शिवसेना और चिन्ह विवाद — 2014 और 2019 का चुनाव भी गलत
लोकवाहिनी, संवाददाता
नई दिल्ली। शिवसेना किसकी? धनुष-बाण चुनाव चिन्ह किसका? इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है। ठाकरे गुट के वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल दलीलें रख रहे हैं। सिब्बल ने करारा तर्क देते हुए शिंदे गुट द्वारा पार्टी तोड़ने की योजना का खुलासा किया है। साथ ही उन्होंने कहा कि एकनाथ शिंदे को उद्धव ठाकरे ने ही नेता नियुक्त किया था। शिंदे को ठाकरे ने ही अपने मंत्रिमंडल में मंत्री बनाया था। ठाकरे ने ही शिंदे को चुनाव लड़ने के लिए एबी फॉर्म दिए थे, फिर यह कैसे कहा जा सकता है कि उद्धव ठाकरे पार्टी अध्यक्ष नहीं हैं? शिंदे शिवसेना पर अपना दावा कैसे कर सकते हैं? कपिल सिब्बल ने सीधा सवाल उठाते हुए तर्क दिया। उन्होंने यह भी दावा किया कि एकनाथ शिंदे द्वारा पार्टी तोड़कर बनाई गई सरकार ही अवैध थी। इसी तरह विधिमंडल दल और राजनीतिक दल अलग-अलग हैं।
विधिमंडल सदस्यों की संख्या के आधार पर राजनीतिक दल पर कार्रवाई नहीं की जा सकती। कपिल सिब्बल ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में जोरदार दलीलें दीं। उन्होंने कहा कि जब तक पार्टी एबी फॉर्म नहीं देती, तब तक कोई व्यक्ति पार्टी का आधिकारिक उम्मीदवार नहीं बन सकता। चुनाव लड़ने के लिए कोई भी आवेदन दाखिल कर सकता है। लेकिन एबी फॉर्म के बिना उसे पार्टी की मान्यता नहीं मिलती। राजनीतिक दल संगठन में नियुक्तियां करते हैं, राज्यभर में पदाधिकारी नियुक्त करते हैं और उम्मीदवारों को टिकट भी देते हैं, इसलिए पार्टी में संगठन सबसे ऊपर आता है। यह कहते हुए कपिल सिब्बल ने दलील दी कि अगर चुनाव आयोग कहता है कि 2013 और 2018 का संविधान गलत था, तो 2014 और 2019 का चुनाव भी गलत था। चुनाव आयोग द्वारा एकनाथ शिंदे को पार्टी सौंपने के फैसले को देखते हुए सिब्बल का यह बड़ा बयान माना जा रहा है। जिन विधायकों ने शिवसेना छोड़ी, उन सभी विधायकों को अयोग्य ठहराया जाना चाहिए। यह सिर्फ फूट है, मर्जर नहीं, यह साफ दिखाई देता है। राष्ट्रीय कार्यकारिणी, उसके बाद प्रतिनिधि और फिर सदस्य आते हैं। पार्टी की संरचना में विधायक दल सबसे बड़ा नहीं होता। कुल मिलाकर यह मामला एक बड़ी गलती है, ऐसा दावा भी सिब्बल ने किया।
आज फिर होगी सुनवाई
इस बीच, कल दोपहर दो बजे इस मामले पर फिर सुनवाई होगी। शिवसेना ठाकरे गुट की ओर से सिब्बल ही एक बार फिर दलीलें पेश करेंगे। इसलिए गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में क्या होगा, इस पर पूरे राज्य की नजरें टिकी हैं।
भाजपा ने गलत तरीके से सरकार गिराई
2019 से 2022 तक मैं नाराज हूं, ऐसा किसी ने नहीं कहा था। फिर ये बातें अचानक कैसे सामने आईं? संसदीय लोकतंत्र में व्हिप का महत्व है। अगर व्हिप को नहीं माना गया तो अयोग्यता की कार्रवाई हो सकती है। जो घटनाएं हुईं, वे लोकतंत्र पर हमला हैं। 10वीं अनुसूची के अनुसार जो प्रक्रिया होनी चाहिए थी, वह यहां नहीं हुई। मीडिया में आई खबरों के अनुसार भाजपा ने गलत तरीके से सरकार गिराई है। विधानसभा उपाध्यक्ष ने सभी विधायकों को नोटिस भेजे थे। उन्होंने उसका जवाब नहीं दिया, इस ओर भी सिब्बल ने कोर्ट का ध्यान आकर्षित किया।
लेकिन कोई फैसला नहीं हुआ इस दौरान कोर्ट ने सिब्बल को दलील रखने के लिए और 15 मिनट दिए। कोर्ट ने कहा, अगर आपको चाहिए तो दलील के लिए और 15 मिनट ले सकते हैं। इस पर सिब्बल ने कहा कि मुझे निश्चित रूप से बोलना पसंद होगा। सरकार बनी, नई चुनाव प्रक्रिया हुई।











