महाराष्ट्र की स्थापना हुए 64 साल का वक्त गुजर गया। राज्य का गठन 1957 में हुआ था और उसके बाद 1960 में पहला विधानसभा चुनाव कराया गया था। वर्ष 1960 से लेकर वर्ष 2024 तक विधानसभा के 15 बार चुनाव हो चुके हैं। इस चुनावी सफर में राज्य की राजनीति में महिलाओं की सहभागिता बढ़ी ही है। इसके बाद भी किसी भी विधानसभा चुनाव में, किसी भी राजनैतिक दल द्वारा राज्य को महिला मुख्यमंत्री देने की इच्छा जाहिर नहीं की गई और न ही इस दिशा में कदम बढ़ाने की मंशा जाहिर की गई। ऐसा क्यों? जबकि महाराष्ट्र को देश के सबसे प्रगतिशील विचारों वाले राज्यों में माना जाता है। यहां महिला उत्थान के लिए कई आंदोलनों का प्रादुर्भाव हुआ है। इतना ही नहीं इस राज्य की महिला नेताओं ने राज्यपाल की भूमिका निभाई है और प्रतिभाताई पाटिल के रूप में राष्ट्रपति दिया है। इसलिए राजनीति में रुचि रखने व समझने वालों के जेहन में अक्सर यह सवाल उठता है कि इस राज्य को अब तक महिला मुख्यमंत्री क्यों नहीं मिली? यह सवाल महाराष्ट्र प्रगतिशील होने के दावे पर भी सवालिया निशान लगा देता है।
गौरतलब यह है कि महाराष्ट्र में अब तक जितने भी मुख्यमंत्री हुए उनमें सबसे अधिक मराठा समाज के रहे हैं। यहां की राजनीति में मराठा समाज के नेताओं का ही वर्चस्व रहा है। राज्य के पहले मुख्यमंत्री यशवंतराव चव्हाण से लेकर शरद पवार व पृथ्वीराव चव्हाण तक का इतिहास यही कहानी बताता है। वर्तमान में देवेन्द्र फडणवीस को ब्राम्हण मुख्यमंत्री के तौर पर देखा जाता है। यह भी कहा जाता है कि मराठा समाज के नेता यह चाहते ही नहीं कि राज्य की राजनीति से उनका वर्चस्व टूटे। यह भी कहा जाता है समाज की दृष्टि से भी देखें तो भले ही राज्य की राजनीति में महिलाओं ने अपनी भूमिका का विस्तार किया हो पर मुखिया नहीं बन सकीं हैं। लेकिन यह अर्धसत्य है क्योंकि माता जीजाबाई की बात हो या होल्कर वंश की अहिल्या बाई की, एक ने अपने संस्कारों के दम पर हिन्दवी स्वराज् के प्रवर्तक शिवाजी का व्यक्तित्व गढ़ा है तो वहीं अहिल्या बाई ने अपने राज्य का सफल संचालन किया है। इतिहास में और कई ऐसे उदाहरण मिलते हैं जहां महिलाओं ने अपनी जागीर का कुशलता से संचालन किया है। यानि महाराष्ट्र की महिलाओं में नेतृत्व का गुण तो कूट-कूट के भरा है, बस अवसर मिलने की देर है।
वर्तमान परिस्थियों में देखें तो 2024 के विधानसभा चुनाव 288 निर्वाचित सदस्यों में 22 महिलाएं निर्वाचित हो सदन में पहुंची और विधान परिषद में 4 महिलाएं हैं। यानि दोनों सदनों को मिलाकर 26 महिलाए विधानमंडल में हैं। इनमें से कुछ मंत्री हैं तो सुश्री नीलम गोर्हे विधान परिषद के उपसभापति की भूमिका बड़ी कुशलता निभा रही हैं। हालांकि 2019 के विधानसभा चुनाव में निर्वाचित महिला सदस्यों की संख्या 24 थी जो 2024 में घटकर कर 22 रह गई। इसके पहले 2014 में विधानसभा पहुंचने वाली महिला सदस्यों की संख्या 20 थी। चुनावों में निर्वाचित महिला सदस्यों की संख्या में घट-बढ़ होना सामान्य बात है, लेकिन राजनीतिक दलों द्वारा उनको कितनी टिकट दी जाती है, यह महत्वपूर्ण है जो हमेशा कम ही रहती है। सरसरी तौर पर देखा जाए तो महिला विधायकों संख्या 8 से 9 प्रतिशत से ऊपर नहीं रही है। इससे यह जाहिर होता है कि भले ही महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण ने की बात राजनीतिक दल करते हों, पर उस पर अमल करने से गुरेज करते हैं। इसीलिए विधानसभा चुनाव में महिला उम्मीदवारों की संख्या कम होती है। यह भी एक कारण महिला मुख्यमंत्री बनने की राह रोड़ा माना जा सकता है। लेकिन ऐसा नहीं क्योंकि जहां भी महिला मुख्यमंत्री अब तक बनी हैं वहां भी विधानसभा में कभी महिला सदस्यों की संख्या पुरुष सदस्यों से बहुत ही कम रही है।
