लोकवाहिनी, संवाददाता:नई दिल्ली। जनहित याचिकाओं के दुरुपयोग पर टिप्पणी करते हुए उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि जनहित याचिका (पीआईएल) अब ‘निजी (प्राइवेट) हित याचिका’, ‘प्रचार (पब्लिसिटी) हित याचिका’, ‘पैसा हित याचिका’ और ‘राजनीतिक (पॉलिटिकल) हित याचिका’ बन गई है। यह टिप्पणी नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने उस वक्त की जब वे केरल के सबरीमाला मंदिर सहित धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव और विभिन्न धर्मों में धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे से संबंधित याचिकाओं की सुनवाई कर रहे थे। पीठ में प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना, न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश, न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले, न्यायमूर्ति आर. महादेवन और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची शामिल थे।
सबरीमाला मामला : क्या आप देश के मुख्य पुजारी हैं?
उच्चतम न्यायालय ने केरल के सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध को चुनौती देने वाली ‘इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन’ की 2006 की जनहित याचिका पर तीखी टिप्पणी करते हुए मंगलवार को कहा ‘क्या आप देश के मुख्य पुजारी हैं?’ उच्चतम न्यायालय ने टिप्पणी की कि जनहित याचिका कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग थी और ‘इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन’ को इस तरह की जनहित याचिकाएं दायर करने के बजाय बार और अपने युवा सदस्यों के कल्याण के लिए काम करना चाहिए।
नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने यह टिप्पणी केरल के सबरीमाला मंदिर सहित धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव और विभिन्न धर्मों द्वारा पालन की जाने वाली धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे और सीमा पर सुनवाई करते हुए की। पीठ में प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना, न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश, न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले, न्यायमूर्ति आर. महादेवन और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची शामिल हैं। इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन की ओर से पेश हुए अधिवक्ता रवि प्रकाश गुप्ता ने बताया कि जून 2006 में अखबार में चार लेख प्रकाशित हुए थे और जनहित याचिका उन्हीं पर आधारित है। उन्होंने तर्क दिया कि एसोसिएशन भगवान अयप्पा के भक्तों की आस्था को चुनौती नहीं दे रहा है, बल्कि उसका समर्थन कर रहा है। जैसे ही वकील ने अपनी दलीलें प्रस्तुत करनी शुरू कीं, न्यायमूर्ति नागरत्ना ने टिप्पणी की, आप जैसी एक विधिक (कानूनी) संस्था की कोई आस्था कैसे हो सकती है? यह तो किसी व्यक्ति के लिए होती है।








