फैसला | फुटपाथ पर राहगीरों का हक सबसे पहले : सुप्रीम कोर्ट
लोकवाहिनी, संवाददाता
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सड़कों पर पैदल चलने वालों की सुरक्षा और अधिकारों को लेकर फैसला सुनाया। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट कहा है कि फुटपाथ पर चलना नागरिकों का मौलिक अधिकार है और इस अधिकार को मोटर वाहनों की आवाजाही पर प्राथमिकता मिलेगी। अदालत ने कहा कि सुरक्षित और स्पष्ट रूप से चिह्नित फुटपाथ उपलब्ध कराना सरकार और स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी है। यह फैसला एक सड़क हादसे से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान आया, जिसमें स्कूल जा रहे पांच वर्षीय बच्चे की मौत हो गई थी। न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति ए. एस. चंदूरकर की पीठ ने कहा कि पैदल चलने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19(1)(d) के तहत मिले आवागमन के अधिकार का हिस्सा है।
अदालत ने कहा कि यह अधिकार अनुच्छेद 21 यानी जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से भी जुड़ा हुआ है। पीठ ने साफ कहा कि सड़क पर चलने का सबसे पहला अधिकार पैदल यात्रियों का है और फुटपाथ उनके लिए सुरक्षित तथा संरक्षित होने चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि सड़क है तो उसके साथ सुरक्षित और स्पष्ट रूप से चिह्नित फुटपाथ भी होना चाहिए। अदालत के अनुसार शहरी विकास प्राधिकरण, नगर निगम, नगर पालिकाएं और पंचायतें फुटपाथ बनाने, उनकी देखरेख करने और उन्हें अतिक्रमण से मुक्त रखने के लिए जिम्मेदार हैं। अदालत ने कहा कि पैदल चलना जीवन का अभिन्न हिस्सा है, इसलिए इस बुनियादी सुविधा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि यदि किसी नागरिक के फुटपाथ पर सुरक्षित चलने के अधिकार का उल्लंघन होता है तो वह संवैधानिक और कानूनी उपायों का सहारा ले सकता है। ऐसे मामलों में संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई और मुआवजे की मांग भी की जा सकती है।
■ बंगाल मतदाता सूची विवाद पर अदालत सख्त
पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसईआर) के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने एक वरिष्ठ वकील की याचिका पर सुनवाई करते हुए अपीलीय न्यायाधिकरण को निर्देश दिया कि वह मामले का जल्द निपटारा करे। अदालत ने कहा कि पहली नजर में याचिकाकर्ता पश्चिम बंगाल के वास्तविक निवासी प्रतीत होते हैं। इस टिप्पणी के बाद मतदाता सूची संशोधन प्रक्रिया और उससे जुड़े विवाद एक बार फिर चर्चा में आ गए हैं। मामला 75 वर्षीय एक वकील से जुड़ा है, जिनका नाम विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से हटा दिया गया था। याचिकाकर्ता के वकील ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वह पिछले करीब 50 वर्षों से वकालत कर रहे हैं और एसईआर से पहले वैध मतदाता थे। नाम हटाए जाने के खिलाफ उन्होंने अपीलीय न्यायाधिकरण में अपील दायर की थी, लेकिन उस पर अब तक फैसला नहीं हुआ है। इसी के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।











