्रवर्तन और सामाजिक सहयोग भी आवश्यक है।
अवैध शराब की त्रासदियों को रोकने के लिए कई उपाय किए जा सकते हैं। सबसे पहले तो प्रवर्तन को सख्त बनाने की आवश्यकता है। केरल में ऑपरेशन मूनशाइन जैसे अभियान यह दिखाते हैं कि यदि पुलिस, आबकारी और अन्य विभाग मिलकर काम करें तो अवैध शराब भट्टियों पर नियंत्रण पाया जा सकता है। इसके अलावा मेथनॉल की ट्रैकिंग के लिए केंद्रीकृत पोर्टल की जरूरत है, ताकि इसके परिवहन और बिक्री पर नजर रखी जा सके। ब्लॉकचेन जैसी तकनीक का उपयोग कर आपूर्ति श्रृंखला को पारदर्शी बनाया जा सकता है। जीआईएस मैपिंग और सीसीटीवी निगरानी से अवैध शराब बनाने वाले स्थानों की पहचान जल्दी की जा सकती है।
दूसरा बड़ा उपाय जन-जागरूकता अभियान है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत नकली शराब और मेथनॉल विषाक्तता के खतरों के बारे में लोगों को शिक्षित करने की आवश्यकता है। पंचायतों, धार्मिक नेताओं और स्वयं सहायता समूहों को भी इस दिशा में सक्रिय किया जा सकता है। तीसरा उपाय है सुरक्षित और सस्ती शराब उपलब्ध कराना। यदि वैध शराब सस्ती होगी तो लोग अवैध शराब की ओर कम झुकेंगे।
चौथा उपाय है सामाजिक-आर्थिक सहायता। जिन परिवारों की आजीविका अवैध शराब पर आधारित है, उन्हें वैकल्पिक रोज़गार उपलब्ध कराना जरूरी है। इसके लिए कौशल विकास योजनाओं और स्वरोजगार कार्यक्रमों का सहारा लिया जा सकता है। साथ ही जहरीली शराब के शिकार लोगों के बच्चों को छात्रवृत्ति और स्वास्थ्य बीमा देना भी महत्वपूर्ण होगा। पाँचवा उपाय है पुलिस और आबकारी अधिकारियों की जवाबदेही तय करना। यदि कोई अधिकारी लापरवाह पाया जाता है तो उसके खिलाफ कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई होनी चाहिए।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कई सर्वोत्तम प्रथाएँ मौजूद हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की 2010 की रणनीति शराब के हानिकारक उपयोग को कम करने के लिए उपलब्धता को नियंत्रित करने, मूल्य निर्धारण नीतियों के माध्यम से मांग कम करने और अवैध उत्पादन पर रोक लगाने की वकालत करती है। सतत विकास लक्ष्य 3.5 भी मादक द्रव्यों के सेवन की रोकथाम और उपचार को मजबूत करने पर जोर देता है।
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि भारत में अवैध शराब से होने वाली त्रासदियाँ केवल व्यक्तिगत या पारिवारिक त्रासदी नहीं हैं, बल्कि यह एक गहरा सामाजिक और प्रशासनिक संकट है। अवैध शराब गरीबी, भ्रष्टाचार और उपेक्षा के उस चक्र का हिस्सा है जो समाज को लगातार त्रस्त कर रहा है। इस संकट से निपटने के लिए सख्त कानून, मजबूत प्रवर्तन, जन-जागरूकता, सुरक्षित विकल्प और सामुदायिक सहभागिता इन सबका सम्मिलित उपयोग करना होगा। यदि ऐसा नहीं किया गया तो आने वाले समय में भी भारत को बार-बार दर्दनाक घटनाओं का सामना करना पड़ेगा। इसलिए यह अनिवार्य है कि सरकार, समाज और नागरिक सभी मिलकर अवैध शराब के इस घातक चक्र को तोड़ने का प्रयास करें, तभी हजारों निर्दोष लोगों की जान बचाई जा सकेगी।









