जालना/बीड़। महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र में परभणी और बीड़ जिले के किसानों की स्थिति अत्यंत चिंताजनक बनी हुई है। पिछले सप्ताहांत में छह किसानों ने आत्महत्या कर ली, जिससे राज्य सरकार और प्रशासन पर सवाल खड़े हो गए हैं। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) की महाराष्ट्र इकाई के अध्यक्ष शशिकांत शिंदे ने सोमवार को कहा कि बाढ़ और भारी बारिश से फसलें बर्बाद होने के बावजूद राज्य सरकार ने केंद्र से राहत पैकेज की मांग नहीं की।
शिंदे ने संवाददाताओं से कहा, “राज्य सरकार ने अब तक केंद्रीय राहत पैकेज के लिए कोई प्रस्ताव प्रस्तुत नहीं किया है। पिछले सप्ताहांत में परभणी-बीड क्षेत्र में छह किसानों ने आत्महत्या कर ली। बाढ़ से भारी नुकसान झेलने वाले किसानों को तत्काल सहायता देने में देरी हुई है।” उन्होंने आरोप लगाया कि किसानों को ठगने वाली चीनी मिलों को राज्य सरकार संरक्षण दे रही है, जिससे किसान और अधिक आर्थिक संकट में हैं।
महाराष्ट्र के कई हिस्सों में, विशेषकर मराठवाड़ा में, 20 सितंबर के बाद लगातार कई दिनों तक भारी बारिश हुई, जिससे हजारों हेक्टेयर कृषि भूमि जलमग्न हो गई और फसलें पूरी तरह नष्ट हो गईं। किसान हताश हैं और अपनी आजीविका खोने की स्थिति में हैं। बीड़ जिले में पिछले दो महीनों में 25 किसानों ने आत्महत्या कर ली, जबकि 1 जनवरी 2025 से अब तक यह संख्या 187 तक पहुंच चुकी है।
बीड़ तहसील के पांगर बावड़ी गांव में 65 वर्षीय गहिनीनाथ सोपान पवार ने अपनी फसल और बढ़ते कर्ज के दबाव से आत्महत्या कर ली। उनकी बहू प्रियंका पवार ने बताया कि पिछले तीन वर्षों से बैंक कर्ज चल रहा था, जिसे हर साल रिफाइनेंस किया जाता था। इस साल बारिश और फसल बर्बादी ने स्थिति इतनी कठिन कर दी कि उनका पति आत्मघाती कदम उठाने को मजबूर हो गया। प्रियंका ने कहा, “हमने उन्हें समझाने की पूरी कोशिश की, लेकिन जब उम्मीद की कोई किरण नहीं बची, तो उन्होंने वही किया जो उनकी मजबूरी थी।”
किसानों की ओर से सरकार से यह मांग की जा रही है कि:
- प्रभावित किसानों के कर्ज तुरंत माफ किए जाएं।
- प्रभावित परिवारों को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जाए।
- बाढ़ और बारिश से बर्बाद हुई फसलों के लिए उचित मुआवजा दिया जाए।
- भविष्य में मॉनसून और प्राकृतिक आपदाओं के लिए विशेष राहत पैकेज तैयार किया जाए।
शिंदे और अन्य राकांपा नेताओं का कहना है कि महाराष्ट्र सरकार की अनदेखी और देर से राहत देने की नीति इस संकट को और गंभीर बना रही है। किसानों को न केवल प्राकृतिक आपदा का सामना करना पड़ रहा है, बल्कि सरकारी लापरवाही और प्रशासनिक देरी ने उनकी हताशा और बढ़ा दी है।
राज्य और केंद्र दोनों पर दबाव बढ़ते जा रहे हैं कि वे किसानों की जान और आजीविका को बचाने के लिए तत्काल कदम उठाएं, अन्यथा मराठवाड़ा क्षेत्र में किसानों की आत्महत्याओं का सिलसिला जारी रहेगा।