महिला मुख्यमंत्री के चयन में समस्या
जब भी महाराष्ट्र राज्य की महिला राजनीति पर चर्चा होती है तो यह सवाल उठता ही है कि राज्य में महिला मुख्यमंत्री क्यों नहीं बन सकी या बन सकती? वहीं आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक रूप से पिछड़े राज्य असम, बिहार, उत्तरप्रदेश, ओडिशा जैसे राज्यों में भी मुख्यमंत्री पद की शोभा महिलाओं ने बढ़ाई है। फिर इस मामले में महाराष्ट्र कहां पिछड़ रहा है? इस कुछ पत्रकारों का मजाकिया लहजे में कहना था कि यह सवाल तो महाराष्ट्र के चाणक्य शरद पवार से पूछा जाना चाहिये। हालांकि यह मजाक था लेकिन बात गंभीर थी। यह सवाल उनसे पूछा जाना चाहिये था। वहीं राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जो भी महिलाएं मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंची उसके पीछे की दो वजहें हैं- पहली वजह है ताकतवर वोट बैंक उनके साथ रहा और दूसरी वजह थी उनको विधायकों का समर्थन हासिल होना। राजस्थान में वसुंधरा राजे हों या उत्तरप्रदेश में मायावती मुख्यमंत्री तभी बन सकीं तो जब उनको विधायकों का समर्थन हासिल था। इसका ताजा उदाहरण दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता हैं जिनके पीछे पार्टी और उसके विधायक खड़े थे।
दूसरी ओर महाराष्ट्र में जिस दल को बहुमत मिला उसके विधायक कभी भी किसी महिला को मुख्यमंत्री कुर्सी पर बिठाने की मानसिकता नहीं बना पाये। वर्षा गायकवाड़ हों या पंकजा मुंडे दोनों ही के नामों पर पार्टी के विधायकों ने समर्थन नहीं दिया। लिहाजा मुख्यमंत्री के लिए भले ही उनके नामों की चर्चा रही हो पर वे उस पद तक पहुंचने में कामयाब नहीं हो सकीं। महाराष्ट्र की राजनीति में अभी तक कोई महिला चेहरा नहीं उभरा जिसने पूरे राज्य में अपनी दमदार छाप छोड़ी हो या अपनी उपस्थिति दर्ज कराई हो।
पितृसत्तात्मक मानसिकता
भारतीय समाज की तरह ही मराठी समाज में पितृसत्तात्मक मानसिकता होने की बात कही जाती है। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं समाज की तरह ही महाराष्ट्र की राजनीति में भी पुरुष प्रधान या पितृसत्तात्मक मानसिकता का प्रभाव है। राज्य के चाणक्य कहे जाने वाले शरद पवार चार बार मुख्यमंत्री पद पर आसीन रह चुके हैं। जब तक केन्द्र की राजनीति में नहीं गये तब तक वे किसी और का नाम मुख्यमंत्री के लिए कभी आगे नहीं बढ़ाया। कांग्रेस से अलग होने के बाद उनकी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी सत्ता में सदा बी टीम बनकर रही। लेकिन राजनीतिक जानकारों का कहना है कि कांग्रेस में रहते हुए हमेशा सत्ता के सूत्र अपने हाथ में रखने के महत्वाकांक्षी रहे हैं। कांग्रेस से बगावत करने के बाद तो वे स्थिति में नहीं थे कि अपने परिवार के किसी व्यक्ति को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठा