(वंदना हरि महतो) आज का दौर बहुत तेज है। खबरें अखबारों में अगले दिन छपती हैं, लेकिन अब एक बयान कुछ ही मिनटों में पूरे देश में फैल जाता है। सोशल मीडिया ने हर इंसान को बोलने का मंच दिया है। यह अच्छी बात भी है, लेकिन इसके साथ एक नई समस्या भी पैदा हुई है वह है अधूरी बातों पर पूरा फैसला सुनाना। हाल ही में भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की एक टिप्पणी को लेकर ‘कॉकरोच’ शब्द चर्चा में आ गया। यह कॉकरोच जनता पार्टी का पूरा विवाद 15 मई को हुई एक सुनवाई के बाद शुरू हुआ। उस दौरान फर्जी लॉ डिग्री धारकों से जुड़े मामले की सुनवाई में कथित तौर पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने ‘कॉकरोच’ शब्द का इस्तेमाल किया था।
चीफ जस्टिस की ‘कॉकरोच’ टिप्पणी सोशल मीडिया पर वायरल हो गई थी। इसके बाद देखते ही देखते ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ नाम से ऑनलाइन कैंपेन और मीम्स वायरल होने लगे। शुरुआत में यह केवल एक ऑनलाइन व्यंग्य अभियान था, लेकिन धीरे-धीरे यह युवाओं के गुस्से और डिजिटल विरोध का प्रतीक बन गया। इस प्लेटफॉर्म ने मीम्स, व्यंग्य और राजनीतिक टिप्पणियों के जरिए बेरोजगारी, पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था जैसे मुद्दों को उठाना शुरू किया। सोशल मीडिया पर यह अभियान खास तौर पर 90s के मिलेनियल्स और 2000s के जेन-जी के बीच तेजी से लोकप्रिय हुआ। बताया गया कि इंस्टाग्राम पर इस प्लेटफॉर्म के 2.2 करोड़ से ज्यादा फॉलोअर्स हो चुके हैं। हालांकि, अगले ही दिन मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने बयान जारी कर कहा था कि मीडिया के कुछ हिस्सों को लेकर उनकी बात को गलत तरीके से पेश किया। जस्टिस सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि उनकी टिप्पणी उन लोगों के संदर्भ में थी, जो कथित तौर पर ‘फर्जी और नकली डिग्री’ के जरिए कानूनी पेशे में प्रवेश कर रहे हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि देश के युवाओं के प्रति उनके मन में पूरा सम्मान और चिंता है।
सोशल मीडिया पर कई लोगों ने इसे युवाओं का अपमान बताया, तो कुछ लोगों ने कहा कि बयान का गलत मतलब निकाला गया। कुछ घंटों के भीतर यह मुद्दा बहस, गुस्से और राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का हिस्सा बन गया। लेकिन इस पूरे विवाद के बीच सबसे जरूरी सवाल कहीं पीछे छूट जाता है? आखिर हम इतने जल्दी आहत क्यों हो जाते हैं? और क्या आज हम किसी बात को समझने से ज्यादा उसे वायरल करने में ज्यादा रुचि लेने लगे हैं?
