(रविकांत तिवारी) महाराष्ट्र में मराठी मुद्दा एक बार फिर गर्मा गया है। ऑटो और टैक्सी चालकों के लिए मराठी भाषा अनिवार्य करने के फैसले पर सियासी घमासान मचा हुआ है। कैबिनेट मंत्री प्रताप सरनाईक ने घोषणा की कि मराठी न जानने वाले ड्राइवरों को मराठी सीखने के लिए 15 अगस्त तक का समय दिया है। उसके बाद तय किया जाएगा कि इस नीति को किस तरह प्रभावी तरीके से लागू करें। इसके पहले 1 मई से लागू होने वाले इस नियम का विरोध शुरू हो गया है और मनसे को एक बार फिर मराठी मुद्दे को भुनाने का मौका मिल गया है। इस फैसले का जहां राज ठाकरे की मनसे और उद्धव गुट ने समर्थन किया है, वहीं संजय निरुपम जैसे नेताओं ने मानवीय और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाने की अपील की है। परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक के फैसले ने महायुति के भीतर ही दरार पैदा कर दी है। जहां एक तरफ सरनाईक और मनसे इस फैसले के साथ खड़े हैं, वहीं संजय निरुपम और गुणरत्न सदावर्ते इसे संविधान के खिलाफ बता रहे थे।
4 मई को प्रस्तावित 15 लाख चालकों की हड़ताल से पहले मुंबई में बढ़ता यह तनाव प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। महाराष्ट्र परिवहन विभाग के नए नियमों के अनुसार, जो चालक मराठी भाषा की परीक्षा में विफल होंगे, उनके लाइसेंस और परमिट रद्द किए जा सकते थे। इसको लेकर महाराष्ट्र भर में ऑटो और टैक्सी चालकों में भारी रोष है। यूनियन का दावा है कि मुंबई महानगर क्षेत्र के लगभग 75% ड्राइवर हिंदी भाषी हैं, और इस नियम से लाखों लोगों की रोजी-रोटी छिनने का खतरा पैदा हो गया है। महाराष्ट्र भर के रिक्शा और टैक्सी चालक 28 अप्रैल तक राज्य के परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक को हस्ताक्षरित ज्ञापन सौंपेंगे, जिसमें निर्देश को वापस लेने की मांग की जाएगी, यदि मंत्री अपना निर्णय नहीं बदलते हैं, तो वे शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में प्रतिदिन विरोध प्रदर्शन करेंगे। राज्य सरकार के फैसले पर शिवसेना (एकनाथ शिंदे गुट) के भीतर से ही मदभेद के स्वर सुनाई देने लगे हैं। पार्टी के प्रवक्ता संजय निरुपम ने इस संबंध में परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक को पत्र लिखकर अपनी चिंता व्यक्त की।
निरुपम ने स्पष्ट किया कि मराठी भाषा का सम्मान होना ही चाहिए, लेकिन इसे लागू करने के लिए सख्ती या डर का माहौल पैदा करना ठीक नहीं है। निरुपम ने कहा सबसे पहले, मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूं। राज्य सरकार का यह अनुरोध कि महाराष्ट्र में रहने वाले हर व्यक्ति को मराठी भाषा का सम्मान करना चाहिए, उसे बोलना और समझना चाहिए, बिल्कुल सही है। यह सरकार की स्थिति है, पार्टी की स्थिति है और मेरा व्यक्तिगत विचार भी यही है। निरुपम ने जोर देकर कहा कि जो लोग महाराष्ट्र में रोजी-रोटी कमाते हैं, उन्हें स्थानीय भाषा का ज्ञान होना एक अच्छी बात है और इससे यात्रियों के साथ संवाद में आसानी होती है। वहीं जब भी यह मुद्दा उठता है हिंसा का रूप ले लेता है। मुंबई