सकें। यदि उनकी पार्टी के पास विधायकों का शक्तिबल होता तो सुप्रिया सुले को जरूर मुख्यमंत्री के आसन तक पहुंचाते। इस संबंध में राज्य की वरिष्ठ पत्रकार अलका धूपकर ने कहीं चर्चा में या किसी लेख में यह बात कही थी कि हमारे राजनेता न तो इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हैं और न ही महिलाओं के प्रतिनिधित्व की बात को महत्व देते हैं। उनका कहना था कि कोई माने या न माने पर पितृसत्तात्मक और सामंती मानसिकता का मुद्दा अहम है जिसके कारणों से महिलाएं राजनीतिक मुक़ाबले में हमेशा पीछे रह जाती हैं। आज भी महिलाओं को ज्यादा टिकट नहीं दिए जाते। आज भी जो महिला नेता हैं उन्हें महिला उत्पीड़न और महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर ही बोलने के लिए आगे किया जाता है। महत्वपूर्ण मुद्दों पर वे पार्टी के मंच पर नहीं होतीं। अगर सुप्रिया सुले पवार परिवार से नहीं होतीं तो क्या उन्हें अब अपनी पार्टी में इतना महत्व मिलता? उनका यह सवाल बहुत कुछ कहता है और राजनीतिक परिदृश्य की ओर इशारा करता है। यदि हम राज्य विधानसभा चुनाव में महिला उम्मीदवारों की संख्या पर नजर डालें तो अलका धूपकर जी की बातों में दम दिखता है। 2009 के विधानसभा चुनाव में कुल 3559 उम्मीदवारों में 211 महिला उम्मीदवार थीं। वहीं 2014 में 4119 उम्मीदवारों में से 277 महिलाएं और 2019 के विधानसभा चुनाव में 3237 उम्मीदवारों में से 237 महिलाएं थीं। इसी तरह 2024 के विधानसभा चुनाव में भी 4136 उम्मीदवारों में से 363 महिलाएं चुनावी मैदान में थीं जिनमें से मात्र 22 ही निर्वाचित हो सकीं।
इन आंकड़ों की पृष्ठभूमि में देखा जाए तो सभी राजनीतिक दल भले ही नारी को सशक्त बनाने की बात करते हों पर जब उस पर अमल करने की बात आती है तो सभी का एक-सा रवैया रहता है। महिला आरक्षण विधेयक भी वरिष्ठ नेताओं के दोहरे रवैये के कारण ही दशकों अटका रहा है। वर्तमान की मोदी सरकार ने 2023 में महिला आरक्षण विधेयक संसद के दोनों सदनों में पास तो करा लिया था लेकिन उस पर अमल कब से किया जाएगा, यह अब तक तय नहीं है। इस विधेयक के अमल में आने के बाद कम से कम हर राजनीतिक दल को 33 प्रतिशत महिलाओं को टिकट देना ही होगा। हो सकता है तब महाराष्ट्र की राजनीति में किसी सशक्त महिला का प्रादुर्भाव हो और राज्य को पहली महिला मुख्यमंभी मिल सके। बहरहाल यह संभावना भविष्य के गर्भ में समाहित है क्योंकि राजनीतिक दलों में महिला मुख्यमंत्री बनाने को लेकर कोई चर्चा नहीं है या यूं कह सकते हैं कि सकारात्मक रुख नहीं दिखाई देता है।
गौर करने वाली बात यह भी है कि महाराष्ट्र को सामाजिक व सांस्कृतिक तौर भले ही जागरुक और सजग माना जाता हो। लेकिन सरकार में मुख्यमंत्री पद के अलावा विभागों के बंटवारे में भी भेदभाव साफ नजर आता है। महत्वपूर्ण विभागो/मंत्रालयों से महिलाओं को दूर रखा जाता है। गृह, वित्त, शहरी विकास, सार्वजनिक कार्य जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय हमेशा पुरुषों के पास ही रहे हैं। अपवाद स्वरूप शालिनीताई पाटिल का उदाहरण मिलता है जिनको ए.आर. अंतुले के मंत्रिमंडल में राजस्व जैसा महत्वपूर्ण विभाग दिया गया था। वरना महिला मामलो, पर्यचन जैसे कम महत्व के विभाग ही उनके हिस्से आते हैं।
