नयी दिल्ली: उच्चतम न्यायालय 27 अक्टूबर को जाली दस्तावेजों और साइबर धोखाधड़ी से प्रभावित ‘डिजिटल अरेस्ट’ पीड़ितों के स्वतः संज्ञान वाले मामले की सुनवाई करेगी। यह सुनवाई न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ के समक्ष होगी।
न्यायालय ने 17 अक्टूबर को सुनवाई के दौरान कहा था कि दस्तावेजों की जालसाजी, साइबर जबरन वसूली और निर्दोष नागरिकों, विशेषकर वरिष्ठ नागरिकों की साइबर गिरफ्तारी जैसी घटनाओं पर राष्ट्रीय स्तर पर कड़ी कार्रवाई की आवश्यकता है। शीर्ष अदालत ने इस मामले में केंद्र, सीबीआई और संबंधित राज्य पुलिस से जवाब मांगा है।
हरियाणा के अंबाला में 73 वर्षीय वरिष्ठ नागरिक दंपति के मामले ने इस अपराध की गंभीरता उजागर की थी। अपराधियों ने न्यायालय और जांच एजेंसियों के फर्जी आदेशों के माध्यम से दंपति से 1.05 करोड़ रुपये जबरन वसूल किए थे। पीठ ने इस बात पर चिंता जताई कि धोखेबाजों ने उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय के नाम का बेशर्मी से दुरुपयोग किया।
अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणि को भी इस मामले में सहायता के लिए बुलाया गया है। न्यायालय ने देशभर में ‘डिजिटल अरेस्ट’ की बढ़ती घटनाओं की ओर ध्यान दिलाया और कहा कि ऐसे अपराध न्यायिक प्रणाली और जनता के विश्वास को कमजोर करते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, ‘डिजिटल अरेस्ट’ एक ऐसा अपराध है जिसमें धोखेबाज आभासी प्लेटफॉर्म पर खुद को सरकारी अधिकारी या कानून प्रवर्तन का प्रतिनिधि दिखाकर लोगों को डराते हैं और उनसे पैसे या संवेदनशील जानकारी मांगते हैं।