में ऑटो-टैक्सी चालकों के लिए मराठी भाषा की अनिवार्यता का मुद्दा सड़कों पर हिंसक संघर्ष में तब्दील हो जाता। दहिसर इलाके में उस समय भारी तनाव फैल गया जब शिवसेना (शिंदे गुट) के नेता संजय निरुपम और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के कार्यकर्ता आमने-सामने आ गए। इस झड़प के दौरान मनसे कार्यकर्ताओं ने निरुपम की कार को निशाना बनाया, उनकी गाड़ी की हवा निकाल दी और उन पर बोतलें फेंकी। यह विवाद तब शुरू हुआ जब संजय निरुपम सरकार के मराठी अनिवार्य फैसले का विरोध कर रहे रिक्शा चालकों से संवाद करने पहुंचे थे।
जैसे ही निरुपम ने चालकों को संबोधित करना शुरू किया, मनसे कार्यकर्ता बड़ी संख्या में वहां पहुंच गए और मराठी विरोधी निरुपम वापस जाओ के नारे लगाने लगे। करीब आधे घंटे तक शिंदे सेना और मनसे के पदाधिकारियों के बीच तीखी बहस और धक्का-मुक्की हुई। जब निरुपम अपना कार्यक्रम खत्म कर वहां से निकलने लगे, तो मनसे कार्यकर्ता आक्रामक हो गए। उन्होंने निरुपम के वाहन पर पत्थर और पानी की बोतलें फेंकने की कोशिश की। स्थिति बिगड़ती देख पुलिस ने तुरंत हस्तक्षेप किया और उपद्रव करने वाले मनसे सैनिकों को हिरासत में लिया। मनसे नेता नयन कदम ने इस हमले का बचाव करते हुए कहा कि जो कोई भी महाराष्ट्र में मराठी का विरोध करेगा, उसे मनसे के अंदाज में जवाब दिया जाएगा। इस पूरे घटनाक्रम के बीच वकील गुणरत्न सदावर्ते ने मनसे के युवा नेता अमित ठाकरे को लेकर विवादित बयान दिया। दरअसल, अमित ठाकरे ने चेतावनी दी थी कि हड़ताल के दौरान यदि किसी मराठी रिक्शा चालक को रोका गया, तो मनसे उन्हें सबक सिखाएगी।
इस पर सदावर्ते ने कहा, क्या अमित ठाकरे अब कांस्टेबल या आरटीओ सिपाही बन गए हैं? राज ठाकरे के बच्चे खुद कौन-सी भाषा बोलते हैं? उनके भाषणों में समझदारी की कमी है। सदावर्ते ने अमित ठाकरे का मजाक उड़ाते हुए उनके नेतृत्व पर भी सवाल खड़े किए। फैसले पर मचे सियासी घमासान के बीच राज्य सरकार ने एक बड़ा प्रशासनिक कदम उठाया है। विरोध और हड़ताल की धमकियों के बावजूद, सरकार अपने निर्णय पर अब असमंजस में दिख रही है। राज्य परिवहन आयुक्त ने महाराष्ट्र मोटर वाहन नियम, 1989 में संशोधन का आधिकारिक प्रस्ताव गृह विभाग को भेज दिया है। परिवहन विभाग ने इस संशोधन को लेकर अधिसूचना का मसौदा जारी करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। सरकार ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया का पालन करते हुए नागरिकों, संगठनों और संबंधित संस्थाओं से अगले 30 दिनों के भीतर आपत्तियां और सुझाव आमंत्रित किए हैं। इन सुझावों पर विचार करने के बाद ही नियम को अंतिम रूप दिया जाएगा। क्योंकि 1 मई (महाराष्ट्र दिवस) से इसे लागू करने की तैयारी थी, पर 28 अप्रैल के फैसले के बाद इस निर्णय के अमल के लिए समय मिलेगा। इस पर अब अंतिम निर्णय पर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के रुख पर नजरें टिकी हैं। लेकिन इस पूरे प्रकरण को देखें तो सवाल यही उठता है कि आखिर क्यों बार-बार हिंदी-मराठी मुद्दे पर क्यो मचता है घमासान?








