मुंबई। महाराष्ट्र सरकार ने निर्माण परियोजनाओं में कृत्रिम रेत यानी एम-सैंड (Artificial Sand / Manufactured Sand) के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए नई नीति को अंतिम रूप दे दिया है। सरकार ने इस संबंध में आधिकारिक आदेश जारी करते हुए जिला कलेक्टरों को अब 100 एम-सैंड यूनिट्स की मंजूरी देने का अधिकार सौंप दिया है, जो पहले 50 यूनिट तक सीमित था। राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले ने मंगलवार को सभी जिलाधिकारियों को पत्र भेजकर नीति के तत्काल कार्यान्वयन के निर्देश जारी किए। उन्होंने कहा कि मानक संचालन प्रक्रिया लागू होने के बाद अब नीति के क्रियान्वयन में किसी तरह की बाधा नहीं रहेगी।
नई नीति के तहत राज्य सरकार सार्वजनिक और निजी दोनों तरह की भूमि पर एम-सैंड निर्माण इकाइयों के लिए उपयुक्त स्थानों की जानकारी जुटा रही है। यह भूमि नीलामी के लिए ‘महाखनिज’ पोर्टल पर उपलब्ध कराई जाएगी। सरकार ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि निर्धारित शर्तों का उल्लंघन करने वाली इकाइयों के लाइसेंस स्थायी रूप से रद्द कर दिए जाएंगे। सरकार का दावा है कि आने वाले वर्षों में नदियों से रेत खनन को पूरी तरह रोकने की दिशा में यह कदम बेहद महत्वपूर्ण साबित होगा। प्राकृतिक रेत की कमी, अवैध खनन और पर्यावरणीय नुकसान को ध्यान में रखते हुए राज्य ने यह पहल की है ताकि निर्माण उद्योग को रेत की निर्बाध आपूर्ति मिल सके और साथ ही पारिस्थितिकी की भी रक्षा हो।
कृत्रिम रेत जिसे एम-सैंड कहा जाता है, ग्रेनाइट, बेसाल्ट या अन्य कठोर पत्थरों को क्रश कर नियंत्रित कण आकार में तैयार की जाती है। इसका उपयोग भवन निर्माण में प्राकृतिक नदी की रेत के विकल्प के रूप में तेजी से बढ़ रहा है। एम-सैंड की खासियत यह है कि यह एक समान गुणवत्ता के साथ कंक्रीट को बेहतर मजबूती और अधिक स्थायित्व प्रदान करती है। इसके उत्पादन को प्रोजेक्ट साइट या उसके नजदीक भी स्थापित किया जा सकता है, जिससे आपूर्ति सुचारू रहती है और परिवहन लागत में भी कमी आती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह परिवर्तन निर्माण क्षेत्र में तकनीकी सुधार के साथ-साथ पर्यावरण सुरक्षा के लिए एक बड़ा कदम है।
महाराष्ट्र की यह नीति उन राज्यों के लिए मिसाल बन सकती है जहां प्राकृतिक रेत के स्रोत तेजी से खत्म हो रहे हैं और अवैध खनन एक गंभीर समस्या बना हुआ है। सरकार का लक्ष्य है कि एक ओर निर्माण कार्यों में तेजी आए और दूसरी ओर नदी और पर्यावरण को राहत मिले। अब यह देखना होगा कि नीति लागू होने के बाद एम-सैंड यूनिट्स किस गति से बढ़ते हैं और क्या यह पहल अवैध रेत खनन पर प्रभावी रोक लगा पाएगी।








