एडिनबर्ग। दुनियाभर में प्रवासियों को खतरनाक और अमानवीय तरीकों से निर्वासित किया जा रहा है और यह अब धीरे-धीरे सामान्य प्रक्रिया बनती जा रही है। एडिनबर्ग विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं एंडोनिया जॉन डिक्सन, सेट्टा मेनवारिंग और थॉम टायरमैन ने अपनी ताज़ा रिपोर्ट में बताया कि अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप में प्रवासियों को हिरासत में लेकर “तीसरे देशों” में भेजने की नीतियां तेजी से लागू की जा रही हैं, जिनमें उनके मानवाधिकारों की कोई गारंटी नहीं है।
अमेरिका: आक्रामक प्रवासी नीति
पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका ने गैर-नागरिकों को हिरासत में लेने और निर्वासित करने की अपनी नीतियों का खतरनाक विस्तार किया। हाल के वर्षों में प्रशासन ने कई “तीसरे देशों” के साथ समझौते किए, जिनसे निर्वासित प्रवासियों का कोई पुराना संबंध नहीं होता। ऐसे देशों में भेजे गए प्रवासियों की सुरक्षा और मानवाधिकारों की कोई गारंटी नहीं होती।
शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि यह केवल प्रवासियों का निर्वासन नहीं, बल्कि उनके अपराधीकरण और दंडात्मक कार्रवाई का हिस्सा बन गया है। अब शरण मांगने को भी अपराध माना जाने लगा है।
ऑस्ट्रेलिया: गुप्त समझौते और छोटे द्वीपों का प्रयोग
ऑस्ट्रेलिया की लेबर सरकार ने हाल ही में नाउरू के साथ गुप्त समझौता किया, जिसके तहत इस छोटे माइक्रोनेशियाई द्वीप को अगले तीन दशकों में 2.5 अरब ऑस्ट्रेलियाई डॉलर की गारंटी दी गई ताकि निर्वासित प्रवासियों को वहां आश्रय दिया जा सके।
शोधकर्ताओं के अनुसार, इस तरह के समझौते प्रवासियों को उनके मूल देश या स्थानीय सामाजिक संबंधों से अलग कर, पूरी तरह असुरक्षित स्थिति में छोड़ देते हैं।
ब्रिटेन: कथनी और करनी में विरोधाभास
ब्रिटेन में प्रधानमंत्री केयर स्टार्मर की लेबर पार्टी ने चुनाव से पहले रवांडा में प्रवासियों को भेजने की योजना को “मृत और दफन” बताया था। लेकिन सत्ता में आने के बाद 2024 में लगभग 35,000 लोगों को निर्वासित किया गया, जो पिछले साल की तुलना में 25% अधिक था।
साथ ही, दक्षिणपंथी ‘रिफॉर्म पार्टी’ ने अगले आम चुनाव में सत्ता हासिल होने पर हजारों प्रवासियों को सैन्य ठिकानों में रखकर सामूहिक निर्वासन की योजना भी पेश की है।
यूरोप में भी बढ़ते रुझान
मई 2025 में यूरोपीय आयोग ने प्रस्ताव रखा कि ईयू देश शरणार्थियों को उन देशों में भेज सकते हैं जिनसे उनका कोई पूर्व संबंध नहीं है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह नीति अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के मॉडल से मेल खाती है और प्रवासियों के अधिकारों के लिए एक गंभीर चुनौती पेश करती है।
क्या यह नया है?
इतिहास में प्रवासियों का निर्वासन कोई नई बात नहीं है। ब्रिटिश उपनिवेशवादी नीतियों का ऑस्ट्रेलिया में निर्वासन उदाहरण इस बात का गवाह है।
लेकिन आज जो हो रहा है, वह सिर्फ निर्वासन नहीं है। यह प्रवासियों का अपराधीकरण और उनके खिलाफ दंडात्मक व्यवस्था का विस्तार है। शरण मांगना अब मानवाधिकार का हिस्सा नहीं, बल्कि अपराध के रूप में चित्रित किया जा रहा है।
“अवैध” की लेबलिंग और मानवाधिकार हनन
अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे लोकतांत्रिक देशों में भी सरकारें शरण चाहने वाले प्रवासियों को “अवैध” करार देकर हिरासत में ले रही हैं और उन्हें तीसरे देशों में भेज रही हैं।
शोधकर्ताओं का कहना है कि यह प्रवासियों की पीड़ा और असुरक्षा को सामान्य बनाने का तरीका है। अमानवीय निर्वासन को केवल राजनीतिक और प्रशासनिक दृष्टिकोण से जायज़ ठहराना वैश्विक लोकतंत्र के लिए एक खतरनाक संकेत है।
दुनियाभर में प्रवासन नीतियों का यह खतरनाक रुझान यह संकेत देता है कि मानवाधिकारों और मानवीय मूल्यों को नजरअंदाज करते हुए प्रवासियों का दमन एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया बनता जा रहा है। अब सवाल यह है कि क्या समाज इसे स्वीकार कर लेगा, या इसे चुनौती दी जाएगी।