किसी भी समाज में भाषा की बहुत ताकत होती है। एक अच्छा शब्द किसी का हौसला बढ़ा सकता है, जबकि एक गलत शब्द दिल को चोट पहुंचा सकता है। ‘कॉकरोच’ शब्द सुनते ही लोगों के मन में गंदगी, परेशानी और नफरत जैसी छवि बनती है। इसलिए जब ऐसा शब्द इंसानों के लिए इस्तेमाल होता है, तो विवाद होना स्वाभाविक है।
यही कारण है कि सार्वजनिक जीवन में रहने वाले लोगों से हमेशा उम्मीद की जाती है कि वे अपने शब्दों का चयन सोच-समझकर करें। क्योंकि उनके बयान लाखों तक पहुंचते हैं और समाज पर असर डालते हैं। लेकिन यह भी सच है कि कई बार किसी बयान का केवल छोटा हिस्सा सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया जाता है। पूरी बात, उसका संदर्भ और असली मतलब, पीछे छूट जाता है। लोग 10 सेकंड की क्लिप देखकर राय बना लेते हैं। यही आज की सबसे बड़ी समस्या बनती जा रही है। आज सोशल मीडिया पर हर व्यक्ति तुरंत प्रतिक्रिया देना चाहता है। कोई घटना हो, बयान हो या वीडियो लोग बिना पूरी जानकारी के समर्थन और विरोध शुरू कर देते हैं। अगर किसी ने किसी बात का विरोध नहीं किया, तो उसे कमजोर समझा जाता है। अगर किसी ने सवाल पूछ लिया, तो उसे ट्रोल किया जाता है। धीरे-धीरे समाज बातचीत से ज्यादा प्रतिक्रिया देने वाला बनता जा रहा है। आज लोग सुनने से ज्यादा बोलना चाहते हैं। समझने से ज्यादा जवाब देना चाहते हैं। यही कारण है कि छोटे-छोटे विवाद भी बड़े सामाजिक मुद्दों का रूप ले लेते हैं।
कुछ लोग कहते हैं कि आज की युवा पीढ़ी बहुत जल्दी नाराज हो जाती है। लेकिन इसके पीछे कारण भी हैं। आज का युवा लगातार दबाव में जी रहा है। पढ़ाई का दबाव, नौकरी की चिंता, सोशल मीडिया पर तुलना, भविष्य की असुरक्षा और मानसिक तनाव ये सब उसकी जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे माहौल में कोई भी अपमानजनक शब्द उसे जल्दी प्रभावित कर सकता है। दूसरी बात यह है कि आज का युवा अपनी पहचान और सम्मान को लेकर पहले से ज्यादा जागरूक है। वह हर मुद्दे पर अपनी राय रखना चाहता है। यह लोकतंत्र के लिए अच्छी बात है। लेकिन जागरूकता और अति-प्रतिक्रिया के बीच बहुत पतली सीमा रेखा होती है।
कई बार बिना पूरी बात समझे गुस्सा करना समाज को और ज्यादा विभाजित कर देता है। इतिहास में कई बार ऐसा हुआ है जब इंसानों की तुलना जानवरों या कीड़ों से की गई। ऐसे शब्दों ने समाज में नफरत बढ़ाने का काम किया। इसलिए भाषा का सही इस्तेमाल बहुत जरूरी है।
लेकिन दूसरी तरफ इतिहास यह भी सिखाता है कि हर विवाद को केवल भावनाओं से नहीं, बल्कि समझदारी से देखना चाहिए। अगर हर बयान पर केवल गुस्सा होगा, तो संवाद खत्म हो जाएगा। लोकतंत्र की खूबसूरती इसी में है कि लोग सवाल पूछें, लेकिन साथ ही सुनना भी सीखें। समाज को क्या सीखने की जरूरत है? आज सबसे ज्यादा जरूरत संतुलन की है। बड़े पदों पर बैठे लोगों को अपने शब्दों को लेकर जिम्मेदार होना चाहिए। वहीं जनता और खासकर सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं को भी हर वायरल वीडियो को अंतिम सच मानने से बचना चाहिए। हमें यह समझना होगा कि हर विवाद का समाधान शोर नहीं होता। कई बार शांत होकर पूरी बात समझना ज्यादा जरूरी होता है। अगर समाज गुस्से पर चलेगा, तो संवाद खत्म हो जाएगा। और जब संवाद खत्म होता है, तब गलतफहमियां बढ़ती हैं।
‘कॉकरोच’ विवाद केवल एक शब्द का विवाद नहीं है। यह आज के समाज की सोच, सोशल मीडिया की जल्दबाजी और युवाओं की संवेदनशीलता को दिखाने वाला एक उदाहरण है। आज जरूरत इस बात की है कि हम शब्दों की ताकत को समझें। बोलने से पहले सोचें और सुनने से पहले फैसला न करें।
क्योंकि एक मजबूत समाज वही होता है, जहां लोग केवल प्रतिक्रिया नहीं देते, बल्कि समझने की कोशिश भी करते हैं।












