सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण बयान
लोकवाहिनी, संवाददाता
मुंबई। शिवसेना में विभाजन के बाद राज्य की राजनीति में हलचल मच गई थी। आज सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना पार्टी और उसके चुनाव चिह्न पर किसका अधिकार है, इस मामले में सुनवाई हुई। वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने ठाकरे गुट की ओर से पक्ष रखा। आज की बहस में सिब्बल ने दलील दी कि चुनाव आयोग ने शिंदे के पास मौजूद विधायकों की संख्या के आधार पर चुनाव चिह्न दिया, और यह निर्णय गलत है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम जो निर्णय देंगे, वह भविष्य के लिए लागू होगा। ठाकरे गुट की ओर से बहस करते हुए कपिल सिब्बल ने कहा कि चुनाव आयोग ने 2018 के पार्टी संविधान का उल्लेख किया, लेकिन बाद में उसी संविधान को अलग रख दिया। हमने कभी भी आयोग के सामने अलग-अलग जाकर ऐसा कुछ प्रस्तुत नहीं किया था। फिर आयोग को यह कहां से मिला? धारा 29-ए में कहां लिखा है कि संशोधित पार्टी संविधान को रिकॉर्ड पर लेना आवश्यक है? हमने आयोग को इन संशोधनों की जानकारी दी थी। हमारा दावा है कि हमने 2018 का संविधान पत्र के साथ प्रस्तुत किया था; लेकिन आयोग इससे इनकार करता है। लेकिन वास्तविकता यह है कि कानून में ऐसी कोई आवश्यकता है ही नहीं।
चुनाव आयोग ने संगठनात्मक शाखा की अनदेखी की
आगे बोलते हुए सिब्बल ने कहा कि विधानसभा अध्यक्ष अयोग्यता पर निर्णय नहीं लेते। इस संबंध में तथ्य पहले ही अदालत के निर्णयों में स्पष्ट हो चुके हैं। चुनाव आयोग ने संगठनात्मक शाखा की अनदेखी की है।
हमें अयोग्यता का निर्णय करना है
■ इस मामले में बोलते हुए न्यायमूर्ति जॉयमल्या बागची ने कहा कि इस मुद्दे पर हमें स्पष्टता चाहिए। सुभाष देसाई मामले पर विचार करते हुए न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा था कि सदस्यता स्वेच्छा से छोड़ने का अर्थ यह नहीं है कि राजनीतिक दल से संबंध स्वतः समाप्त हो जाते हैं। यदि ऐसा नहीं है, तो अध्यक्ष वास्तव में क्या करते हैं? अध्यक्ष को जून महीने में एकनाथ शिंदे और उनके गुट के आचरण के आधार पर निर्णय लेना था। पहला, पार्टी प्रमुख द्वारा बैठक में उपस्थित रहने के लिए जारी नोटिस का जवाब न देना, क्या इसे पार्टी की सदस्यता स्वेच्छा से छोड़ना माना जा सकता है? दूसरा, अचानक दूसरे राज्य में जाना और कथित रूप से दूसरे राजनीतिक दल से संबंध स्थापित करना। क्या इन्हीं घटनाओं के आधार पर अयोग्यता का दावा किया गया है? ऐसा सवाल इस दौरान जॉयमल्या बागची ने उठाया।
इस पर बोलते हुए शिवसेना ठाकरे गुट के वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि नहीं, इसके अलावा भी अन्य कार्रवाइयां थीं। उन्होंने अपना स्वयं का प्रस्ताव पारित किया और दूसरे व्यक्ति को प्रतोद नियुक्त किया। इस पर न्यायमूर्ति जॉयमल्या बागची ने कहा कि ये घटनाएं अयोग्यता याचिकाएं दायर होने के बाद हुई थीं। इस पर सिब्बल ने कहा कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। इस पर बोलते हुए न्यायमूर्ति बागची ने यह भी कहा कि ‘सुभाष देसाई’ मामले में इस न्यायालय ने अयोग्यता के प्रश्न का निर्णय नहीं किया था। इस न्यायालय ने कहा है कि विधिमंडल दल और राजनीतिक दल के बीच संबंध है तथा राजनीतिक दल ही उसका आधार है। इसी कारण शिंदे गुट द्वारा ठाकरे द्वारा नियुक्त प्रतोद को बदलने का निर्णय इस न्यायालय ने रद्द कर दिया। न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने राणा मामले में दो टिप्पणियां दर्ज की हैं। हमें अयोग्यता के प्रश्न पर निर्णय करना है। लेकिन क्या वे विधायक फ्लोर टेस्ट (बहुमत परीक्षण) में भाग ले सकते हैं, यह एक अलग प्रश्न था, ऐसा भी इस दौरान बागची ने सवाल किया। ऐसी सरकार का गठन होना ही नहीं चाहिए था।