ऐसा नहीं है कि महाराष्ट्र में महिला राजनेताओं की कमी रही है। यह जाहिर इतिहास है कि वर्ष 1990 तक महाराष्ट्र की राजनीति में मुख्य रूप से कांग्रेस का ही दबदबा रहा है। प्रतिभा पाटिल, प्रभा राव, शालिनीताई पाटिल और प्रेमला चव्हाण का नाम 1960 से 1990 के बीच राज्य की राजनीति में अग्रणी महिला नेताओं के रूप में लिया जाता है। कभी कभार प्रतिभाताई पाटिल व राज्य कांग्रेस की अध्यक्ष रहीं प्रभा राव को मुख्यमंत्री बनाने की चर्चा जूरूर रही पर पार्टी नेतृत्व व विधायकों का समर्थन न मिलने के कारण वे उस मुकाम तक नहीं पहुंच सकीं। इस संबंध में राजनीति पर नजर रखने वालों का कहना है कि महाराष्ट्र में यह आम धारणा रही है कि जो भी स्थानीय सहकारी समितियों को नियंत्रित करेगा, वह उस क्षेत्र की राजनीति में हावी रहेगा। ध्यान रहे कि जिला स्तर पर प्राथमिक क्रय-विक्रय संघो, जिला बैंकों, चीनी कारखानों, कपास मिलों जैसी विभिन्न सहकारी समितियों में महिलाओं की संख्या नगण्य थी। इसीलिए राज्य की राजनीति में भी उनका दबदबा कम ही रहा है। यहा कारण है कि प्रभा राव या प्रतिभा पाटिल राज्य की राजनीति में अग्रणी होने के बाद भी सहकारी समितियों पर उनका वर्चस्व नहीं था। इसलिए भी वह मुख्यमंत्री पद तक नहीं पहुंच सकीं।
एक बार कांग्रेस नेता यशोमति ठाकुर ने कहा था कि महिला राजनेताओं को राजनीति में अपनी जगह बनाने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ता है। उन्होंने एक पत्रकार से यह भी कहा था कि हाल ही में पहली बार एक महिला को मुख्य सचिव नियुक्त किया गया था और लोगों ने उसकी आलोचना भी की। मुझे भी अपनी पार्टी के भीतर संघर्ष करना पड़ता है। मेरे विधायक बनने के बाद भी मेरी तस्वीर बैनर पर नहीं लगाई जाती। बहुत संघर्ष करना पड़ा क्योंकि मैं एक महिला हूं। उनके उक्त कथन से ही उनकी पीड़ा झलकती है। फिलहाल, महाराष्ट्र की राजनीति में जब भी महिला मुख्यमंत्री पद की चर्चा शुरू होती है तो सबसे पहले राकांपा से सुप्रिया सुले, भाजपा से पंकजा मुंडे, शिवसेना से रश्मि ठाकरे और कांग्रेस से वर्षा गायकवाड़ या यशोमती ठाकुर जैसी नेताओं का नाम लिया जाता है। ये सब अपने पिता की राजनीतिक विरासत को लेकर आगे बढ़ रही हैं। लेकिन इस सत्य को भी नहीं नकारा जा सकता है उक्त नेताओं में सिर्फ सुप्रिया सुले ही अपनी पार्टी में निर्णय भूमिका में नजर आती हैं। राज्य में किसी भी पार्टी की टिकट वितरण समिति या चुनाव प्रबंधन समिति में या किसी गठबंधन की बैठक में महिला नेत्रियां नजर नहीं आती हैं। इसका कारण क्या है? इस सवाल का उत्तर तो राजनीतिक दलों के कर्ताधर्ता ही दे सकते हैं। राजनेताओं से परे जनता की बात करें तो राज्य के मतदाताओं का सवाल यही है कि महाराष्ट्र को महिला मुख्यमंत्री कब मिलेगी। खासकर के महिला मतदाता इस विषय पर ज्यादा मुखर हैं। उनका तो कहना है कि महाराष्ट्र की राजनीति में जिस तरह से पुरुष हावी है उसको देखते हुए फिलहाल महिला मुख्यमंत्री निकट भविष्य में तो मिलने रही। हां, किसी जोड़-तोड़ के तहत यदि शरद पवार को मौका मिला तो वे अपनी बेटी सुप्रिया सुले को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठा सकते हैं जिनका भविष्य तय करने के लिए वे 84 साल की उम्र में भी सक्रिय हैं।
–राजेश नामदेव (पत्रकार-लेखक )











