नई दिल्ली। सोशल मीडिया पर अक्सर ऐसे वीडियो वायरल होते हैं, जिसमें सेना की वर्दी पहने व्यक्ति आपको नींद जल्दी लाने की तकनीक सिखा रहा होता है। दावा किया जाता है कि इस पद्धति को अपनाने से सिर्फ दो मिनट में नींद आ सकती है। लेकिन क्या यह सच में संभव है? विशेषज्ञों का कहना है कि यह उम्मीद पूरी तरह वास्तविक नहीं है, हालांकि तकनीक कुछ हद तक लाभकारी हो सकती है।
सेना में अपनाई जाने वाली नींद तकनीक का मुख्य उद्देश्य सैनिकों को किसी भी वातावरण में जल्दी नींद लेने के लिए प्रशिक्षित करना है। इस तकनीक की प्रमुख तीन स्टेप्स हैं:
- प्रोग्रेसिव मसल रिलेक्सेशन (PMR): चेहरे की मांसपेशियों से शुरू करके कंधों, बाजुओं, छाती और पैरों की मांसपेशियों को क्रमशः आराम देना।
- कंट्रोल्ड ब्रीदिंग: धीमी और नियंत्रित सांस लेना और लंबी सांस छोड़ने पर ध्यान केंद्रित करना।
- विजुअलाइजेशन: शांत वातावरण की कल्पना करना, जैसे किसी शांत पानी में तैरना या खुले मैदान में लेटना।
विशेषज्ञ डीन जे. मिलर (सीक्यू विश्वविद्यालय, ऑस्ट्रेलिया) के अनुसार, सेना की तकनीक और अनिद्रा से निपटने वाली संज्ञानात्मक व्यवहार थेरेपी (CBT-I) में कई समानताएं हैं। दोनों में स्लीप रेस्ट्रिक्शन जैसी पद्धति शामिल होती है, जिससे नींद की गुणवत्ता बढ़ाई जाती है। वहीं, मानसिक अनुशासन और नकारात्मक विचारों को नियंत्रित करने की तकनीक भी मिलती-जुलती है।
लेकिन सेना की तकनीक का वातावरण और प्रशिक्षण आम लोगों से बहुत अलग है। सैनिकों को कठिन परिस्थितियों में मानसिक अनुशासन और शरीर की आदत डालने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। ऐसे में आम जीवन में दो मिनट में नींद आने की संभावना कम है।
विशेषज्ञों का कहना है कि आमतौर पर 10–20 मिनट में नींद आना सामान्य माना जाता है। केवल आठ मिनट या उससे कम में सोना असामान्य है और दिन में अत्यधिक थकान या नींद आने का संकेत हो सकता है।
सेना की नींद तकनीक निश्चित रूप से तनाव और अनियमित दिनचर्या के बीच नींद की गुणवत्ता सुधारने में मदद कर सकती है, लेकिन दो मिनट में सो जाने का दावा ज्यादातर सामान्य परिस्थितियों में वास्तविक नहीं है। इस तकनीक को अपनाने वाले लोग धीरे-धीरे मांसपेशियों और मानसिक अनुशासन की मदद से जल्दी नींद में जाने में सक्षम हो सकते हैं, लेकिन इसमें धैर्य और अभ्यास की आवश्यकता है।








